राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक के विजयादशमी भाषण पर दृष्टि केवल भारत ही नहीं, विश्व भर में हमारे देश में अभिरुचि रखने वालों की रहती है। सरसंघचालक का वक्तव्य संघ और पूरे संगठन परिवार के कार्यकर्ताओं के लिए मार्गदर्शन की तरह होता है। इस विजयादशमी उत्सव के साथ संघ के स्थापना के शताब्दी वर्ष का समापन तथा 101वें वर्ष का आरंभ हुआ है। इस दृष्टि से भी इस उद्बोधन का विशेष महत्व है। स्वाभाविक ही, इसमें शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों के साथ वर्तमान में उपस्थित चुनौतियों और उनमें संघ की दृष्टि से डॉ. मोहन भागवत ने विस्तार से अपने विचार प्रकट किए। उदाहरण के लिए, देश के भीतर शताब्दी के निमित्त संघ की शाखाओं व स्वयंसेवकों के संपर्क के विस्तार के कार्यक्रमों के साथ विश्व में भी भारत, हिंदू व संघ के बारे में प्रबोधन की योजना का एक संक्षिप्त वृत्त दिया गया।

इसके अनुसार, संपर्क अभियान के तहत 4 लाख 61 हजार 527 ग्रामों एवं 41 हजार 076 नगरीय बस्तियों में 10 करोड़ 19 लाख 88 हजार 511 घरों में संपर्क किया गया। प्रबुद्ध नागरिक गोष्ठियां 1,117 जिलों में हुईं, जिनमें 4 लाख 26 हजार 497 नागरिक (महिला + पुरुष) उपस्थित रहे। सद्भावना बैठकें 5 हजार 36 खंडों में संपन्न हुईं, तो हिंदू सम्मेलन 34 हजार 187 मंडलों में तथा युवा सम्मेलनों में 39 लाख 25 हजार 225 युवा उपस्थित रहे। डॉ. भागवत के अनुसार, कुछ कार्यकर्ताओं के प्रवास पश्चिम के विकसित देशों में भी भारत, हिंदुत्व तथा संघ के बारे में सही जानकारी देने की दृष्टि से हुए। उन्होंने कहा कि वहां भी हमारी सनातन, सर्वसद्भावी भारतीय संस्कृति, हिंदू समाज की सर्वसमावेशिता तथा संघ के उद्देश्य व कार्य की सही व सत्य जानकारी रखी गई।

 

विश्व में भारत के प्रति जाग रहा कौतूहल

इस संदर्भ में आए अनुभव की जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि विश्व में भारत के प्रति एक कौतूहल जाग रहा है। उनका यह कहना बिल्कुल सच है कि जड़वाद, व्यक्तिवाद तथा संयम रहित उपभोग पर आधारित अधूरी दृष्टि के कारण भौतिक दृष्टि से संपन्न होते हुए भी वे देश चिंता में हैं। विविधताओं को कैसे संभालना, विकास व पर्यावरण को कैसे साथ चलाना, जो अपने जैसे नहीं हैं, उनसे अपनेपन से कैसे आचरण करना, कुटुंब जीवन तथा नई पीढ़ियों में संस्कारों के क्षरण को कैसे रोकना आदि समस्याओं का उत्तर उनके पास नहीं है। इसीलिए विश्व आज भू-राजनीतिक तनावों, आर्थिक अनिश्चितता, पर्यावरणीय संकट और वर्चस्व की लड़ाई में विनाश को देख रहा है। तो इन सबका उत्तर किसके पास है? भागवत के अनुसार, भारत के पास इन सब समस्याओं के सारे उत्तर हैं, यह वे जानते हैं। इसलिए हमारे कार्यकर्ताओं के कथनों को वहां अच्छी तरह सुना गया और चर्चाएं भी चल पड़ी हैं। देश में तथा विश्व में शताब्दी के निमित्त प्रारंभ हुआ सब प्रकार का संवाद आगे भी सतत व निरंतर चलता रहे, ऐसी योजना बनाने में कार्यकर्ता लगे हैं। जरा सोचिए, भारत के अंदर शायद ही कोई दिन होगा, जब संघ पर तीखे हमले नहीं होते हों, लेकिन इन सबसे परे संगठन अपनी योजना के अनुसार काम करता रहता है और उसके परिणाम सामने हैं। यानी विश्व के प्रवास में जो कुछ संघ के अधिकारियों-कार्यकर्ताओं ने उन देशों में विचार प्रकट किए, जो प्रश्न आए, जो वहां के नागरिकों की प्रतिक्रियाएं आईं, सबका एक सम्मिलित निष्कर्ष यही है कि भारत की ओर दुनिया इस समय देख रही है।

