पिछले दो दिन से प्रेमा देवी की खटर पटर शुरू हो गई है। प्लास्टिक की पन्नियां, कैंची, धागे, सोख्ता लेकर सांझ को बैठ जाती और जाने क्या रंगती चुनती रहती। 

दो दिन बाद रक्षाबंधन है, शहर से भाई गांव आए हैं। प्रेमा का पोता रतन बता रहा था कि बड़े नाना आखिरी समय अपनी माटी में बिताना चाहते हैं, यह सुनकर प्रेमा रतन को सौ सौ गाली देती हैं, भैया जिया तू लाख बरीस। 

राखी से एक दिन पहले दूध और चीनी की मिठाई बनाने की कोशिश भी की गई थी जो थोड़ी जल गई है। राखी वाले दिन रतन की मोटरसाइकिल पर बैठकर वह मायके जा रही हैं।

सरयू प्रसाद बंबई में फोरमैन थे, एक बार शहर जाने के बाद वहीं के होकर रह गए। सारी जिंदगी दो का पांच करने के बाद आखिरी दिनों में उसका मर्म समझ में आया। खेत बारी पहले ही बेंच चुके थे, गांव में दो कमरे और एक छोटी सी बगिया बची थी, बेटा बहू नौकरी चाकरी के सिलसिले में अलग अलग रहते थे, सरयू प्रसाद के पैसा पास में था तो एक नौकर के सहारे गांव चले आए।

सरजू प्रसाद याद करते हैं कि गौने के बाद प्रेमा ससुराल से चिट्ठी लिखती थी,  चिट्ठी में भाई को खूब सहेजती थी। पूजा काल में पिताजी को फूल देने के लिए सहेजना हो, मां के कार्यों में सहायता करना, घर के गोरु बछेरू तक का ध्यान रखने के लिए लिखा होता। धीरे धीरे चिट्ठियों के जवाब उसने देने बंद कर दिए, बिना जवाब के चिट्ठियां भी आनी बंद हो गईं, बचपन के स्नेह को समय का घुन लग गया। 

बीती सुधियां सरजू का हृदय बालस्वरूप कर देती हैं, आज बरसों बरस बाद बगिया के नीचे रुनुक झुनुक पैजनी के स्वर सुनाई  देंगे, झरने सी फूटती हंसी उसकी सांसों की संख्या  बढ़ा देगी। सरजू की आंख से लोर बहने लगता है।

बिटिया धान होती है, एक खेत से दूसरे के खेत जाना होता है तभी तो वह दुहिता कहलाती है, दोनो कुलों का हित करती है।

बहुत दिन बाद प्रेमा अपने गांव जा रही थीं।  जैसे जैसे मायका नजदीक आ रहा था प्रेमा की आंखे अपने आप भरने लगीं।  वह लहक लहक कर खेत , पेड़ , गोरु और घर को देखती जा रही थीं। भाई से मिलने जाने वाले चाहे स्त्री हो या पुरुष सब भरत में बदल जाते हैं, यही भरत भाव प्रेमा की आँखों से झर रहा था, भैया को देखते ही मोटर साइकिल से कूदने को हुईं कि पोते ने संभाल लिया। सरजू खटिया से गिरते पड़ते दौड़े, कीचड़ भरी आंखे आज धुल गईं।

प्रेमा ने राखी निकाली, सरजू ने देखा हल्दी में रंगी सोख्ते वाली राखी चमकीली पन्नी में सजी थी। वह मुस्कुरा उठे, यह कहां मिली? ऐसे तो तुम बचपन में बांधा करती थी।

इसे दादी ने बनाई है बड़े नाना और आपके लिए इन्होंने कंकड़हिया बरफी भी बनाई है, प्रेमा कुछ कहें तब तक रतन हंसते हुए बोल पड़ा। 

सरजू की कलाई कांप रही थी, उन्होंने हाथ आगे किए, बहन ने भाई की कलाई पर फूल खिला दिए। 

फूल पर लिखा था, भैया की लाडली।

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