कभी पत्थरबाजी, विरोध और अलगाववादी नारों की तस्वीरों के लिए पहचाने जाने वाले कश्मीर से एक अलग दृश्य सामने आया। श्रीनगर के एसकेआईसीसी में पहली बार आयोजित अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के उद्घाटन समारोह में जब ‘वंदे मातरम्’ की धुन गूंजी तो मंच पर मौजूद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, उनके पिता और नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता फारूक अब्दुल्ला तथा अन्य नेता सम्मानपूर्वक खड़े रहे। 

वातावरण में न कोई राजनीतिक शोर था, न विरोध का दृश्य और न ही इसे लेकर कोई सार्वजनिक टकराव। इसके बाद राष्ट्रगान के दौरान भी पूरा सभागार उसी गरिमा के साथ खड़ा दिखाई दिया। यही दृश्य उस समय विशेष अर्थ ग्रहण करता है, जब देश के दूसरे हिस्सों में ‘वंदे मातरम्’ के गायन और उसके कितने अंश गाए जाएं, इसे लेकर राजनीतिक बहस चल रही है।

श्रीनगर के मंच पर एक बदली हुई तस्वीर

जम्मू-कश्मीर में पहली बार आयोजित चार दिवसीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव उद्घाटन कार्यक्रम में सामने आया दृश्य उस व्यापक बदलाव की ओर भी संकेत करता दिखाई दिया, जिसमें जम्मू-कश्मीर का सार्वजनिक जीवन धीरे-धीरे राजनीतिक टकराव की पुरानी छवियों से आगे बढ़कर सामान्य लोकतांत्रिक गतिविधियों की ओर बढ़ता नजर आ रहा है। 

दरअसल, श्रीनगर के एसकेआईसीसी में देश और दुनिया के सिनेमा से जुड़े लोगों की मौजूदगी के बीच ‘वंदे मातरम्’ का पूरा गायन हुआ। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, फारूक अब्दुल्ला और मंत्रिमंडल के सदस्य सम्मानपूर्वक खड़े रहे। इसके बाद राष्ट्रगान भी पूरी गरिमा के साथ हुआ। यह दृश्य इसलिए भी उल्लेखनीय बन गया क्योंकि इसी समय देश के विभिन्न राजनीतिक हलकों में ‘वंदे मातरम्’ को लेकर मतभेद सार्वजनिक बहस का विषय बने हुए हैं। श्रीनगर से सामने आया दृश्य कम से कम यह बताता है कि लोकतांत्रिक असहमति और राष्ट्रीय सम्मान की अभिव्यक्ति एक साथ मौजूद हो सकती है।

दिल्ली की बहस के बीच कश्मीर का सहज संदेश

जम्मू स्थित राजनीतिक विश्लेषक और टिप्पणीकार जफर चौधरी ने इसी अंतर को रेखांकित करते हुए कहा कि जहां दिल्ली में इस बात पर बहस चल रही है कि ‘वंदे मातरम्’ का कितना हिस्सा गाया जाना चाहिए, वहीं कश्मीर ने पूरे गीत और उसके बाद पूरे राष्ट्रगान के साथ इस मामले को सहजता से सुलझा लिया। उनकी टिप्पणी, “कोई बहस नहीं, कोई ड्रामा नहीं, टीवी के लिए कोई मसाला नहीं। बस संगीत”, श्रीनगर में बने वातावरण की एक अलग तस्वीर प्रस्तुत करती है।

इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पक्ष मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और उनके पिता फारूक अब्दुल्ला की मौजूदगी भी है। दोनों जम्मू-कश्मीर की राजनीति के प्रमुख चेहरे हैं और नेशनल कॉन्फ्रेंस की राजनीतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके सामने ‘वंदे मातरम्’ का पूरा गायन और उसके दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहना राजनीतिक दृष्टि से भी चर्चा का विषय बना। दिल्ली भाजपा के अनमोल कात्याल ने सोशल मीडिया मंच X पर इसी दृश्य को रेखांकित करते हुए कहा कि “नए कश्मीर” में ‘वंदे मातरम्’ का पूरा प्रदर्शन होते समय सभी लोग सम्मान के साथ खड़े होते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री अब्दुल्ला सभा का नेतृत्व करते हैं और उनके पिता भी तीन मिनट से अधिक लंबे राष्ट्रगान के दौरान खड़े रहते हैं।

