राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का हालिया अमेरिका, कनाडा एवं ब्रिटेन प्रवास केवल एक संगठनात्मक यात्रा नहीं है बल्कि इसे भारत की सांस्कृतिक चेतना को वैश्विक समाज के साथ संवाद में रखने के एक व्यापक प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। विशेष रूप से संघ के शताब्दी वर्ष में उनका अमेरिका से कनाडा और फिर ब्रिटेन तक जाना इस बात की ओर संकेत करता है कि भारत की सभ्यतागत दृष्टि को भारत की सीमाओं से बाहर भी संवाद का विषय बनाया जा रहा है। इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि भागवत जी ने विदेशों में रहने वाले भारतीयों से केवल भारत को याद रखने की बात नहीं की, बल्कि उन्हें उस देश के प्रति जिम्मेदार नागरिक बनने का संदेश भी दिया जहां वे रहते हैं। साथ ही उन्होंने यह समझाने का प्रयास किया कि अपनी कर्मभूमि के प्रति निष्ठा और अपनी सांस्कृतिक जड़ों के प्रति आत्मीयता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।


अमेरिका के न्यूयॉर्क में 29 अगस्त को हुए “Universal Oneness” कार्यक्रम में उन्होंने धर्म, मानवता और भारतीय संस्कृति के संबंध पर विस्तार से बात की। लंदन के “Celebrate Oneness” कार्यक्रम में उनके विचार और अधिक स्पष्ट रूप में सामने आए। उन्होंने कहा कि यदि एक सिद्धांत को संघ की दीर्घ यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण माना जाए तो वह “अपनापन” अर्थात शुद्ध, सात्त्विक और निःस्वार्थ प्रेम है। उनके अनुसार यही हिंदू समाज की पारंपरिक प्रकृति है,व्यक्ति से प्रेम, समाज से प्रेम और अंततः संपूर्ण मानवता से प्रेम। यहीं से उनके विदेश प्रवास का वास्तविक अर्थ समझने की शुरुआत होती है।

विश्व में तेजी से बदल रही भारत की पहचान

आज विश्व में भारत की पहचान तेजी से बदल रही है। भारत को अब केवल विकासशील देश, विशाल बाजार या उभरती हुई आर्थिक शक्ति के रूप में नहीं देखा जाता। योग, आयुर्वेद, भारतीय दर्शन, आध्यात्मिक परंपरा, लोकतांत्रिक अनुभव, भारतीय प्रवासी समुदाय और सांस्कृतिक प्रभाव भी भारत की वैश्विक पहचान का हिस्सा बन चुके हैं। भागवत जी के संवाद इसी व्यापक पहचान को एक वैचारिक आधार देने की कोशिश करते दिखाई देते हैं। उनके सम्बोधनों में बार-बार यह बात सामने आती है कि भारत की शक्ति केवल उसकी भौतिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उसकी उस सांस्कृतिक दृष्टि में भी है जो विविधता को स्वीकार करते हुए एकता की खोज करती है। लंदन में उन्होंने इसी संदर्भ में कहा कि अस्तित्व मूल रूप से एक है, जबकि विविधता उसकी स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। इसलिए विविधताओं को समाप्त करने के बजाय उनका सम्मान किया जाना चाहिए। उनके अनुसार हिंदू विचार इसी आधार पर विविधताओं को स्वीकार करता है। यह विचार भारत की सभ्यतागत पहचान को समझने की एक महत्वपूर्ण कुंजी बन जाता है।


‘एक दुनिया, एक मानवता,वसुधैव कुटुंबकम का संदेश’


अमेरिका में भागवत जी का सबसे महत्वपूर्ण संदेश “One World, One Humanity” की भावना से जुड़ा रहा। उन्होंने कहा कि धर्म अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवता एक है। उनके अनुसार सत्य एक है और उसे प्राप्त करने के रास्ते अनेक हो सकते हैं। उनका यह कथन भी विशेष चर्चा में रहा कि जो व्यक्ति यह मानता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, वह हिंदू होने की मूल भावना को नहीं समझता। उनके अनुसार हिंदू दृष्टि में विभिन्न मार्गों को स्वीकार करने की क्षमता है। यहां भागवत जी हिंदू संस्कृति को केवल पूजा-पद्धति के स्तर पर परिभाषित नहीं कर रहे थे। वे उसे एक व्यापक जीवन-दृष्टि के रूप में प्रस्तुत कर रहे थे,ऐसी दृष्टि जिसमें अलग-अलग आस्थाओं के बीच सह-अस्तित्व संभव है। यही उनके अंतरराष्ट्रीय संवाद की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।विश्व के सामने हिंदू संस्कृति की पुनर्व्याख्या करते हुए वे इसे किसी एक पूजा-पद्धति या संकीर्ण धार्मिक पहचान के रूप में नहीं, बल्कि विविधता को स्वीकार करने वाली सभ्यतागत चेतना के रूप में प्रस्तुत करते हैं।


