भारत रत्न से विभूषित सरदार वल्लभभाई पटेल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महान सेनानी, राजनेता और स्वतंत्र भारत के पहले उपप्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री थे। उन्होंने स्वाधीनता के समय और उसके बाद देश की 562 से अधिक रियासतों का भारतीय संघ में शांतिपूर्ण विलय कराकर आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके इसी दृढ़ संकल्प और ऐतिहासिक योगदान के कारण उन्हें 'भारत का लौह पुरुष' और 'राष्ट्रीय एकता का शिल्पकार' कहा जाता है। उन्होंने सत्ता या निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर राष्ट्रसेवा को प्राथमिकता दी। उनकी ईमानदारी और सादगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि निधन के समय उनके बैंक खाते में बहुत ही सीमित राशि और नाममात्र की संपत्ति थी।

कांग्रेस को मजबूत बनाने में पटेल की भूमिका

यह भी अकाट्य सच है कि कांग्रेस को मजबूत करने में सरदार वल्लभभाई पटेल के कठोर अनुशासन का बड़ा हाथ था। उन्हें कांग्रेस का 'ड्रिल सार्जेंट' भी कहा जाता था। समय आने पर वे महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू की ढाल भी बने अथवा बनाए गए, जिसका भरपूर लाभ जवाहरलाल नेहरू और उनके गुट ने उठाया तथा सरदार वल्लभभाई पटेल को दरकिनार कर दिया। सन् 1939 के त्रिपुरी अधिवेशन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अप्रत्यक्ष रूप से महात्मा गांधी को भी हरा दिया था और कांग्रेस अध्यक्ष बने थे, परंतु सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ कार्यसमिति के 12 सदस्यों के इस्तीफे ने बाजी पलटने में गहरी भूमिका निभाई। सरदार वल्लभभाई पटेल ने राष्ट्र के लिए सर्वस्व अर्पित करने के साथ ही महात्मा गांधी और कांग्रेस के लिए भी पूर्ण आहुति दी, परंतु जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस के गुट ने जब भी मौका मिला, उनके साथ अन्याय ही किया।

प्रधानमंत्री पद की दावेदारी और पटेल की उपेक्षा

सन् 1946 में सरदार वल्लभभाई पटेल के पक्ष में कांग्रेस कार्यसमितियों का बहुमत होने के बावजूद महात्मा गांधी के आग्रह पर जवाहरलाल नेहरू के देश का पहला प्रधानमंत्री बनने का मार्ग प्रशस्त हुआ। सरदार पटेल ने गांधीजी के इस निर्णय का पूरा सम्मान किया तथा कभी नेहरू के नेतृत्व को चुनौती नहीं दी। परंतु जब 15 दिसंबर 1950 को सरदार पटेल का निधन हुआ, तब के.एम. मुंशी जैसे समकालीन लेखक लिखते हैं कि जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और अन्य मंत्रियों को उनके अंतिम संस्कार में सम्मिलित होने से रोकने का प्रयास किया था।

यह भी गौरतलब है कि जवाहरलाल नेहरू और उनके बाद की कांग्रेस सरकारों ने सरकारी योजनाओं, राष्ट्रीय स्मारकों और इतिहास की पुस्तकों में एक विशेष परिवार को अधिक महत्व दिया, जबकि आधुनिक भारत के निर्माता और देश का एकीकरण करने वाले लौह पुरुष को सीमित पहचान दी गई। यह विडंबना भी देखिए कि सरदार पटेल का निधन सन् 1950 में हुआ था, लेकिन उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' लगभग 41 वर्ष बाद, सन् 1991 में मरणोपरांत दिया गया।

संघ पर प्रतिबंध और गांधी हत्या के आरोप का सच

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर सन् 1948 में महात्मा गांधी की हत्या का झूठा आरोप लगाकर प्रतिबंध लगाने में कांग्रेस और जवाहरलाल नेहरू का गहरा हाथ था, जबकि सरदार वल्लभभाई पटेल का मानना था कि महात्मा गांधी की हत्या में संघ का कोई हाथ नहीं था। उल्लेखनीय है कि आपातकाल के दौरान जब संघ पर प्रतिबंध लगा, तब तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहब देवरस ने पुणे के यरवदा कारागृह से सीधे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पत्र लिखा था। उसमें उन्होंने सरदार वल्लभभाई पटेल के पत्र का पूरा सच स्पष्ट किया था। उन्होंने पत्र में सरदार पटेल के उस पत्र का उल्लेख किया, जिसे अक्सर उद्धृत किया जाता है। किंतु उन्होंने पटेल के संवाद का वह हिस्सा भी सामने रखा, जिसे सत्ता ने जानबूझकर छुपा लिया था। वह पत्र, जिसमें सरदार पटेल ने पंडित नेहरू को लिखा था कि गांधीजी की हत्या के षड्यंत्र में संघ का कोई हाथ नहीं है।

