कश्मीर के मुद्दे पर दशकों तक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को कठघरे में खड़ा करने वाला पाकिस्तान आज स्वयं अपने कब्जे वाले कश्मीर में मानवाधिकारों और लोकतंत्र के सवालों से घिरता दिखाई दिया है। अंतर केवल इतना है कि इस बार आरोप भारत ने नहीं लगाए हैं, बल्कि अमेरिका की धरती से प्रकाशित एक विस्तृत विश्लेषणात्मक रिपोर्ट ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) की उस तस्वीर को दुनिया के सामने रखा है, जो इस्लामाबाद के आधिकारिक दावों से बिल्कुल अलग दिखाई देती है। 

दरअसल, यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है, जब पीओके में महीनों से जारी जनआंदोलन, इंटरनेट बंदी, संचार प्रतिबंध और प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है। वर्षों तक अमेरिका की रणनीतिक प्राथमिकताओं में पाकिस्तान को विशेष स्थान मिलता रहा। शीतयुद्ध के दौर से लेकर अफगानिस्तान युद्ध और आतंकवाद विरोधी अभियानों तक वाशिंगटन और इस्लामाबाद के रिश्ते अनेक उतार-चढ़ाव से गुजरे, लेकिन पाकिस्तान को अक्सर पश्चिमी समर्थन प्राप्त होता रहा। 

भारत समेत विश्‍व के कई देशों ने यह देखा कि कैसे कश्मीर जैसे विषयों पर अमेरिका कई बार पाकिस्तान के दृष्टिकोण के प्रति अपेक्षाकृत नरम रहा। ऐसे परिदृश्य में अमेरिका से प्रकाशित पत्रिका Jacobin में आई रिपोर्ट इसलिए विशेष महत्व रखती है, क्योंकि उसने पहली बार पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के भीतर लोकतंत्र और मानवाधिकारों की वास्तविक स्थिति पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं।

दिखावटी स्वायत्तता या वास्तविक नियंत्रण?

उमैर खुर्शीद, फारूक सुलेहरिया और हैरिस क़दीर द्वारा लिखित रिपोर्ट " Pakistani-Ruled Kashmir Is Facing a Brutal State Crackdown" का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को भले ही स्वायत्त राजनीतिक इकाई के रूप में प्रस्तुत किया जाता हो, लेकिन वास्तविक सत्ता इस्लामाबाद और पाकिस्तान की सैन्य-राजनीतिक व्यवस्था के हाथों में केंद्रित है। 

रिपोर्ट का दावा है कि स्थानीय प्रशासन के पास सीमित अधिकार हैं और अधिकांश महत्वपूर्ण निर्णय पाकिस्तान की संघीय सत्ता के प्रभाव में लिए जाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यही कारण है कि जब भी स्थानीय जनता अधिक लोकतांत्रिक अधिकार, आर्थिक न्याय या राजनीतिक भागीदारी की मांग करती है, तो उसका उत्तर संवाद नहीं, बल्कि दमन के रूप में सामने आता है।

चुनाव भी सवालों के घेरे में

रिपोर्ट पीओके की चुनावी व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्न उठाती है। उसमें आरोप लगाया गया है कि आरक्षित सीटों और राजनीतिक संरचना के माध्यम से इस्लामाबाद अपने अनुकूल सरकारों के गठन को प्रभावित करता है। यदि यह आरोप सही हैं, तो लोकतंत्र का वह मॉडल, जिसे पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुत करता रहा है, उसकी विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।

आर्थिक संकट से जनविद्रोह तक

वर्तमान आंदोलन केवल बिजली के बिलों या महंगाई का विरोध नहीं है। इसकी पृष्ठभूमि वर्ष 2023 से तैयार हो रही थी, जब पीओके में बढ़ती महंगाई, आटा संकट, बिजली दरों में वृद्धि और ईंधन की कीमतों के विरोध में व्यापक जनआंदोलन शुरू हुआ। उस समय जनता के दबाव में पाकिस्तान को कुछ आर्थिक रियायतें देनी पड़ी थीं, लेकिन असंतोष समाप्त नहीं हुआ। 5 जून 2026 से आंदोलन का नया चरण प्रारंभ हुआ, जिसे रिपोर्ट पिछले कई दशकों का सबसे व्यापक जनआंदोलन बताती है। 

आंदोलनकारियों का कहना है कि वे केवल सस्ती बिजली या राहत पैकेज नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक और आर्थिक भविष्य पर वास्तविक अधिकार चाहते हैं। रिपोर्ट के अनुसार आंदोलन तेज होते ही पूरे क्षेत्र में इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं। मोबाइल संचार भी बाधित कर दिया गया। संचार पर प्रतिबंधों ने बाहरी दुनिया तक सूचनाओं की पहुंच को सीमित कर दिया। ऐसे कदम अक्सर तब उठाए जाते हैं, जब सरकारें विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करना चाहती हैं।

