राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत कुछ कहें और हंगामा न हो, यह संभव नहीं। पर मेरा फिर भी एक विश्वास रहा है कि संघ विचार से असहमत वर्ग में कुछ प्रतिशत (बेहद कम ही सही) ऐसा भी है, जो पढ़ता-लिखता है और तर्क से अपनी बात रखता है। पर आज यह विश्वास भी खंडित हुआ। लगा, ये बौद्धिक नक्सल ही नहीं, शायद बौद्धिक रूप से दिवालिया भी हैं। डॉ. भागवत के बयान को संघ दर्शन से यू-टर्न लेने की बात कहना और भगवा ब्रिगेड पर तमाचा कहना, वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है।

मोहन भागवत का वक्तव्य कोई नई वैचारिक दिशा नहीं, बल्कि संघ-दर्शन की पुरानी और सतत् धारा की पुनर्पुष्टि है।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने अमेरिका के न्यूयॉर्क में कहा कि जो हिंदू यह सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं रह सकते, वह हिंदू ही नहीं है। पहली दृष्टि में यह बयान नया लग सकता है, लेकिन संघ के विचार और उसके लगभग एक शताब्दी के सार्वजनिक विमर्श को देखने पर स्पष्ट होता है कि इसमें नया कम और संघ की मूल अवधारणा का पुनः स्पष्ट किया जाना अधिक है।और यह संघ का अपना कोई मौलिक दर्शन है, ऐसा संघ ने कभी कहा भी नहीं।यह भारतीय दृष्टि ही है।

यह सनातन दृष्टि ही है।भारत की सनातन दृष्टि क्या है?

‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।’

सत्य एक है, हाँ, उसकी व्याख्या अलग है।और—

‘आकाशात् पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम्।

सर्वदेवनमस्कारः केशवं प्रति गच्छति।।’

अर्थात् प्रार्थना किसी की भी करें, प्रणाम एक ही ईश्वर के पास पहुँचता है। जैसे आकाश से गिरी बूँदें अंततः सागर में ही मिलती हैं।यही डॉ. भागवत ने 2026 में कहा। यही 1893 में स्वामी विवेकानंद ने कहा था।यह प्रश्न अवश्य महत्वपूर्ण है कि संघ के सरसंघचालक को अमेरिका में यह बात कहने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई? इसका उत्तर संघ की हिंदुत्व और राष्ट्र की अवधारणा में छिपा है।

‘हिंदू’ का अर्थ केवल पूजा-पद्धति नहीं

संघ के विमर्श में ‘हिंदू’ शब्द केवल किसी एक उपासना-पद्धति का परिचायक नहीं है। वह इसे भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान से जोड़कर देखता है। इसी कारण संघ ‘हिंदू राष्ट्र’ की बात तो करता है, लेकिन उसे ‘हिंदू राज्य’ या किसी धार्मिक शासन के रूप में परिभाषित नहीं करता।इस अंतर को समझे बिना संघ की विचारधारा को समझना कठिन है।संघ की अपनी व्याख्या में भारत में रहने वाले मुस्लिम और ईसाई भी इसी भूमि के पूर्वजों से जुड़े हैं। पूजा-पद्धति बदल जाने से मातृभूमि, पूर्वज और राष्ट्रीय जीवन के रिश्ते समाप्त नहीं हो जाते।

डॉ. भागवत यह बात पहले भी कह चुके हैं। 2018 में दिल्ली में आयोजित ‘भविष्य का भारत’ संवाद में जब उनसे पूछा गया कि यदि भारत हिंदू राष्ट्र है तो मुसलमानों का क्या होगा, उनका उत्तर था कि हिंदू राष्ट्र की कल्पना मुसलमानों के बिना नहीं की जा सकती। उन्होंने यहाँ तक कहा कि जो हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, वह हिंदुत्व को समझता ही नहीं।न्यूयॉर्क में दिया गया ताजा वक्तव्य उसी विचार की निरंतरता है।

