जीवन के पथ पर जब अपनों का साया उठ जाता है या परिस्थितियाँ इतनी विकट हो जाती हैं कि माता-पिता अपने ही जिगर के टुकड़ों को पालने में असमर्थ हो जाते हैं, तब दुनिया एक अँधेरी सुरंग जैसी लगने लगती है। ऐसे ही अनाथ और बेसहारा बच्चों के जीवन में उम्मीद का एक सूरज बनकर उभरा है -कर्नाटक राज्य के हुबली का मातृछाया बाल कल्याण केंद्र। और इस संस्था की धड़कन, इसकी प्राण-वायु हैं – रत्ना शिवप्पा पवाडशेट्टी, जिन्हें प्यार से सब “माताजी” पुकारते हैं।

वर्ष 1999 की बात है। हिन्दू सेवा प्रतिष्ठान से प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद, रत्ना जी के भीतर सेवा का जो दीप जला, उसने आगे चलकर कई भूली-बिसरी जिंदगियों को रोशन कर दिया। वर्ष 2006 में जब उन्होंने हुबली स्थित सेवा भारती ट्रस्ट के ‘मातृछाया बाल कल्याण संस्थान’ में कदम रखा, तब इस केंद्र में मात्र 6 बच्चे हुआ करते थे। शुरुआत छोटी थी, संसाधन सीमित थे, लेकिन इरादे फौलादी और दिल में असीम ममता थी।

समय का पहिया घूमा। पहले यह संस्थान सभी बच्चों – लड़के और लड़कियों, दोनों – के लिए खुला था, लेकिन वर्ष 2015 में एक दूरदर्शी निर्णय लेते हुए इसे पूरी तरह से बालिकाओं (लड़कियों) के लिए आरक्षित कर दिया गया। आज इस आँचल के नीचे लगभग 30 बेटियाँ सुरक्षित भविष्य की इबारत लिख रही हैं।

यहाँ आने वाले बच्चे अलग-अलग कहानियों और संघर्षों से जुड़े हैं – कोई अनाथ है, तो किसी के पास केवल एक माता या पिता का ही साया है। जिन माता-पिता के पास दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने या बच्चों को पढ़ाने के संसाधन नहीं हैं, “मातृछाया” उनके लिए एक सुरक्षित मंदिर की तरह है।

इस संस्थान की सबसे बड़ी ताकत इसकी अत्यंत व्यवस्थित दिनचर्या है, जहाँ अनुशासन और संस्कार के साथ सपनों को पंख दिए जाते हैं। आज इसी ममतामयी छाँव की बदौलत यहाँ पलने वाली बेटियाँ साधारण दायरे में बँधकर नहीं रह गई हैं। वे डिप्लोमा, पैरामेडिकल, सोशल वर्क और इंजीनियरिंग जैसे प्रतिष्ठित पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेकर उच्च शिक्षा ग्रहण कर रही हैं और अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं।

“माताजी” रत्ना शिवप्पा और उनकी यह मातृछाया सिर्फ ईंट-गारे का एक भवन नहीं है, बल्कि यह उन सब अभागिन आँखों के लिए एक पूरी दुनिया है, जो कभी आँसुओं से भरी थी, लेकिन आज सपनों की चमक से जगमगा रही है।

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