पांच परिवर्तन: जीवन में आचरण का बदलाव जरूरी

जैसा कई बार बताया जा चुका है कि शताब्दी वर्ष में संघ ने पांच परिवर्तन की बात की। ये हैं, सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण, स्व-बोध व स्वदेशी और नागरिक अनुशासन। ये ऐसे विषय हैं, जिनका कोई निष्पक्ष और विवेकशील व्यक्ति विरोध कर ही नहीं सकता, बल्कि सबको लगता है कि भारत के साथ विश्व के देशों में भी इसकी आवश्यकता है। जैसा डॉ. भागवत ने कहा, यह केवल एक वर्ष भर का कार्यक्रम नहीं, अपितु जीवन में आचरण का परिवर्तन लाने वाली व्यवहार की शैली है। यानी प्रत्यक्ष कृति से, आदतों से स्वभाव बनाने वाले ये कार्य जीवन के सभी आयामों में सतत चलाने होंगे, तभी परिवर्तन आएगा। भारत में संस्कारों के द्वारा इस प्रकार के विश्व की धारणा करने वाले धार्मिक जीवन की आदतों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाया जाता रहा है। इन संस्कारों के रुकने के कारण ही हमारा पतन हुआ, जो भारत में ‘हम’ की भावनात्मक दिशा नष्ट हुई।

परिणामस्वरूप, विश्व गुरु के स्थान से देश इतना नीचे गिरा कि कई सदियों तक गुलामी झेलनी पड़ी। संविधान की प्रस्तावना में तो हम ‘भारत के लोग’ कहा, लेकिन व्यवहार में यह नहीं रहा। इस भावना को लाना ही होगा। तो फिर? अगर विश्व भारत की ओर देख रहा है, तो हमें अपनी विस्मृति को दूर कर उस तत्व को समझकर मन से स्वीकार करना पड़ेगा तथा उसके अनुरूप गुणवत्ता का स्वयं के जीवन के सभी आयामों में निर्माण करना पड़ेगा। देश की स्वाधीनता के लिए जितनी तपस्या व समर्पण हुआ, उससे कहीं अधिक की आवश्यकता अब पड़ेगी। स्वाभाविक ही, नई पीढ़ी के कंधे पर भारत को वैभव-संपन्न विश्वगुरु बनाने का बड़ा दायित्व है। इस चुनौती को स्वीकार कर सफलतापूर्वक उसका उत्तर देने के लिए हमारे युवाओं को सब प्रकार से सन्नद्ध होना चाहिए।

विविधता में एकता ही भारत की सनातन दृष्टि

विश्व में भारत एकमात्र देश है, जो भाषा, पंथ, मत-संप्रदाय की विविधताओं से भरपूर रहते हुए सबको सम्मान देकर एकता का आधार बनाता रहा है। यह सच है कि भारत में सनातन काल से अनेक आध्यात्मिक महापुरुषों की प्रत्यक्ष अनुभूतियों से निरंतर स्पष्ट व पुष्ट होता आया सत्य बताता है कि सृष्टि की विविधता जितनी स्वाभाविक व परिवर्तनशील है, उतनी ही संपूर्ण अस्तित्व की एकता शाश्वत, अटल व अचल सत्य है। मनुष्य विचारशील प्राणी होने के नाते उस एकता को स्वयं में तथा जगत में अनुभव कर सकता है। इसी भाव को और पुष्ट करने की जरूरत है। विज्ञान और तकनीक की प्रगति भौतिक दृष्टि से सुखी जीवन जीने में मदद करती है। इसका स्वागत और इसे स्वीकार करना चाहिए। पर इसमें सनातन भारतीय दृष्टि यह है कि केवल उपभोगवादी अथवा जड़वादी दृष्टिकोण से विकास, सुख-सुविधा से बड़ी हानि उत्पन्न करता है। भारत की सनातन जीवन-दृष्टि इसीलिए समन्वय व संयम के संस्कारों की संस्कृति को संपूर्ण विश्व में देखना चाहती है। यह केवल विचार नहीं, बल्कि आचरण का विषय है। इतिहास से मन में पड़ी हमें दूर रखने वाली एक-दूसरे के प्रति आशंकाओं के उन तथ्यों को स्वीकार करते हुए भी गांठें सुलझ जाएं, नई न पड़ें, ऐसा व्यवहार हमारा चाहिए।