यह दृश्य इस मायने में महत्वपूर्ण है कि जम्मू-कश्मीर की मुख्यधारा की राजनीति और राष्ट्रीय प्रतीकों के बीच संबंधों को लेकर लंबे समय से अलग-अलग राजनीतिक धारणाएं रही हैं। ऐसे में किसी सार्वजनिक और अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस तरह का सहज व्यवहार संवाद की एक नई संभावना को सामने रखता है। यहां यह भी ध्‍यान देने की बात है कि यह पहली बार नहीं था जब उमर अब्दुल्ला और उनके साथ मौजूद नेताओं ने राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान का सार्वजनिक प्रदर्शन किया। इससे पहले स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आयोजित गृह समारोह में भी उमर अब्दुल्ला उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और भाजपा नेताओं के साथ राष्ट्रगान की पूरी प्रस्तुति के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहे थे।

राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं। जम्मू-कश्मीर में विभिन्न दलों की विचारधाराएं और राजनीतिक प्राथमिकताएं भी अलग-अलग हैं, किंतु राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान के अवसर पर सामने आई ऐसी तस्वीरें इस बात की संभावना को मजबूत करती हैं कि राजनीतिक असहमति को लोकतांत्रिक दायरे में रखते हुए साझा राष्ट्रीय भावनाओं के लिए भी स्थान बनाया जा सकता है।

कांग्रेस की अपनी आपत्ति, गठबंधन की अपनी दलील

इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पक्ष भी है। जम्मू-कश्मीर कांग्रेस के एक नेता ने कहा कि विपक्षी इंडिया ब्लॉक ने अन्य समुदायों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करने के लिए ‘वंदे मातरम्’ के दो श्लोकों के गायन पर सहमति जताई थी। उनका तर्क था कि नेशनल कॉन्फ्रेंस भी इंडिया ब्लॉक का हिस्सा है, इसलिए उसे इस समझौते का पालन करना चाहिए था। यानी राजनीतिक स्तर पर मतभेद पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। कांग्रेस के भीतर भी इसे लेकर अपनी स्थिति है और धार्मिक भावनाओं से जुड़े प्रश्न को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आ रहे हैं, लेकिन श्रीनगर की तस्वीर की विशेषता यही रही कि राजनीतिक असहमति कार्यक्रम के दौरान किसी सार्वजनिक टकराव में परिवर्तित नहीं हुई।

श्रीनगर के इस कार्यक्रम की सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर शायद यही है कि ‘वंदे मातरम्’ यहां किसी राजनीतिक विवाद का कारण नहीं बना। यह एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के बीच राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति के रूप में सामने आया। फिल्म महोत्सव जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर इसका बजना कश्मीर की उस छवि को भी सामने लाता है, जो कला, संस्कृति, पर्यटन और वैश्विक संवाद के माध्यम से खुद को नए रूप में प्रस्तुत करना चाहती है।

असहमति रहे, मगर संवाद भी बना रहे

देश में ‘वंदे मातरम्’ को लेकर बहस आगे भी जारी रह सकती है। राजनीतिक दल अपनी-अपनी वैचारिक और धार्मिक संवेदनाओं के आधार पर अपनी स्थिति रखते रहेंगे। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वाभाविक है, किंतु श्रीनगर ने इस बहस के बीच एक अलग तस्वीर पेश की है, असहमति के बावजूद सार्वजनिक गरिमा कायम रह सकती है और राजनीतिक मतभेदों के बीच राष्ट्रीय सम्मान की अभिव्यक्ति भी संभव है।

कश्मीर के लिए यह संदेश विशेष महत्व रखता है। जिस भूभाग की चर्चा लंबे समय तक अलगाव, हिंसा और अविश्वास के संदर्भ में होती रही, वहां अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के मंच से ‘वंदे मातरम्’ की गूंज और उसके बाद राष्ट्रगान के समय नेताओं का सम्मानपूर्वक खड़ा होना एक ऐसी तस्वीर है, जिसमें टकराव से अधिक सामान्यता दिखाई देती है। अब यही सामान्यता कश्मीर के बदलते सामाजिक और राजनीतिक वातावरण की सबसे महत्वपूर्ण पहचान बन सकती है। कानून की बहाली व्यवस्था को स्थिर करती है, परन्‍तु विश्वास की बहाली समाज को जोड़ती है। श्रीनगर के इस मंच से सामने आया दृश्य इसी दूसरे चरण, जिसमें कि विश्वास, संवाद और साझा राष्ट्रीय भावना की ओर बढ़ते कश्मीर की सकारात्मक कहानी है, जो आज हम सभी के सामने बहुत सकारात्‍मक रूप से आई है।

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