उन्नीसवीं शताब्दी का भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा था, जहां पुरानी दुनिया धीरे धीरे पीछे छूट रही थी और आधुनिकता का एक नया संसार सामने आ रहा था। अंग्रेजी शासन मजबूत हो चुका था, पश्चिमी शिक्षा तथा आधुनिक विचारों का प्रभाव बढ़ रहा था। ऐसे समय में काशी से एक ऐसी आवाज उठी जिसने हिंदी साहित्य को केवल मनोरंजन और काव्य रस की दुनिया से बाहर निकालकर अपने समय के मुद्दों से जोड़ दिया। यह आवाज थी भारतेंदु हरिश्चंद्र की।

भारतेंदु का जीवन बहुत लंबा नहीं था। उनका जन्म 1850 में हुआ और 1885 में उनका निधन हो गया। केवल लगभग पैंतीस वर्ष के जीवन में उन्होंने कविता, नाटक, निबंध और पत्रकारिता के माध्यम से हिंदी समाज के भीतर नई चेतना पैदा की। उनके व्यक्तित्व में देश प्रेम और क्रांति चेतना का विशेष स्थान था। उन्होंने साहित्य के साथ पत्र पत्रिकाओं और सामाजिक गतिविधियों को भी जनजागरण का माध्यम बनाया।

भारतेंदु के राष्ट्रबोध को समझने के लिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि उनके साहित्य में राष्ट्रप्रेम कभी भारत की दुर्दशा पर करुणा बनकर सामने आता है, कभी अपनी भाषा के प्रति आग्रह बनकर, कभी सामाजिक कुरीतियों के विरोध में और कभी आर्थिक शोषण की पीड़ा के रूप में। सबसे मार्मिक रूप उनके नाटक भारत दुर्दशा में दिखाई देता है। यहां भारत कोई अमूर्त भौगोलिक इकाई नहीं है। वह एक पीड़ित देश के रूप में सामने आता है, जिसकी वर्तमान दशा उसके गौरवशाली अतीत से बिल्कुल अलग हो गई है।

भारतेंदु को यह पीड़ा केवल विदेशी शासन से नहीं थी। वे भारतीय समाज की अपनी कमजोरियों से भी उतने ही चिंतित थे। उनके लिए देश की उन्नति का रास्ता केवल शासन परिवर्तन से होकर नहीं जाता था। समाज को अपनी जड़ता, आलस्य, अज्ञान और आपसी विभाजन से भी बाहर निकलना था।

उनकी रचनाओं में पराधीनता का प्रश्न प्रमुख रूप से दिखाई देता है। वे लोगों को यह सोचने के लिए प्रेरित करते हैं कि जो समाज कभी समृद्ध और प्रभावशाली था, वह पराधीन कैसे हो गया। यही प्रश्न भारतेंदु के राष्ट्रबोध का केंद्र है। वे केवल शिकायत नहीं करते, आत्ममंथन भी कराते हैं।

भारतेंदु की राष्ट्रीय चेतना की विशेषता यह है कि उसमें केवल विदेशी शासन को दोष देने की प्रवृत्ति नहीं है। वे अपने समाज को भी कठघरे में खड़ा करते हैं। उनके लिए राष्ट्रीय जागरण का अर्थ था कि भारतीय समाज अपनी कमियों को पहचाने और उन्हें दूर करने का प्रयास करे।

उनका प्रसिद्ध निबंध भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है इस दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें उन्होंने भारतीय समाज की आर्थिक और सामाजिक कमजोरियों पर विचार किया। उन्होंने श्रम, समय के सदुपयोग, आत्मबल, शिक्षा और संगठन की आवश्यकता पर जोर दिया। साथ ही अंग्रेजों के परिश्रम और संगठन से सीख लेने की बात भी की। भारतेंदु ने ब्रिटिश शासन की मनमानी पर व्यंग्य किया, लेकिन अंग्रेजों के परिश्रमी स्वभाव की प्रशंसा भी की।

यह तथ्य उनके राष्ट्रबोध को अधिक वास्तविक बनाता है। उनका राष्ट्रवाद भावुक विरोध भर नहीं था। वे आधुनिक ज्ञान और उपयोगी गुणों को अपनाकर भारतीय समाज को मजबूत बनाना चाहते थे। भारतेंदु के राष्ट्रबोध का दूसरा बड़ा आधार भाषा है। उनकी प्रसिद्ध पंक्ति है - “निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल।”

यह पंक्ति केवल हिंदी के प्रचार का नारा नहीं थी। इसके भीतर भाषा और आत्मसम्मान का गहरा संबंध दिखाई देता है। भारतेंदु समझते थे कि जिस समाज की अपनी भाषा में ज्ञान, विचार और संवाद की मजबूत परंपरा होगी, वही समाज अपनी सामूहिक चेतना को मजबूत कर सकेगा।

