नेहा बोरा की सैंपलिंग से लेफ्ट मैथड को डिकोड करते हैं।

सीपीआई मार्क्सवाद-लेनिनवाद अब में अब थिएटर स्टडीज बनकर आता है। जेएनयू इसका सबसे बड़ा लैब है। जंतर मंतर पर इस थिएटर से निकली औरतें आदमी कमर पर हाथ रखे, मुंह बनाकर संवाद अदायगी करते हुए दिखते है तो समझिए कि उसका रिहर्सल तगड़ा हुआ है। इस रिहर्सल को रॉयटर्स उठाता है और उन चेहरों को अंतरराष्ट्रीय बनाता है। उमर खालिद और तमाम फ्रिंज एलिमेंट्स की हरकतों  को रोमांटिसाइज करता है, यह मीडिया गुजरात दंगों की फर्जी रिपोर्टिंग कर चुका है, आज फिर कर रहा  है।

खैर वापस जेएनयू पर आते हैं, वहां  का एक व्यक्ति है, ब्रह्म प्रकाश, स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स में असिस्टेंट प्रोफेसर, पीएचडी थिएटर और कल्चर पर, खुद को क्रिटिकल थिंकर कहता है। वह उस थिएटर का प्रशिक्षक है, उसने किताब लिखी - द स्पेक्टेकल स्टेट। थीसिस सीधी है - मोदी सरकार राजनीति नहीं करती, तमाशा करती है, और सही शब्द है हिंदुत्व एक तमाशा है। बुलडोजर, भगवा झंडा, पॉप गाने, भीड़ ये सब तमाशे के टूल हैं।

पर किताब खोलो तो फ्रॉड साफ दिखता है। किताब जिस वॉल्टर बेंजामिन को अपना बाप बनाती है, बेंजामिन ने साफ लिखा था - फासीवाद और कम्युनिज्म दोनों राजनीति को तमाशा बनाते हैं। ब्रह्म प्रकाश ने बेंजामिन को कोट किया, पर कम्युनिज्म वाला हिस्सा कैंची से काट दिया। पूरी किताब में हिंदुत्व का तमाशा है, पर लेफ्ट के तमाशे पर एक पन्ना नहीं। 

और ये किताब रिसर्च नहीं, यूट्यूब रिसर्च है। पूरी किताब में एक भी आरटीआई नहीं, एक भी एफआईआर नहीं, एक भी कोर्ट ऑर्डर का रेफरेंस नहीं। सारे सोर्स यूट्यूब वीडियो, ट्विटर लिंक, न्यूज आर्टिकल। जेएनयू लाइब्रेरी में बैठकर रील देखकर लिखी गई किताब रूटलेज लंदन में छपेगी, लॉन्च होगी, फंडिंग लाएगी। भारत का मजदूर, छात्र किताब में सिर्फ फुटनोट बनकर रह जाएगा।

इसी थ्योरी का लाइव डेमो है नेहा बोरा।

नेहा बोरा को समझना है तो उसकी अकेली फोटो मत देखो। जेएनयू में एक पूरा कोर्स चलता है - बैरिकेड पर चढ़ना, दौड़ना, पुलिस को गाली देना, नारे की पिच कैसे उठानी है, कैमरे के सामने कैसे गिरना है। ये कोई भूख हड़ताल नहीं, ये थिएटर की ट्रेनिंग है। और ये ट्रेनिंग उसी ग्रुप से निकलती है जिसमें ब्रह्म प्रकाश जैसे प्रोफेसर पर्दे के पीछे रहते हैं।

प्रोफेसर सामने नहीं आएगा। वो कभी बैरिकेड पर नहीं चढ़ेगा। उसका काम है आइडियोलॉजी देना, भाषा देना। वो किताब में लिखेगा - सत्ता शरीर को कंट्रोल करती है, स्टेट वायलेंस। और उसकी ही क्लास की छात्रा अपना शरीर लेकर बैरिकेड पर चढ़ेगी, रोज वजन घटने का वीडियो डालेगी, ड्रिप लगी फोटो खिंचवाएगी।

स्टेज पर नेहा है, पर्दे के पीछे प्रोफेसर एंड कंपनी है। यही पूरा इकोसिस्टम है। जब पुलिस उठाएगी तो फोटो आएगी, वही फोटो अगली किताब का कवर बनेगी, अगले सेमिनार का पोस्टर बनेगी, अगली फंडिंग का प्रपोजल बनेगी।

इसलिए जब इसी साल इसी स्कूल ऑफ आर्ट्स में 11 छात्राओं ने प्रोफेसर पर हैरेसमेंट की शिकायत की, डीसीडब्ल्यू ने नोटिस दिया, आईसीसी जांच बैठी, पूरे कैंपस में प्रोटेस्ट हुआ तो जो प्रोफेसर रोज स्टेट वायलेंस पर ट्वीट करता है वो एकदम चुप रहा। क्योंकि बोलने से पूरा थिएटर गिर जाएगा। अगर बोल दिया कि मेरे डिपार्टमेंट में शोषण हुआ है तो बॉडी पॉलिटिक्स वाली थ्योरी अपने ही डिपार्टमेंट पर लागू हो जाएगी। इसलिए चुप रहो और ध्यान दूसरी तरफ ले जाओ - बुलडोजर, भगवा, हिंदुत्व।

नेहा का बैरिकेड पर चढ़ना उसी चुप्पी का प्रोडक्ट है। उसे सिखाया गया है कि शरीर ही हथियार है। भूखे शरीर का वीडियो सबसे बड़ा स्पेक्टेकल है। किताब में जो स्पेक्टेकल को फासीवाद कहा गया है, वही जब अपनी छात्रा करे तो वो क्रांति हो जाता है। जब हिंदू भीड़ जय श्री राम बोले तो वो तमाशा है, जब जेएनयू की भीड़ लाल सलाम बोले तो वो प्रतिरोध है।

यही दोगलापन चालीस साल से चल रहा है। वामपंथी शैक्षिक फंड, सुविधाएं, सहूलियत, सम्मान सब अपने लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। प्रोफेसर पर्दे के पीछे थ्योरी बनाएगा, छात्र पर्दे के आगे शरीर लगाएगा, और फंडिंग विदेश से आएगी।

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।
अपने लेख इस पते पर भेजें :- editatalraag@gmail.com