भारतीय संस्कृति के जिन सूत्रों को भागवत जी अंतरराष्ट्रीय समाज के सामने रखते हैं, उनमें “वसुधैव कुटुम्बकम्” विशेष महत्व रखता है। भारतीय दृष्टि में दुनिया केवल अलग-अलग राष्ट्रों का समूह नहीं है। मनुष्य के बीच संबंध केवल राजनीतिक सीमाओं से निर्धारित नहीं होते। परिवार, समाज, प्रकृति और मानवता के बीच परस्पर संबंध भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। संघ की अपनी व्याख्या में भी इस विदेशी संवाद को “civilisational dialogue” के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें सेवा, सामाजिक समरसता और साझा मानवीय मूल्यों पर जोर दिया गया। न्यूयॉर्क, टोरंटो और लंदन में कार्यक्रमों के विषय भी क्रमशः “Universal Oneness”, “Hindu Vishwa Bandhu” और “Celebrate Oneness” रहे। इस दृष्टि से यह प्रवास केवल प्रवासी भारतीयों के बीच संगठनात्मक संपर्क का कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि भारत की सभ्यतागत अवधारणाओं को अंतरराष्ट्रीय समाज के सामने रखने का प्रयास भी बना।

यात्रा का सन्देश, “अपनापन” 
भागवत जी के विदेश प्रवास का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष भारतीय प्रवासी समाज के साथ उनका संवाद है। विदेश में रहने वाले भारतीयों के सामने एक स्वाभाविक प्रश्न रहता है,वे अपनी भारतीय सांस्कृतिक जड़ों और अपने वर्तमान देश के प्रति जिम्मेदारियों के बीच संतुलन कैसे बनाएं? न्यूयॉर्क में भागवत जी ने प्रवासी भारतीयों को अपनी कर्मभूमि के प्रति ईमानदार और जिम्मेदार रहने का संदेश दिया। उनका तर्क था कि जो लोग अमेरिका में रहते हैं, वहीं काम करते हैं और वहीं समाज का हिस्सा हैं, उन्हें अमेरिका के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। लंदन में उन्होंने इसी विचार को और स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि कर्मभूमि वही है जहां व्यक्ति की निष्ठा और सेवा का दायित्व है, जबकि जन्मभूमि और पुण्यभूमि उसे मूल्य और संस्कार प्रदान करती हैं। इसलिए ब्रिटेन में रहने वाले हिंदुओं को ब्रिटेन की सेवा करते हुए अपने सांस्कृतिक मूल्यों को अपने जीवन में उतारना चाहिए। यह दृष्टिकोण प्रवासी भारतीयों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां भारतीयता को राजनीतिक निष्ठा के रूप में नहीं, बल्कि संस्कार और जीवन-मूल्यों के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

लंदन में संघ की सौ वर्ष की यात्रा से जुड़े प्रश्न 

लंदन में भागवत जी ने संघ की सौ वर्ष की यात्रा से जुड़े प्रश्न के उत्तर में “अपनापन” को सबसे महत्वपूर्ण तत्व बताया। उन्होंने इसे शुद्ध और निःस्वार्थ प्रेम से जोड़ा। यह शब्द साधारण दिखाई दे सकता है, लेकिन उनके पूरे विदेश प्रवास को समझने में इसकी बड़ी भूमिका है। अपनापन का अर्थ है,दूसरे को केवल ‘दूसरा’ न मानना।यही विचार परिवार से समाज, समाज से राष्ट्र और राष्ट्र से मानवता तक विस्तार पाता है।यदि इस अवधारणा को अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में देखा जाए तो इसका अर्थ है कि विभिन्न देश, समुदाय और धार्मिक समूह अपनी अलग पहचान बनाए रखते हुए भी एक-दूसरे के प्रति सम्मान और सह-अस्तित्व की भावना विकसित कर सकते हैं। इस प्रकार भागवत जी की व्याख्या में हिंदू संस्कृति का आधार केवल “मैं कौन हूं” का प्रश्न नहीं है, बल्कि “मैं दूसरे के साथ कैसे रहूं” का प्रश्न भी है।

