जगदलपुर में बस्तर दशहरे के अवसर पर मुरिया दरबार लगता है, जहाँ कभी बस्तर रियासत के गाँवों और जनजातीय समुदायों से जुड़े लोग अपनी बात शासक तक पहुँचाते थे। समय बदला, राजशाही समाप्त हुई और शासन की व्यवस्था भी बदल गई, लेकिन मुरिया दरबार की परंपरा आज भी चल रही है। छत्तीसगढ़ प्रदेश अस्तित्व में आने के बाद मुख्यमंत्री इस दरबार में उपस्थिति देते रहे हैं, इस बार राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की इसमें सहभागिता हो रही है। 

बस्तर का दशहरा देश के दूसरे हिस्सों में मनाए जाने वाले दशहरे से अलग है। यहाँ रावण दहन इसका मुख्य आकर्षण नहीं है। माँ दंतेश्वरी की आराधना, गाँवों से देवी-देवताओं का आगमन, रथ से जुड़े अनुष्ठान और जनजातीय समाज की सहभागिता इस पर्व को विशिष्ट बनाते हैं। उत्सव की शुरुआत पाट जात्रा से होती है और इसके विभिन्न अनुष्ठान कई सप्ताह तक चलते हैं। बस्तर दशहरे की यही विशेषता है कि इसके धार्मिक आयोजन में स्थानीय समाज की अनेक परंपराएँ एक साथ दिखाई देती हैं। मुरिया दरबार भी इसी आयोजन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

मुरिया दरबार की शुरुआत दो शताब्दी पूर्व की मानी जाती है। उस समय बस्तर रियासत में स्थानीय नेतृत्व की अपनी व्यवस्था थी। मांझी, चालकी और गाँवों के दूसरे प्रतिनिधि अपने क्षेत्रों से जुड़े विषय लेकर दरबार में पहुँचते थे। स्थानीय प्रशासन से संबंधित शिकायतें, अधिकारियों के व्यवहार और ग्रामीण जीवन की समस्याएँ वहाँ रखी जाती थीं। दरबार के माध्यम से इन बातों को शासक तक पहुँचाने का अवसर मिलता था।

उस समय के बस्तर को आज की प्रशासनिक व्यवस्था के चश्मे से देखना उचित नहीं होगा। तब न पंचायत राज की वर्तमान व्यवस्था थी, न निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का वही स्वरूप था, जो आज दिखाई देता है। गाँवों में पारंपरिक पदों और स्थानीय नेतृत्व की अपनी भूमिका थी। लोगों के जीवन से जुड़े कई फैसलों में इन प्रतिनिधियों का महत्व रहता था। मुरिया दरबार में उनकी उपस्थिति से स्थानीय समाज और रियासत के शासन के बीच संवाद का रास्ता बनता था। राजा सर्वोच्च सत्ता का केंद्र था, इसलिए इस व्यवस्था की सीमाएँ भी थीं। फिर भी गाँवों की समस्याओं को दरबार में रखने की परंपरा अपने समय के संदर्भ में महत्वपूर्ण थी।

देश आजाद हुआ तो बस्तर की रियासत का पुराना प्रशासनिक ढाँचा भी बदल गया। राजशाही के स्थान पर संवैधानिक शासन आया। अब नागरिकों के अधिकार कानून से निर्धारित होते हैं और शिकायतों के समाधान के लिए प्रशासनिक कार्यालयों से लेकर न्यायालयों तक की व्यवस्था मौजूद है। इसके बावजूद मुरिया दरबार का जारी रहना बताता है कि किसी परंपरा का जीवन केवल उस शासन व्यवस्था पर निर्भर नहीं रहता, जिसमें उसका जन्म हुआ था। समय के साथ उसका स्वरूप बदल सकता है और उसके आयोजन का अर्थ भी नए संदर्भ ग्रहण कर सकता है।