संघ के नाम में भी छिपा है उत्तरसंघ का नाम है—राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ।

यदि उसकी दृष्टि केवल धार्मिक संगठन बनाने की होती तो ‘हिंदू स्वयंसेवक संघ’ नाम अधिक स्वाभाविक होता। लेकिन भारत में संघ के नाम में ‘राष्ट्रीय’ शब्द है।

यह केवल नामकरण नहीं, एक वैचारिक संकेत है।

विदेशों में संघ से प्रेरित संगठन ‘हिंदू स्वयंसेवक संघ’ के नाम से काम करते हैं, लेकिन भारत में मूल संगठन ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ है।अर्थात् भारत में संघ का केंद्र किसी एक पंथ का संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय समाज का संगठन है।यही वह बिंदु है, जहाँ ‘हिंदू’ और ‘राष्ट्रीय’ संघ के चिंतन में एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

डॉ हेडगेवार से डॉ मोहन भागवत तक

संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के सामने मूल प्रश्न राष्ट्र के संगठन का था। उनका उद्देश्य समाज को संगठित कर राष्ट्र को शक्तिशाली बनाना था।दूसरे सरसंघचालक पूजनीय श्री ‘गुरुजी’ ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय एकात्मता की अवधारणा को आगे बढ़ाया। उनके विचारों पर बहस होती रही है, लेकिन संघ की वर्तमान व्याख्या में उनके चिंतन का एक महत्वपूर्ण सूत्र यह है कि भारत के लोगों के पूर्वज एक हैं और पूजा-पद्धति की भिन्नता राष्ट्रीय एकात्मता को समाप्त नहीं करती।

तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवरस ने सामाजिक समरसता को विशेष महत्व दिया। उनका जोर इस बात पर था कि हिंदू समाज के भीतर मौजूद भेदभाव और अस्पृश्यता राष्ट्रीय एकता के लिए बाधक हैं।अर्थात् संघ की यात्रा में ‘एकात्मता’ और ‘समरसता’ केवल नारे नहीं रहे, बल्कि उसके सामाजिक विस्तार के प्रमुख विषय बने।

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच क्यों?

संघ के दर्शन को समझने का एक व्यावहारिक उदाहरण मुस्लिम राष्ट्रीय मंच है।देश के गंभीर मुस्लिम चिंतकों ने मुस्लिम समाज में एक राष्ट्रीय विचार से जुड़ा एक संगठन स्थापित किया। संघ विचार से प्रेरणा लेकर बने इस मंच को संघ ने नैतिक प्रोत्साहन दिया और आज भी दे रहा है।

यदि संघ का घोषित उद्देश्य भारत में मुसलमानों को अलग-थलग करना या उन्हें राष्ट्र की मुख्यधारा से बाहर मानना होता, तो मुस्लिम समाज के बीच राष्ट्र और राष्ट्रीयता पर संवाद के लिए ऐसा मंच क्यों खड़ा होता?मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की स्थापना 2002 में हुई और संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार इसके प्रमुख मार्गदर्शक रहे हैं और आज भी हैं।इस मंच की अवधारणा का मूल आग्रह यही रहा है कि मुस्लिम समाज और भारतीय राष्ट्रीयता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।यह मंच कितना सफल रहा, इसका मूल्यांकन अलग विषय है। लेकिन उसका अस्तित्व यह अवश्य बताता है कि संघ के भीतर मुस्लिम समाज को राष्ट्रीय जीवन से जोड़ने की एक स्पष्ट वैचारिक पहल मौजूद रही है।

अशफाक उल्ला से अब्दुल कलाम तक

भारत की राष्ट्रीय चेतना को केवल धार्मिक पहचान के आधार पर नहीं समझा जा सकता।रामप्रसाद बिस्मिल के साथ अशफाक उल्ला खाँ का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की साझा विरासत है। परमवीर चक्र विजेता अब्दुल हमीद भारत के सैन्य इतिहास के गौरव हैं। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम भारतीय विज्ञान और राष्ट्र-निर्माण के प्रेरक व्यक्तित्व हैं।