रावलकोट बना संघर्ष का प्रतीक

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 27 जुलाई को रावलकोट की ओर मार्च कर रहे हजारों निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर सुरक्षा बलों ने गोलीबारी की। इसके बाद 28 और 29 जुलाई को भी अलग-अलग स्थानों पर हिंसा जारी रही।

रिपोर्ट के अनुसार 5 जून से जुलाई के अंत तक 45 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई, जबकि आंदोलनकारियों का दावा है कि मृतकों की वास्तविक संख्या इससे भी अधिक हो सकती है। सैकड़ों लोगों के घायल होने की भी बात कही गई है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है, किंतु यदि निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय जांच होती है तो पूरे घटनाक्रम की वास्तविक तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।

जॉइंट आवामी एक्शन कमेटी की भूमिका

रिपोर्ट के अनुसार आंदोलन का नेतृत्व जॉइंट आवामी एक्शन कमेटी कर रही है। इसकी प्रमुख मांगों में बिजली दरों में कमी, महंगाई से राहत, स्थानीय संसाधनों पर अधिकार, पारदर्शी प्रशासन और अधिक राजनीतिक स्वायत्तता शामिल हैं। रिपोर्ट का आरोप है कि इन मांगों पर गंभीर संवाद की बजाय प्रशासनिक दमन को प्राथमिकता दी गई।

कश्मीर की राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास

पाकिस्तान दशकों से स्वयं को कश्मीरी मुसलमानों का सबसे बड़ा हितैषी बताता रहा है। संयुक्त राष्ट्र सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वह मानवाधिकारों के मुद्दे पर भारत की आलोचना करता रहा है। किंतु अमेरिकी रिपोर्ट का निष्कर्ष इस दावे के विपरीत तस्वीर प्रस्तुत करता है। यदि वही राज्य, जो स्वयं को कश्मीर का संरक्षक बताता है, अपने प्रशासनिक नियंत्रण वाले क्षेत्र में विरोध कर रहे नागरिकों पर बल प्रयोग के आरोपों से घिर रहा है, तो उसकी नैतिक विश्वसनीयता स्वतः प्रश्नों के घेरे में आ जाती है।

इतिहास भी देता है संकेत

पीओके में असंतोष नया नहीं है। वर्षों से वहां संसाधनों के दोहन, सीमित संवैधानिक अधिकार, राजनीतिक हस्तक्षेप, जलविद्युत परियोजनाओं से मिलने वाले लाभ के असमान वितरण और स्थानीय प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर विरोध दर्ज होता रहा है। अनेक मानवाधिकार संगठनों ने समय-समय पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक गतिविधियों पर नियंत्रण संबंधी चिंताएं व्यक्त की हैं, हालांकि पाकिस्तान इन आरोपों को लगातार खारिज करता रहा है।

बदलते अंतरराष्ट्रीय विमर्श का संकेत

जैकोबिन की यह रिपोर्ट केवल पीओके की स्थिति का वर्णन भर नहीं करती, बल्कि अंतरराष्ट्रीय विमर्श में संभावित बदलाव का संकेत भी देती है। यदि पश्चिमी जगत में भी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के लोकतांत्रिक ढांचे, मानवाधिकारों और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर बहस शुरू होती है, तो कश्मीर के प्रश्न पर लंबे समय से स्थापित राजनीतिक आख्यानों की पुनर्समीक्षा हो सकती है।

कश्मीर के नाम पर वैश्विक मंचों पर नैतिक बढ़त लेने का प्रयास करने वाले पाकिस्तान के सामने अब चुनौती यह है कि वह पहले अपने नियंत्रण वाले क्षेत्र में लोकतांत्रिक अधिकारों, नागरिक स्वतंत्रताओं और राजनीतिक भागीदारी से जुड़े सवालों का संतोषजनक उत्तर दे। क्योंकि यदि किसी क्षेत्र की जनता स्वयं अपने राजनीतिक भविष्य पर अधिकार, आर्थिक न्याय और लोकतांत्रिक सम्मान की मांग कर रही हो, तो केवल संवैधानिक शब्दावली से वास्तविक स्वायत्तता सिद्ध नहीं होती। यही संदेश अमेरिकी धरती से प्रकाशित यह रिपोर्ट दुनिया के सामने रखने का प्रयास करती है।

पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर और गिलगित-बल्तिस्तान में सात दशकों से दमन, मानवाधिकार उल्लंघन और लोकतांत्रिक अधिकारों का मौजूद है संकट

पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoJK) और गिलगित-बल्तिस्तान का इतिहास केवल एक क्षेत्रीय विवाद का इतिहास नहीं है, बल्कि वहां रहने वाले लाखों लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकारों पर लगातार लगती रही बंदिशों का भी इतिहास है। 1947 में पाकिस्तान के गठन के बाद से ही इन क्षेत्रों में सेना, अर्धसैनिक बलों तथा सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका अत्यधिक प्रभावशाली रही है। 

अंतरराष्ट्रीय मीडिया और स्वतंत्र मानवाधिकार संगठनों की सीमित पहुंच के कारण वहां हुई घटनाओं का संपूर्ण और आधिकारिक दस्तावेजीकरण संभव नहीं हो पाया है। फिर भी उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों, मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों तथा स्थानीय नागरिक संगठनों के दस्तावेज यह संकेत देते हैं कि दशकों से इस क्षेत्र में व्यापक स्तर पर दमन, मनमानी गिरफ्तारियां, राजनीतिक दखल और हिंसा की घटनाएं सामने आती रही हैं।

1947 : मीरपुर और मुजफ्फरराबाद की त्रासदी

अक्टूबर 1947 में जम्मू-कश्मीर पर हुए कबायली आक्रमण को अनेक इतिहासकार पाकिस्तान समर्थित सैन्य अभियान का हिस्सा मानते हैं। इस दौरान मीरपुर, मुजफ्फरराबाद, कोटली और भिंबर सहित अनेक क्षेत्रों में व्यापक हिंसा हुई। विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार इस अवधि में हजारों हिंदू और सिख नागरिकों की हत्या हुई, बड़ी संख्या में महिलाओं का अपहरण किया गया तथा व्यापक लूटपाट हुई। विशेष रूप से मीरपुर हिन्‍दू नरसंहार को इस क्षेत्र के सबसे भीषण मानवीय संकटों में गिना जाता है। विभिन्न अध्ययनों में मृतकों की संख्या अलग-अलग बताई गई है, जो लगभग 20,000 से 30,000 के बीच मानी जाती है। इस घटना ने क्षेत्र की जनसांख्यिकी और सामाजिक संरचना को स्थायी रूप से प्रभावित किया। यानी कि इतनी बड़ी संख्‍या में यहां हिन्‍दू नरसंहार किया गया। 

1988 : गिलगित-बल्तिस्तान में सांप्रदायिक हिंसा

मई 1988 में गिलगित-बल्तिस्तान में व्यापक सांप्रदायिक हिंसा हुई। अनेक स्वतंत्र अध्ययनों और मानवाधिकार संबंधी विवरणों में उल्लेख मिलता है कि इस हिंसा में सैकड़ों घर जलाए गए तथा बड़ी संख्या में नागरिक मारे गए। मृतकों की संख्या विभिन्न स्रोतों में अलग-अलग बताई गई है, जबकि कई स्थानीय संगठनों ने अनेक लोगों के लापता होने का भी दावा किया। इस घटना की प्रकृति और जिम्मेदारी को लेकर विभिन्न विवरण मौजूद हैं, लेकिन यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि यह क्षेत्र के इतिहास की सबसे गंभीर सांप्रदायिक हिंसाओं में से एक थी, यहां चुन-चुन कर एक ओर गैर मुसलमानों को निशाना बनाया गया, वहीं पाकिस्‍तान की सेना ने यहां रह रहे मसलमानों पर भी भयंकर जुल्‍म किया।

1992 : 'आजाद कश्मीर' की मांग और गोलीबारी

1990 के दशक में फरवरी 1992 में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों द्वारा गोलीबारी की घटना दर्ज है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार इस कार्रवाई में कई प्रदर्शनकारियों की मृत्यु हुई तथा बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार किया गया। मृतकों की संख्या अलग-अलग स्रोतों में भिन्न बताई गई है।

हाल के वर्षों में बढ़ता जनअसंतोष

पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में महंगाई, बिजली संकट, कर व्यवस्था, संसाधनों के वितरण तथा स्थानीय प्रशासन में सेना की भूमिका को लेकर व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए हैं। विशेष रूप से Joint Awami Action Committee (JAAC) के नेतृत्व में हुए आंदोलनों ने क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया। स्थानीय संगठनों तथा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध बल प्रयोग, मनमानी गिरफ्तारियां तथा इंटरनेट प्रतिबंध जैसे कदम उठाए गए। 

पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर और गिलगित-बल्तिस्तान का गहराई से अध्‍ययन करें तो सामने आता है कि 1947 की हिंसा, 1988 की सांप्रदायिक घटनाएं, 1992 की गोलीबारी, 2005 के भूकंप के बाद राहत कार्यों पर उठे प्रश्न तथा हाल के वर्षों में नागरिक आंदोलनों के दौरान किए गए दमन में अब तक एक लाख से अधि‍क लोगों को यहां या तो मार दिया गया अथवा गायब कर दिया गया है।

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