लंदन के भाषण में भागवत जी ने हिंदू विचार की एक और विशेषता पर बल दिया,विविधता स्वाभाविक है। विश्व में धर्म, भाषा, संस्कृति, विचार और जीवन-पद्धतियों की विविधता है। आधुनिक राजनीति कई बार इस विविधता को संघर्ष का कारण बना देती है। इसके विपरीत भागवत जी की व्याख्या में हिंदू दृष्टि विविधता को समाप्त करने की बजाय उसे स्वीकार करने की बात करती है। उनके अनुसार अस्तित्व एक है, लेकिन उसकी अभिव्यक्तियां अनेक हैं। इसलिए अनेकता का सम्मान किया जाना चाहिए। यही वह बिंदु है जहां वे हिंदू संस्कृति को विश्व के सामने एक वैकल्पिक सभ्यतागत दृष्टि के रूप में रखने की कोशिश करते हैं। यह पुनर्व्याख्या महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि इसमें हिंदू संस्कृति को केवल भारत की आंतरिक पहचान के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक समाज में संवाद करने वाली संस्कृति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।


हिंदू होने की पुनर्व्याख्या सेवा ही संस्कृति का प्रधान तत्व 


भागवत जी ने लंदन में स्पष्ट किया कि “हिंदू” को केवल किसी धार्मिक कर्मकांड या पूजा-पद्धति के आधार पर नहीं समझा जा सकता। उनके अनुसार हिंदू होना एक ऐसी प्रकृति और दृष्टि से जुड़ा है जो विविधताओं को स्वीकार करती है और मानती है कि अलग-अलग मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर जा सकते हैं।  यही विचार न्यूयॉर्क के उनके वक्तव्य में भी दिखाई दिया l इस तरह विदेशों में उनके भाषणों में हिंदू शब्द की एक सभ्यतागत और सांस्कृतिक व्याख्या सामने आती है। यह व्याख्या यह कहने की कोशिश करती है कि हिंदू संस्कृति की मूल विशेषता केवल धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व, स्वीकार्यता, आत्मीयता और मानवता के प्रति सम्मान है।

भागवत जी के विचारों में संस्कृति केवल विचार या भाषण नहीं है। उसे व्यवहार में उतरना चाहिए। लंदन में उन्होंने सेवा की अवधारणा को इसी संदर्भ में रखा। उनके अनुसार सेवा किसी पर उपकार करने का माध्यम नहीं है। सेवा स्वयं को समाज और ईश्वर के निकट ले जाने का अवसर है। यही सोच संघ के सामाजिक कार्यों की व्याख्या में भी सामने आती है। इसका अंतरराष्ट्रीय महत्व यह है कि भारतीय संस्कृति को केवल योग, दर्शन या आध्यात्मिकता के माध्यम से नहीं, बल्कि सेवा और सामाजिक जिम्मेदारी के माध्यम से भी प्रस्तुत किया जा रहा है। न्यूयॉर्क में भागवत जी द्वारा कृष्ण चेतना और सेवा से जुड़े कार्यक्रमों में भाग लेना भी इसी व्यापक संदेश से जुड़ा रहा। 

डॉ मोहन भागवत के विदेश प्रवास का एक महत्वपूर्ण पक्ष है नई पीढ़ी


डॉ मोहन भागवत के विदेश प्रवास का एक महत्वपूर्ण पक्ष नई पीढ़ी है। लंदन में उन्होंने  नई पीढ़ी के प्रति आशावादी दृष्टिकोण रखा। उनके अनुसार नई पीढ़ी में दुनिया को बेहतर बनाने की इच्छा है और यदि उसे अनुभव और ज्ञान दिया जाए, लेकिन उसकी स्वतंत्रता को बाधित न किया जाए, तो वह अपनी दिशा स्वयं खोज सकती है। यह बात प्रवासी भारतीय समाज के संदर्भ में और महत्वपूर्ण हो जाती है।दूसरी और तीसरी पीढ़ी के भारतीय मूल के युवाओं का भारत से संबंध अक्सर उनके माता-पिता की तुलना में अलग होता है। उनके लिए भारत केवल पूर्वजों की भूमि हो सकता है। ऐसे में संस्कृति को केवल परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन के लिए उपयोगी मूल्य के रूप में प्रस्तुत करना आवश्यक हो जाता है। भागवत जी का संवाद इसी दिशा में दिखाई देता है,भारतीयता को बोझ नहीं, आत्मविश्वास का आधार बनाना।