संघ के सार्वजनिक विमर्श में भी इन नामों का उल्लेख राष्ट्रीय नायकों के रूप में होता रहा है।डॉ. भागवत ने स्वयं विभिन्न अवसरों पर अशफाक उल्ला खाँ, अब्दुल हमीद और अब्दुल कलाम जैसे व्यक्तित्वों का उदाहरण देते हुए यह रेखांकित किया है कि पूजा-पद्धति और राष्ट्रीय निष्ठा दो अलग विषय हैं।

बहस हो, लेकिन सही संदर्भ में

संघ की विचारधारा से सहमत होना आवश्यक नहीं है। ‘हिंदू राष्ट्र’ की अवधारणा पर प्रश्न उठाना भी लोकतांत्रिक अधिकार है। संघ के इतिहास और विचारों की आलोचना कीजिए, पर तर्क के साथ। अन्यथा, यह देश की चेतना के साथ फिर एक अपराध होगा।

यदि संघ ‘हिंदू राष्ट्र’ कहता है तो बहस इस पर होनी चाहिए कि वह राष्ट्र की अवधारणा को किस तरह परिभाषित करता है, उसके सामाजिक और संवैधानिक परिणाम क्या होंगे और उसके विचार से असहमत लोगों की आशंकाओं का समाधान कैसे होगा।पर समय-समय पर संघ ने इसके उत्तर में भी स्पष्ट किया है कि हिंदू राष्ट्र एक सांस्कृतिक अवधारणा है और इसमें सभी का समावेश है।इसलिए यह कहना कि संघ का मूल विचार ही ‘भारत से मुसलमानों को निकालना’ है, उसके वर्तमान और परंपरागत सार्वजनिक विमर्श से मेल नहीं खाता।

डॉ. भागवत का न्यूयॉर्क वक्तव्य इसी अर्थ में महत्वपूर्ण है। उन्होंने हिंदुत्व की कसौटी पर यह बात रखी कि भारत में मुसलमान के अस्तित्व को नकारना हिंदू दर्शन की मूल भावना के विरुद्ध है।अंततः प्रश्न मुसलमान का नहीं, भारतीयता का है।इस पूरे विमर्श को केवल ‘हिंदू बनाम मुसलमान’ के चश्मे से देखना शायद सबसे बड़ी भूल होगी।

संघ की दृष्टि में मूल प्रश्न है—भारत की राष्ट्रीय पहचान क्या है और उसमें विविधता का स्थान क्या है?भारत की शक्ति ही उसकी विविधता है। यहाँ उपासना के अनेक मार्ग हैं, भाषाएँ अनेक हैं, परंपराएँ अनेक हैं। फिर भी एक साझा सभ्यतागत चेतना इन विविधताओं को जोड़ती है।

इसीलिए संघ की दृष्टि को एक वाक्य में इस तरह समझा जा सकता है—पूजा-पद्धति अलग हो सकती है, पर मातृभूमि अलग नहीं।आस्था अलग हो सकती है, पर राष्ट्र अलग नहीं।परंपरा अलग हो सकती है, पर भारतीयता अलग नहीं।

मोहन भागवत का न्यूयॉर्क वक्तव्य इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह किसी नई राजनीतिक रणनीति की घोषणा नहीं, बल्कि संघ के उस पुराने आग्रह की पुनर्पुष्टि है कि हिंदुत्व किसी के विरोध का दर्शन नहीं है।

और यदि कोई हिंदू अपने ही देश के किसी मुसलमान नागरिक के भारत में रहने के अधिकार को नकारता है, तो संघ के सरसंघचालक के शब्दों में—उसे पहले अपने हिंदुत्व की परिभाषा को समझना होगा।अपेक्षा है कि देश का प्रबुद्ध समाज संघ-दर्शन को समझे और इसका स्वागत करे।

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