हिंदुत्व, भारत, राष्ट्रीयता और स्वभाव पर आधारित तंत्र का विचार करते समय बार-बार सनातन का संदर्भ आता है। भारतीय धर्म, संस्कृति और ज्ञान परंपरा पुरातन ही नहीं, सनातन है। केवल विश्व में सबसे प्राचीन होना इसकी विशेषता नहीं है। दर्शन, सिद्धांत और उस पर आधारित जीवन पद्धति त्रिकालाबाधित सत्य का आविष्कार है। इस कारण केवल भारतीय मूल के धर्म ही आधुनिक शास्त्र (Science) की कसौटी पर भी खरे उतरते हैं। वास्तव में कहना यह चाहिए कि हमारी धार्मिक मान्यताओं पर विज्ञान और तकनीकी की नवीन खोजें खरी उतर रही है। ऋषियों ने प्रकृति के गहन सत्यों को साक्षात्कार किया और उस आधार पर समय से परे सदैव विद्यमान सनातन का विकास हुआ है। इसीलिए यह सभी प्रकार के आक्रमणों के पश्चात सहस्राब्दी तक संघर्ष कर वर्तमान में विश्व का मार्गदर्शन करने को तत्पर है। अपने व्यक्तिगत भ्रम, मज़हबी अतिवाद और व्यापारिक हितों के चलते इस सनातन को मिटाने के सभी प्रयास सदा ही विफल हुए हैं। इस इतिहास से अनभिज्ञ आज भी राजनीतिक स्वार्थ से सनातन को समाप्त करने वल्गना की जाती है।

सनातन की मृत्युंजय निरंतरता का रहस्य ऋषियों का तप है। अनादि काल से ऋषियों की शृंखला इस भूमि में सातत्य से तप करती रही है। सनातन धर्म के तत्वों को कालसुसंगत कर युगधर्म का प्रतिपादन इन ऋषियों के तप से होता रहा है। भीषण संघर्ष के कालखंड में भी यह स्वाध्याय चलता रहा। साक्षात् किए सत्य को कर्म में लागू कर धर्म निष्पादन भले ही दुष्कर हो गया हो, सनातन के अनंत संजीवन पर दृढ़ विश्वास के साथ ज्ञान साधना निरंतर रही है। इस तप में एक दिन का भी खंड अथवा विराम नहीं दिखाई देता। नादिर से औरंगज़ेब तक के हिंदुओं के सबसे भयंकर काल में भी देश के किसी ना किसी कोने में ज्ञानसाधना अक्षुण्ण रही। अद्वैत, द्वैत, विशिष्टाद्वैत, भक्ति, कर्मकांड, हठयोग, ध्यान आदि मत, विधि भिन्न भले हो सनातन की साधना निरंतर रही।

षष्ठी की देवी कात्यायनी तप का परिणाम है। एक कथा में ऋषि कात्य द्वारा भगवती को पुत्री रूप में पाने की आकांक्षा से किए उग्र तप से माँ कात्यायनी का जन्म हुआ। मूल कथा अधिक तार्किक रूपक प्रदान करती है। देवताओं द्वारा माता दुर्गा के जन्म हेतु अपनी शक्तियाँ दृष्टि से प्रदान की। अब यह तेज का पुंज प्रत्यक्ष शरीर कैसे धारण करे यह प्रश्न था। प्राण विद्या की घोर साधना से ऊर्जा के कायिक धारण की क्षमता केवल ऋषि कात्य के पास ही थी। देवताओं के निवेदन पर ऋषि ने उस अतुलनीय तेज को धारण कर पुत्री का रूप प्रदान किया। इस प्रकार कात्यायनी दुर्गा का प्रथम अवतरण बना। यह अकल्पनीय विद्या थी। डेढ़-सौ वर्ष पूर्व तक आधुनिक विज्ञान को जड़ और चेतन, ऊर्जा और द्रव्य के मध्य संबंध का भी भान नहीं था। दोनों को पूर्णतः पृथक मानकर ही भौतिकशास्त्र चल रहा था।

स्वामी विवेकानंद के साथ स्वाध्याय में भौतिक विज्ञानी निकोला टेस्ला को उपनिषदों का तथ्य पता चला कि सृष्टि में सब एक है और द्रव्य ऊर्जा का ही घनीभूत रूप है। पदार्थ को प्रकाश की गति से प्रक्षेपित करने पर जड़ ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है। इस सिद्धांत को प्रथम बार निकोला टेस्ला ने जिस शोधपत्र में लिखा उसमें उन्होंने स्वामी विवेकानंद को उद्धृत किया है। इसी शोधपत्र का संदर्भ आइन्सटाइन ने E=MC2 का प्रतिपादन करते समय किया। इसके उपायोजन से आण्विक विभाजन (Nuclear Fission) और संयोग (Fusion) की तकनीक का विकास और अणुबम का आविष्कार क्रमशः एनरिको फर्मी और ओपनहैमर ने किया। द्रव्य पदार्थ के अणु को तोड़ प्रचंड ऊर्जा का निर्माण विज्ञान ने कर लिया किंतु सूक्ष्मतम ऊर्जा को एकात्म कर भौतिक द्रव्य का निर्माण आज भी अशक्य है। प्राणवान शरीर की तो कल्पना भी अभी दूर है। ऋषि कात्य ने यही चमत्कार अपने तप (Research) से कर दिखाया।