मुरिया दरबार प्राचीन लोकतंत्र की परम्परा का एक हिस्सा मान सकते हैं। वैसे रियासतकालीन दरबार और आज की लोकतांत्रिक संस्थाओं में अंतर है। उस समय राजा की सत्ता सर्वोपरि थी, जबकि आज शासन संविधान और कानून के अधीन चलता है। फिर भी स्थानीय प्रतिनिधियों द्वारा अपनी समस्याएँ सामने रखने की परंपरा को ध्यान देने योग्य माना जाना चाहिए। इसमें यह समझ दिखाई देती है कि गाँवों में रहने वाले लोगों की बात शासन तक पहुँचनी चाहिए। आज इस विचार को लागू करने के लिए संवैधानिक संस्थाएँ और अधिक प्रभावी साधन उपलब्ध हैं।

बस्तर दशहरे में गाँवों की भागीदारी केवल दर्शक बनकर उत्सव देखने तक सीमित नहीं रहती। अलग-अलग क्षेत्रों से देवी-देवताओं के आगमन और उनसे जुड़े अनुष्ठानों में स्थानीय समुदायों की भूमिका रहती है। उनके लिए यह पर्व अपनी परंपराओं के साथ जुड़ने का अवसर है। मुरिया दरबार इसी सामाजिक भागीदारी को एक अलग दिशा देता है, जहाँ उत्सव के बीच जनजीवन से जुड़े विषय सामने आते हैं। धार्मिक आयोजन और सामाजिक संवाद का यह मेल बस्तर दशहरे को समझने में मदद करता है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की मुरिया दरबार में सहभागिता इस आयोजन को राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान दिलाने वाला अवसर है। जनजातीय समाज से आने वाली देश की राष्ट्रपति का बस्तर पहुँचना प्रतीकात्मक महत्व रखता है। लेकिन इस अवसर का महत्व तस्वीरों और समारोह की खबरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। बस्तर के गाँवों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, वनाधिकार और आजीविका से जुड़े अनेक विषय हैं। स्थानीय समुदायों की जरूरतों को समझने और उनके अनुभवों को नीतियों तक पहुँचाने के लिए ऐसे अवसर उपयोगी हो सकते हैं।

यहाँ मुरिया दरबार की पुरानी भूमिका से आज के प्रशासन के लिए भी एक सीख निकलती है। सरकारी योजनाएँ बनती हैं, अधिकारी नियुक्त होते हैं और शिकायत दर्ज कराने के लिए प्रक्रियाएँ तय की जाती हैं। इसके बाद भी दूरस्थ गाँवों में रहने वाले लोगों को अपनी बात संबंधित अधिकारी तक पहुँचाने में कठिनाई हो सकती है। भाषा, दूरी और सरकारी प्रक्रियाओं की जानकारी का अभाव इसके कारण हो सकते हैं। स्थानीय प्रतिनिधियों के माध्यम से समस्याओं को सुनना और उनके समाधान की स्थिति पर नियमित जानकारी देना प्रशासन को जनता के करीब ला सकता है। 

मुरिया दरबार का महत्व उसके पुराने इतिहास में भी है और आज की भूमिका में भी। इतिहास बताता है कि बस्तर के स्थानीय समाज ने अपनी बात रखने के लिए खुले दरबार का सहारा लिया। वर्तमान व्यवस्था में वही काम अधिक व्यापक अधिकारों और संस्थागत साधनों के माध्यम से किया जा सकता है। परंपरा का सम्मान उसके पुराने स्वरूप को जस का तस बनाए रखने में ही नहीं, बल्कि उसके उपयोगी पक्ष को वर्तमान जीवन से जोड़ने में भी है। असली बात यह होगी कि वहाँ उठने वाली जनसमस्याओं को आयोजन के बाद भी कितना महत्व मिलता है। दरबार में अपनी बात रखने वाले लोगों को यदि आगे चलकर संबंधित कार्यालयों में भी सुनवाई मिले और समस्याओं के समाधान की नियमित जानकारी मिले, तो यह परंपरा आज के समय में भी सार्थक बनी रह सकती है। बस्तर की पहचान उसके उत्सवों से बनती है, लेकिन उन उत्सवों से जुड़ी जनता की आवाज को सुनना भी उतना ही आवश्यक है।

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