बेट्टी फ्राइडन की कहानी एक किताब की नहीं, एक पछतावे की कहानी है जिसे आज की फेमिनिस्ट जानबूझकर छुपाती हैं।

1963 में उसने द फेमिनिन मिस्टिक लिखी और कहा कि अमेरिकी गृहिणी अंदर से खाली है, दुखी है, उसकी एक अनाम समस्या है। उसने दो सौ अमीर,  उपनगरीय, कॉलेज पढ़ी औरतों की बोरियत को उठाया और उसे पूरे देश की औरत का सच बता दिया। जो  औरत खेत में काम कर रही थी, जो मजदूर औरत फैक्ट्री में पसीना बहा रही थी, उसकी मजबूरी को उसने कभी देखा ही नहीं।

उसने नारा दिया घर छोड़ो, ऑफिस जाओ, शादी तोड़ो, तभी आजाद होगी। अमेरिका ने उसकी बात मानी। औरतें घर से निकलीं, कॉर्पोरेट खुश हुआ क्योंकि अब एक परिवार में दो नौकरी, दो कार, दो वार्डरोब का बाजार बन गया। तलाक पाँच फीसदी से पचास फीसदी हो गया, बच्चे बिना बाप के पलने लगे, अकेली माँ के घर में अपराध दस गुना बढ़ गया। बीस साल तक बेट्टी को फेमिनिज्म की देवी कहा गया।

फिर 1981 में उसी देवी ने अपनी ही मूर्ति तोड़ दी। उसने दूसरी किताब लिखी द सेकंड स्टेज और उसमें साफ लिखा कि मैं गलत थी। हमने औरतों को घर से बाहर तो निकाल दिया पर ये नहीं बताया कि बाहर निकलने के बाद घर, बच्चे और प्यार का क्या होगा। हमने सुपरवुमन का झूठा सपना दिखा दिया कि तुम सब कुछ कर सकती हो और थकोगी नहीं। इस झूठ ने औरत को आजाद नहीं, और ज्यादा थका दिया।

उसने माना कि परिवार दुश्मन नहीं है, पुरुष दुश्मन नहीं है, बच्चा बाधा नहीं है, घर जेल नहीं है, ये हमारी सबसे बड़ी भूल थी। उसने कहा फेमिनिज्म को अब पुरुषों के खिलाफ नहीं, परिवार के साथ चलना होगा।

यही पछतावा उसकी सजा बन गया। जिस मूवमेंट को उसने बनाया था उसी मूवमेंट की यंग फेमिनिस्ट ने उसे बूढ़ी, बिक चुकी और एंटी फेमिनिस्ट कहकर किनारे लगा दिया।

बेट्टी ने खुद अपनी निजी जिंदगी में भी वही कीमत चुकाई। बाईस साल की शादी, पति पर हिंसा का आरोप, तलाक, तीन बच्चे और बेटा कहता था मेरी माँ घर पर थी ही नहीं। जो अपना घर नहीं संभाल पाई वो करोड़ों औरतों को घर तोड़ने का ज्ञान दे गई।

आखिर में 4 फरवरी 2006 को अपने 85वें जन्मदिन पर ही उसने दम तोड़ा और पीछे छोड़ गई एक चेतावनी कि घर तोड़कर कोई समाज नहीं बनता। आज अमेरिका में औरत नौकरी तो कर रही है पर पहले से ज्यादा एंटी डिप्रेसेंट भी वही खा रही है, सबसे ज्यादा अकेली भी वही है।

बेट्टी कहती है कि  1963 वाली थ्योरी झूठी थी और 1981 वाली माफी  सच थी, पर उसकी किताबें आज भी सिर्फ 1963 वाली पढ़ाई जाती हैं क्योंकि पछतावा बता दिया तो टॉक्सिक फेमिनिज्म का  पूरा धंधा ही बंद हो जाएगा।

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