व्याकरण की दृष्टि से ‘अध्यात्म’ शब्द बना है— अधि + आत्मन् से। इस शब्द को समझने के लिए पहले ‘अधि’ उपसर्ग को समझना आवश्यक है। संस्कृत में ‘अधि’ एक महत्त्वपूर्ण उपसर्ग है। कोशों में इसके अर्थ बताए गए हैं— ऊर्ध्व,
ऊपर, पर, अधिक, प्रधान, स्वामी, किसी वस्तु के ऊपर स्थित या उसके संबंध में। विदित है कि इसी अधि उपसर्ग से अनेक प्रचलित शब्द बने हैं। उदाहरण के लिए— अधिक (अधि+क = अधिक) — मात्रा में बढ़ा हुआ, ज्यादा, अतिरिक्त। अधिमास : बढ़ा हुआ (एक) महीना, जिसे मलमास भी कहा जाता है। अधिदेवता– प्रमुख या मुख्य देवता। अधिपति — ऊपर स्थित स्वामी या शासक। ‘पति’ का शाब्दिक अर्थ स्वामी है, और ‘अधि’ जुड़ने से अर्थ हो जाता है— ऊपर से शासन करने वाला।अधिकार — किसी विषय पर स्वामित्व या नियंत्रण। अध्यक्ष — जो ऊपर बैठकर देखे, अर्थात् पर्यवेक्षण करने वाला।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि ‘अधि’ का मूल भाव है— ऊपर होना, प्रधान होना या नियंत्रण रखना।
अब दूसरे अवयव पर ध्यान दें— आत्मन्। जानना चाहिए कि संस्कृत में ‘आत्मन्’ (आत्मा) शब्द अत्यंत व्यापक अर्थों में प्रयुक्त होता है। सामान्य अर्थ में इसका प्रयोग आत्मा, जीव, प्राण, मन, स्वभाव, प्रकृति, चेतना या व्यक्ति के भीतरी स्वरूप के लिए होता है। 

भाषिक दृष्टि से यह भी महत्त्वपूर्ण है कि कई संदर्भों में ‘आत्मन्’ का प्रयोग स्वयं, अपना या अपने आप के अर्थ में भी होता है। इस प्रकार यह शब्द व्यक्ति की भीतरी सत्ता या उसके अंत:स्वरूप का बोध कराता है।

अब इन दोनों को जोड़कर देखें—अधि + आत्मन् = अध्यात्म। व्याकरण की दृष्टि से इसका अर्थ होगा— आत्मा के संबंध में, आत्मा के ऊपर या आत्मा से संबंधित विचार।

यहाँ ‘अधि’ का अर्थ केवल स्थानसूचक नहीं है, बल्कि यह प्राधान्य और उच्चतर सत्ता का भी बोध कराता है। सरल शब्दों में कहें तो— सत्ता से ऊपर की सत्ता अध्यात्म है या आत्मा से ऊपर परमात्मा की सत्ता का स्वीकार ही अध्यात्म है। इसका आशय यह है कि मनुष्य जब यह स्वीकार करता है कि उसका अस्तित्व केवल शरीर तक सीमित नहीं है और उसके भीतर जो चेतना है, वह किसी व्यापक सत्ता से जुड़ी है, तब वह अध्यात्म की दिशा में प्रवेश करता है। 

निष्कर्षत:, ‘अधि’ उपसर्ग हमें ऊपर या प्रधान सत्ता का बोध कराता है और ‘आत्मन्’ मनुष्य के भीतरी अस्तित्व का। इन दोनों के मेल से बना ‘अध्यात्म’ उस विचार का नाम है, जिसमें मनुष्य अपने भीतर की सत्ता को पहचानते हुए उससे ऊपर की परम सत्ता को स्वीकार करता है।

विशेष : ध्यान रहे कि संस्कृत में आत्मा पुंल्लिंग है, जबकि हिंदी में स्त्रीलिंग है।

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