विभाजन के समय संघ के स्वयंसेवकों के कार्यों की सराहना

सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रशंसक भी थे। उन्होंने भारत विभाजन के समय देश के विभिन्न हिस्सों में महिलाओं और बच्चों की जान बचाने में संघ के युवाओं द्वारा किए गए कार्यों की सराहना की थी और कहा था कि इस मोर्चे पर कोई समझदार व्यक्ति संघ से शिकायत नहीं कर सकता।तत्कालीन संघ प्रमुख एम.एस. गोलवलकर को लिखे पत्रों में उन्होंने यह भी स्वीकार किया था कि संघ ने हिंदू समाज की सेवा की है। हालांकि, कुछ मुद्दों पर उन्होंने आलोचना भी की थी।

प्रतिबंध हटाने में पटेल की भूमिका और संघ के प्रति दृष्टिकोण

परंतु संघ की वस्तुस्थिति स्पष्ट हो जाने पर सन् 1948 में संघ पर लगाए गए प्रतिबंध को लगभग 19 महीने बाद, सन् 1949 में हटाने का सरदार पटेल का निर्णय यह दर्शाता है कि वे संवाद और सामंजस्य में विश्वास रखते थे। वे संघ की सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों को राष्ट्र निर्माण के सकारात्मक नजरिए से देखते थे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की वास्तविकता से परिचित था। इसलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके समवैचारिक संगठन सरदार पटेल को प्रातःस्मरणीय मानते हुए एक महान देशभक्त, अखंड भारत के प्रणेता तथा देश की भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता को आकार देने वाले महानायक के रूप में देखते हैं। सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कराने और विभाजन के समय शरणार्थियों की सुरक्षा के लिए उनके कड़े रुख को संघ अपनी सांस्कृतिक विचारधारा के अनुकूल मानता है।

राष्ट्रीय एकता दिवस और स्टैच्यू ऑफ यूनिटी

सन् 2014 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती को पूरे भारत में 'राष्ट्रीय एकता दिवस' के रूप में मनाए जाने का निर्णय लिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के निर्देशन में सरदार वल्लभभाई पटेल के सम्मान में गुजरात के केवड़िया में विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' का निर्माण किया गया। इसका अनावरण 31 अक्टूबर 2018 को किया गया।

किसान परिवार में जन्म और प्रारंभिक जीवन

सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में एक किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता झावेरभाई पटेल और माता लाडबा देवी थीं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा करमसद और पेटलाद में हुई। बाद में उन्होंने वकालत की पढ़ाई की और लंदन जाकर 'मिडिल टेम्पल' से 36 माह के पाठ्यक्रम को 30 माह में पूरा करके बैरिस्टर की डिग्री प्रथम श्रेणी में प्राप्त की। भारत लौटने के बाद उन्होंने अहमदाबाद में आपराधिक मामलों के एक सफल वकील के रूप में वकालत शुरू की।

गांधीजी के संपर्क में आने के बाद स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रियता

सन् 1917 में महात्मा गांधी के संपर्क में आने के बाद उन्होंने अपना जीवन देश की आजादी के लिए समर्पित कर दिया। खेड़ा सत्याग्रह (1918), जो अकाल और बाढ़ के बावजूद किसानों से वसूले जा रहे कर के विरुद्ध था, का महात्मा गांधी के नेतृत्व में उन्होंने सफल संचालन किया।

सन् 1928 में बारडोली सत्याग्रह की सफलता के बाद वहां की महिलाओं ने उन्हें 'सरदार' की उपाधि दी। उन्होंने असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया।

रियासतों का एकीकरण और आधुनिक भारत का निर्माण

स्वाधीनता के बाद 1947 से 1950 तक वे देश के पहले उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री रहे। स्वाधीनता के समय भारत 562 से अधिक छोटी-बड़ी देसी रियासतों में बंटा हुआ था। सरदार पटेल ने अपनी कूटनीति, दृढ़ता और सूझबूझ से लगभग सभी रियासतों का भारतीय संघ में ऐतिहासिक एकीकरण किया। हैदराबाद के सैन्य विलय जैसी जटिल परिस्थितियों को भी उन्होंने संभाला। उन्होंने भारत में 'अखिल भारतीय सेवाओं' के ढांचे की नींव रखी। इसलिए उन्हें 'सिविल सेवकों का संरक्षक' भी कहा जाता है।

संविधान निर्माण और मजबूत केंद्र की परिकल्पना

सरदार वल्लभभाई पटेल संविधान सभा की कई महत्वपूर्ण समितियों, जैसे मौलिक अधिकार, अल्पसंख्यक, जनजातीय एवं बहिष्कृत क्षेत्रों से संबंधित समितियों के अध्यक्ष रहे। उन्होंने देश में एक मजबूत केंद्र की वकालत की, ताकि राष्ट्रीय अखंडता बनी रहे। उनका स्पष्ट मानना था कि भारत की भारी भाषाई, धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए देश को एकजुट राष्ट्र के रूप में बनाए रखने के लिए एक मजबूत केंद्र आवश्यक है। देश के विभाजन के समय फैली अशांति और 562 से अधिक रियासतों के विलय के दौरान उन्होंने महसूस किया कि यदि केंद्र कमजोर होगा, तो देश के टुकड़े-टुकड़े हो सकते हैं। मजबूत केंद्र की स्थापना की उनकी अवधारणा आज भारत की एकता और अखंडता के लिए कितनी दूरदर्शी साबित हो रही है।

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।
अपने लेख इस पते पर भेजें :- editatalraag@gmail.com