आज भारत विश्व व्यवस्था में अपनी भूमिका का विस्तार कर रहा है। लेकिन किसी राष्ट्र की वैश्विक शक्ति केवल उसकी सेना, अर्थव्यवस्था या तकनीक से निर्धारित नहीं होती। उसकी सॉफ्ट पावर भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। योग का विश्वव्यापी विस्तार, भारतीय दर्शन में बढ़ती रुचि, आयुर्वेद, भारतीय संगीत और नृत्य, भारतीय भोजन, सिनेमा और विश्व के अनेक देशों में बसे भारतीय समुदाय भारत की सांस्कृतिक उपस्थिति को मजबूत करते हैं। भागवत जी का विदेश संवाद इसी सांस्कृतिक शक्ति को एक वैचारिक आधार प्रदान करने का प्रयास माना जा सकता है। उनका संदेश यह है कि भारत को दुनिया से संवाद करते समय अपनी सांस्कृतिक पहचान के प्रति संकोच करने की आवश्यकता नहीं है। भारत आधुनिक हो सकता है और फिर भी भारतीय रह सकता है। भारत तकनीकी रूप से विकसित हो सकता है और फिर भी अपनी आध्यात्मिक परंपरा से जुड़ा रह सकता है। भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था का हिस्सा हो सकता है और फिर भी “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को अपनी पहचान का हिस्सा बनाए रख सकता है।


संघ की शताब्दी और वैश्विक संवाद


इस पूरे विदेश प्रवास को संघ की शताब्दी के संदर्भ में भी देखना आवश्यक है। संघ के अनुसार 2026 में उसके शताब्दी कार्यक्रमों का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य वैश्विक समाज के साथ सभ्यतागत संवाद को व्यापक बनाना है। संगठन ने इसे सेवा, सामाजिक समरसता और साझा मूल्यों से जोड़ा है। न्यूयॉर्क में बहुधार्मिक नेताओं के साथ संवाद, टोरंटो में “Hindu Vishwa Bandhu” कार्यक्रम और लंदन में “Celebrate Oneness”,इन तीनों कार्यक्रमों की विषयवस्तु अलग होते हुए भी एक साझा सूत्र दिखाई देता है: विभिन्नताओं के बीच एकता की खोज। इससे यह संकेत मिलता है कि संघ अपने शताब्दी वर्ष में केवल भारत में अपने सौ वर्ष के कार्यों को याद करने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि भारतीय सभ्यता के विचारों को वैश्विक संदर्भ में रखने का प्रयास भी कर रहा है।


भागवत जी के विदेश प्रवास का सबसे व्यापक अर्थ यही हो सकता है कि भारत को केवल आधुनिक राष्ट्र-राज्य के रूप में नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत राष्ट्र के रूप में समझने का आग्रह किया जा रहा है। यह दृष्टि भारत के वर्तमान को उसके अतीत से जोड़ती है। भारत की पहचान संविधान, लोकतंत्र, अर्थव्यवस्था और आधुनिक संस्थाओं से भी बनती है, लेकिन उसके साथ उसकी हजारों वर्षों की सांस्कृतिक स्मृति भी मौजूद है। भागवत जी के भाषण इस सांस्कृतिक निरंतरता को अंतरराष्ट्रीय संवाद का हिस्सा बनाने का प्रयास करते हैं।nयहां उनका उद्देश्य केवल यह बताना नहीं है कि भारत महान था, बल्कि यह प्रश्न उठाना भी है कि भारत की सभ्यतागत सोच आज दुनिया के लिए क्या उपयोगी योगदान दे सकती है? विविधता को स्वीकार करना, अलग-अलग आस्थाओं के साथ रहना, मानवता को एक मानना, सेवा को जीवन-मूल्य समझना और दुनिया को परिवार के रूप में देखना—ये वे तत्व हैं जिन्हें वे आधुनिक विश्व के सामने भारतीय संस्कृति की संभावित देन के रूप में प्रस्तुत करते हैं।


अंततः मोहन भागवत जी का अमेरिका और ब्रिटेन प्रवास इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें भारत की वैश्विक पहचान को संस्कृति के माध्यम से समझाने का प्रयास दिखाई देता है। न्यूयॉर्क में “धर्म अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवता एक है”, और लंदन में “अपनापन”, “विविधता में एकता” तथा “कर्मभूमि के प्रति निष्ठा” जैसे विचार उनके पूरे संवाद को एक सूत्र में जोड़ते हैं। भागवत जी के विदेश संवाद की सबसे बड़ी विशेषता शायद यही है कि वे भारतीय संस्कृति को अतीत की स्मृति के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य के लिए उपयोगी विचार के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।उनके लिए भारत की सांस्कृतिक शक्ति का अर्थ केवल गौरवगान नहीं, बल्कि व्यक्ति निर्माण, सेवा, सामाजिक समरसता, विविधता का सम्मान और विश्व के प्रति अपनत्व है। भारत दुनिया को बदलने से पहले दुनिया के साथ संवाद करना चाहता है; अपनी संस्कृति को थोपना नहीं, बल्कि उसके मूल में मौजूद मानवीय दृष्टि को समझाना चाहता है।

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