उन्होंने कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैगजीन और हरिश्चंद्र चंद्रिका जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से हिंदी को नए विषयों और नई शैली से जोड़ा। स्त्रियों की शिक्षा और जागरूकता के लिए बालाबोधिनी का प्रकाशन भी इसी व्यापक सामाजिक दृष्टि का हिस्सा था। भारतेंदु ने भाषा को केवल साहित्य की भाषा नहीं माना। वह उनके लिए समाज को जोड़ने और जागृत करने का माध्यम थी।

उन्होंने पत्र पत्रिकाओं को समाज के सामने उपस्थित प्रश्नों पर विचार करने का मंच बनाया। उनकी पत्रकारिता में साहित्य, राजनीति, समाज सुधार, शिक्षा और आर्थिक प्रश्न एक दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं।

उस समय पत्रकारिता आसान काम नहीं था। अंग्रेजी शासन के दौर में सत्ता की आलोचना करना जोखिम से खाली नहीं था। फिर भी भारतेंदु ने अपनी लेखनी के माध्यम से जनता को अपने समय को समझने के लिए प्रेरित किया।

उनकी पत्रिकाओं ने हिंदी पत्रकारिता को सामाजिक समस्याओं और जनचेतना से जोड़ा तथा उनके लेखन का प्रभाव इतना था कि तत्कालीन अधिकारियों की भी उस पर नजर रहती थी। इस तरह भारतेंदु की पत्रकारिता राष्ट्रबोध की प्रयोगशाला बन गई, जहां साहित्य समाज से सीधे संवाद करने लगा।

भारतेंदु ने व्यंग्य को भी सामाजिक और राष्ट्रीय जागरण का प्रभावी माध्यम बनाया। अंधेर नगरी इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है। अंधेर नगरी में व्यवस्था की विसंगतियों, मूर्खतापूर्ण शासन और न्याय की विडंबना पर तीखा व्यंग्य है। यह केवल किसी काल्पनिक राजा की कहानी नहीं रह जाती। पाठक उसके भीतर शासन व्यवस्था और सामाजिक विवेक से जुड़े मुद्दों को पहचान सकता है।

भारतेंदु के लिए राष्ट्र केवल भूगोल नहीं था। राष्ट्र उसके भीतर रहने वाले मनुष्यों से बनता था। इसलिए स्त्री शिक्षा, सामाजिक सुधार, धार्मिक पाखंड का विरोध और जनता में जागरूकता पैदा करना भी उनके राष्ट्रबोध का हिस्सा था।

उन्होंने बालाबोधिनी जैसी पत्रिका के माध्यम से महिलाओं तक शिक्षा और विचार पहुंचाने का प्रयास किया। उनके साहित्य में सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार मिलता है। उनके लिए कमजोर और अज्ञानी समाज मजबूत राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकता था। यही कारण है कि भारतेंदु के यहां राष्ट्रप्रेम और समाज सुधार एक दूसरे से अलग दिखाई नहीं देते। देश की उन्नति के लिए व्यक्ति का जागना और समाज का बदलना आवश्यक है।

भारतेंदु के साहित्य में आर्थिक प्रश्न भी राष्ट्रीय चेतना से जुड़े हैं। भारत की गरीबी, आर्थिक निर्भरता और संसाधनों की स्थिति उन्हें परेशान करती थी। भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है में वे भारतीयों को श्रम, उद्योग, आत्मनिर्भरता और आर्थिक सक्रियता की ओर प्रेरित करते हैं। उनके लिए देश की उन्नति केवल राजनीतिक अधिकारों का प्रश्न नहीं थी।

आर्थिक शक्ति और आत्मनिर्भरता भी आवश्यक थी। यह दृष्टि आज भी उल्लेखनीय लगती है क्योंकि किसी भी राष्ट्र का स्वाभिमान उसकी आर्थिक क्षमता से जुड़ा होता है। उन्होंने संस्कृत और भारतीय परंपरा से प्रेरणा ली, लेकिन आधुनिक शिक्षा, पत्रकारिता, विज्ञान और नए विचारों की आवश्यकता को भी स्वीकार किया।

भारतेंदु ने प्राचीन तथा नवीन दोनों के बीच संवाद स्थापित किया। वे अतीत के गौरव को वर्तमान के आत्मविश्वास में बदलना चाहते थे और आधुनिक ज्ञान के माध्यम से भविष्य का निर्माण करना चाहते थे। भारतेंदु हरिश्चंद्र को गुजरे हुए लगभग डेढ़ शताब्दी हो चुकी है। 

लेकिन उनके प्रश्न आज भी हमारे सामने हैं। अपनी भाषा के प्रति सम्मान, शिक्षा का प्रसार, सामाजिक कुरीतियों से मुक्ति, आर्थिक आत्मनिर्भरता, पत्रकारिता की स्वतंत्र चेतना और समाज के भीतर आत्ममंथन की आवश्यकता आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। समाज को इस पर विचार करना चाहिए।

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