जनजातीय समाज की जीवनशैली प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव और आत्मनिर्भरता की अनूठी मिसाल है। भील समाज में सदियों से ऐसी अनेक परंपराएँ चली आ रही हैं, जिनमें आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति और कृषि-संपदा को सुरक्षित रखने की भावना दिखाई देती है। इन्हीं महत्वपूर्ण परंपराओं में से एक है बीजों का संरक्षण।

भील समाज वर्षभर जिन खाद्य वस्तुओं और फसलों का उपयोग करता है, उनमें से अनेक के बीजों को भोजन के बाद सुरक्षित रखा जाता है। बीजों को अच्छी तरह सुखाकर, सुरक्षित स्थान पर संभालकर रखा जाता है, ताकि अगले वर्ष बुआई के समय उन्हीं बीजों का उपयोग किया जा सके। यह प्रक्रिया किसी कक्षा में पढ़कर सीखी हुई विद्या नहीं है, बल्कि पुरखों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही जीवन-पद्धति और अनुभवजन्य ज्ञान है।

यह परंपरा केवल बीज बचाने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे आत्मनिर्भरता, प्रकृति के प्रति सम्मान और आने वाले वर्ष की तैयारी का भाव छिपा हुआ है। जनजातीय समाज जानता है कि आज का बचाया हुआ बीज ही कल की फसल और भोजन का आधार बनेगा।

मेरे सामने रखी कासरी(काचरी) इसका एक सुंदर उदाहरण है। कासरी आज बहुत कम स्थानों पर दिखाई देती है, लेकिन जहाँ मिलती है, वहाँ इसका स्वाद अपनी अलग पहचान रखता है। प्राचीन समय में छोटी-छोटी कासरियों को सुखाकर भी रखा जाता था और आवश्यकता के अनुसार उनका उपयोग सब्जी के रूप में किया जाता था।

समय के साथ खेती की पद्धतियों में परिवर्तन आया है। रासायनिक खाद और कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग तथा पारंपरिक देशी किस्मों के कम होते उपयोग के कारण ऐसी कई छोटी-छोटी पारंपरिक खाद्य वनस्पतियाँ और उनकी किस्में अब धीरे-धीरे दुर्लभ होती जा रही हैं। कासरी भी कई क्षेत्रों में पहले की तुलना में बहुत कम दिखाई देती है। फिर भी गाँवों के कुछ हिस्सों में आज भी इसके दर्शन हो जाते हैं, जहाँ प्रकृति और परंपरा का यह रिश्ता जीवित है।

जनजातीय समाज को केवल खाने वाला समाज समझना उसके व्यापक जीवन-दर्शन को सीमित कर देना होगा। वह भोजन पैदा करता है, उसका उपयोग करता है और साथ ही आने वाले वर्ष के लिए उसके बीजों को भी सुरक्षित रखता है। यही परंपरा हमें बताती है कि जनजातीय जीवन में भविष्य की चिंता और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी कितनी गहराई से जुड़ी हुई है।

आज जब दुनिया जैव-विविधता, पारंपरिक बीजों और प्राकृतिक खेती के संरक्षण की बात कर रही है, तब जनजातीय समाज की यह पारंपरिक ज्ञान-परंपरा और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे देशी बीजों, पारंपरिक खाद्य पदार्थों और स्थानीय वनस्पतियों को केवल स्मृतियों में न रहने दिया जाए, बल्कि उन्हें पहचानकर संरक्षित किया जाए और अगली पीढ़ी तक पहुँचाया जाए।बीज केवल आने वाली फसल नहीं होते, वे हमारी परंपरा, हमारी स्मृति और हमारी आने वाली पीढ़ियों की खाद्य-सुरक्षा के बीज भी होते हैं।

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