आंदोलन समाधान के लिए हों, समाज में विभाजन के लिए नहीं

आंदोलनों के बारे में उनके विचार को मीडिया के एक वर्ग ने गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया। उन्होंने कहा कि छोटी-छोटी बातों पर हमें उकसाकर झगड़े खड़े करने-कराने वाले लोगों से दूर रहना चाहिए। देश व विश्व के कल्याण की इच्छा रखने वाले सभी को धैर्यपूर्वक अपने आप को तथा समाज को संभालते हुए कार्य करते रहना पड़ेगा। यह तो सच है कि समझदार लोगों को भी विचलित करने वाला वातावरण है अथवा खड़ा किया जा रहा है। तो आगाह करना आवश्यक है। भारत सहित सारे विश्व में जो-जो भद्रता, मांगल्य, सांस्कृतिक व मानवीय संस्कार हैं, वह सारा नष्ट-भ्रष्ट, ध्वस्त करने की आसुरी प्रतिज्ञा लेकर पश्चिम से एक आंधी चली है। भारत की प्रगति के कारण विश्व के राष्ट्रों में अराजकता खड़ी कर अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए सहायक हो सकने वाले अपने पिट्ठुओं को वहां स्थापित करने का षड्यंत्र करने वाली ताकतों के खेल बंद होंगे। चूंकि ये आसुरी ताकतें जानती हैं, इसलिए भारत, हिंदू व संघ को किस प्रकार तोड़ सकते हैं (dismantling), इसका विचार कर, योजना बनाकर वे कार्य करती हैं। उन्हीं की प्रकृति के कुछ लोग तथा क्षुद्र सत्ता-स्वार्थ और विवेकहीनता के कारण कुछ महत्वाकांक्षी नेता लोग भी शामिल होते हैं।

अपने समाज में समस्याएं हैं, व्यवस्था की कमियां भी ढेर सारी होंगी। तो आंदोलनों का होना भी स्वाभाविक है। परंतु आंदोलन समाधान देने के लिए होने चाहिए। आंदोलन करने वाला समाज का कोई समूह हो, अपने एक अखंड समाज में हमारी करनी के कारण किसी प्रकार की अनबन, द्वेष, त्वेष, मलाल या विभाजन पैदा नहीं होना चाहिए। भावनाएं तीव्र होने पर भी हमारे संविधान, कानून की मर्यादा में, बोलचाल के भद्र व्यवहार के संकेतों की मर्यादा में हमारी कृतियां हों, यह ध्यान रखना चाहिए। वोट, सस्ती लोकप्रियता अथवा राजनीतिक लाभ का लोभ हमारे विवेक व सद्भावना पर हावी न हो, यह चिंता करनी ही पड़ेगी। कुछ भी आप करें, तो देश की चिंता सर्वोपरि होनी ही चाहिए। यहीं पर उन्होंने कहा कि सब समस्याएं शासन ही सुलझा सकता है अथवा आंदोलनों से ही समस्याएं सुलझती हैं, ऐसा भी अनुभव नहीं है। समाज की सक्रियता व आपसी संवाद के आधार पर भी समस्याओं का समाधान निकल सकता है। इसमें गलत क्या है? क्या बगल के नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका आदि की समस्याएं सुलझ गईं?

सामाजिक सहभागिता से शिक्षा और ग्राम विकास में बदलाव

उन्होंने एक उदाहरण दिया कि संघ के स्वयंसेवक किस तरह सामाजिक उद्यम का प्रयास करते हैं और वह सफल होता है। 21 प्रांतों के 210 जिलों में लगभग 1296 विद्यालयों में यह देखा गया कि जहां ग्रामवासियों का सहभाग व स्वयंसेवकों का साथ रहा, वहां छात्रों की उपस्थिति, सीखने का स्तर तथा अभिभावकों की सहभागिता में सुधार आया। स्वयंसेवक समाज के बीच गए और लोग प्रेरित हुए। समाज ने शिक्षा सहायता तथा आधारभूत सुविधाओं के साथ-साथ खेल व सांस्कृतिक तथा मूल्य आधारित गतिविधियों में भी योगदान दिया। इसी तरह ग्रामवासियों के सम्मिलित प्रयासों के आधार पर गांवों के समग्र विकास के प्रयास तो हजारों ग्रामों में चल ही रहे हैं। जिन्होंने कभी रचनात्मक और सेवा कार्य नहीं किया और जिनके अनुभव नहीं हैं, वे यह समझ नहीं सकते। महात्मा गांधी के पूरे जीवन को देखेंगे, तो आंदोलन से ज्यादा उन्होंने समाज के सहयोग से देश को स्वावलंबी बनाने, ग्राम स्वराज और रचनात्मक कार्यों पर ज्यादा जोर दिया।

 कुल मिलाकर विजयादशमी के उद्बोधन में भागवत ने न सिर्फ दिशा दी, देश को आगाह किया और बताया कि हम भारत और विश्व का ध्यान रखते हुए सचेत हों, सामूहिक रूप से सक्रिय हों, तो अपनी आंतरिक समस्याएं भी सुलझा सकते हैं और विश्व में भी योगदान दे सकते हैं।

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