भारतीय संस्कृति की सनातनता का रहस्य कात्यायनी के जन्म के इस आख्यान में है। दर्शन तो अमूर्त होता है। उसका केवल साक्षात् किया जा सकता है, प्रतिपादन नहीं। इस शाश्वत जीवन दृष्टि को न्याय के तर्क द्वारा सिद्धांतों को प्रतिपादित करने का कार्य दार्शनिक करते हैं। सिद्धांतों से तत्व बौद्धिक स्तर पर आकलनीय हो जाता है। किंतु सबसे महत्वपूर्ण कार्य इन जटिल सिद्धांतों को सरल आचरण में आने योग्य कर्मकांड और परंपराओं में व्यावहारिक रूप में प्रचलित करना होता है। यह ऋषियों का सबसे रोमांचक योगदान है। वैश्वानर साधना से प्रत्येक में दिव्यता के दर्शन करना एकत्व की जीवन दृष्टि है। ईशावास्य उपनिषद् में ऋषि ने इसे त्याग की अनिवार्यता के सिद्धांत – तेन त्यक्तेन भुन्जिथा: — अतः त्याग से ही भोग करें — के रूप में प्रतिपादित किया। देश भर में प्रतिदिन गोग्रास, कुत्ते को रोटी, कीड़ी-नगरा (चिटियों को गुड खिलाना), आदि विविध परंपराओं में इस सिद्धांत को सहज दैनिक व्यवहार में पिरों दिया है। विवाहादि नैमित्तिक उत्सवों में भी अन्नदान, वस्त्रदान जैसी रूढ़ियों द्वारा त्याग माहात्म्य को रूढ़ किया गया है। नित्य पूजा से लेकर विशेष इष्टियों तक प्रत्येक कर्मकांड में हवन में आहुति, दान और दक्षिणा के द्वारा त्याग को प्रतिष्ठित किया है।

कर्मकांड और परंपराओं ने ही कठिनतम काल में हिंदुत्व की रक्षा की है। इसी कारण स्वातंत्र्यपूर्व ब्रिटिश विद्वानों ने और पश्चात वाममार्गी लेखकों ने कर्मकांड और रूढ़ि परंपराओं की अंधश्रद्धा के रूप में निंदा की। सिद्धांत और शास्त्र को जाने बिना कर्म करना निंदनीय है यह कुतर्क सर्वमान्य हो गया। इससे प्रभावित हिंदू अपने माता-पिता, गुरुजन और धर्माचार्यों का अनादर और उपहास करने लगा। ऐसे अश्रद्ध, जड़ों से कटे व्यक्ति विचारधारा अथवा मज़हब/ रिलिजन में कन्वर्जन के लिए सहज लक्ष्य होते हैं। जबकि आज आधुनिक विज्ञान में भी तकनीक का प्रयोग और लाभ लेनेवालों में से कितने उसके पीछे के शास्त्र, सिद्धांत और तर्क को जानते हैं? यदि यह नियम बना दिया जाए कि चलदूरभाष (Mobile) का प्रयोग वे ही लोग कर सकते हैं जिन्हें बेतार संदेश (Wireless Communication) से लेकर वृहद बहुस्तरीय एकात्मन (VLSI-Very Large Scale Integration) के सिद्धांत पता हो अन्यथा यह अंधश्रद्धा है, तो कैसा हो। जितना हास्यास्पद यह विधान लगता है उतना ही हास्यास्पद बिना सिद्धांत को जाने कर्म का भाव और परंपरा से पालन करनेवालों को पाखंडी कहना है। जैसे आधुनिक विज्ञान के शास्त्र तत्व को जाननेवाले कुछ ही होंगे जबकि बिना ज्ञान के उससे निर्मित तकनीक का प्रयोग करनेवाले लगभग सभी वैसे ही धर्म के गूढ़ तत्व को जाननेवाले कुछ ही ज्ञानी होते हैं। किंतु उनके द्वारा प्रचलित परंपरा का पालन सभी लोग कर सकते हैं।

कात्य ऋषि ने तप द्वारा दैवी तेज को माँ कात्यायनी का रूप प्रदान किया। ग्रंथों और लोक व्यवहार दोनों में पर्याप्त सुलभ भारतीय सनातन ज्ञान परंपरा को तप के द्वारा युगानुकूल शब्दावली और परंपरा में पुनःस्थापित करना सभी विचारवान राष्ट्रांगों का प्रथम कर्तव्य है। मौलिक अध्ययन, नियमित शोधपरक लेखन और कला मंचन के द्वारा ही भारत का तेज पुनः मूर्तिमान होगा। माता कात्यायनी प्रसन्न हो वरदान देगी। 

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