भारतीय में सदैव ही संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के वक्तव्य और उनका सामाजिक आचरण देश की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। अगस्त 2017 में जब भारत के तत्कालीन निवर्तमान उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने अपने विदाई साक्षात्कार में यह दावा किया कि "देश के मुसलमानों में बेचैनी और असुरक्षा की भावना बढ़ रही है", तो इसने देश के राजनीतिक और बौद्धिक हलकों में एक राष्ट्रव्यापी बहस को जन्म दे दिया था। इस बयान के परोक्ष जवाब में तत्कालीन नवनिर्वाचित उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू का यह कहना, "हिंदू कभी कट्टरपंथी नहीं होता, भारत दुनिया का सबसे सहिष्णु देश है", वास्‍तव में एक सही तथ्‍य है। 

वस्‍तुत: यह भारत की हजारों वर्ष पुरानी उस सनातन संस्कृति का उद्घोष था जिसने हमेशा 'वसुधैव कुटुंबकम्' (संसार ही परिवार है) और 'सर्वधर्म समभाव' को जिया है।  प्राचीन वैश्विक प्रमाणों से लेकर वर्तमान में जब भी धर्म और विचारधाराओं के प्रसार का अध्ययन किया जाता है, तो तलवार और जबरन धर्मांतरण (मतान्‍तरण) के अनगिनत उदाहरण मिलते हैं, किंतु हिंदू धर्म (सनातन धर्म) का इतिहास इससे पूरी तरह भिन्न है। 

यहां विचारों की बहुलता है। वस्‍तुत:  हिंदू धर्म किसी एक पुस्तक, एक पैगंबर या एक निश्चित नियम से नहीं बंधा है। यहाँ आस्तिक (ईश्वर को मानने वाले), नास्तिक (ईश्वर को न मानने वाले), मूर्तिपूजक और अमूर्त की उपासना करने वाले, सभी को 'हिंदू' माना गया है। जहाँ विचारों की ऐसी स्वतंत्रता हो, वहाँ कट्टरपंथ के पनपने की भूमि ही नहीं बचती।भारत की बहुसंख्यक हिंदू आबादी के सहिष्णु स्वभाव का सबसे बड़ा साक्ष्य यह है कि सदियों से दुनिया भर में प्रताड़ित धर्मों को भारत ने बिना किसी शर्त के अपनाया।

जब रोमन साम्राज्य द्वारा यहूदियों को प्रताड़ित किया गया, तो वे भारत आए। भारत एकमात्र ऐसा देश है जहाँ यहूदियों को कभी भी उत्पीड़न का सामना नहीं करना पड़ा। इसी तरह से आप पारसी, जिन्‍हें  ईरान में इस्लामी आक्रमण का भयंकर सामना करना पड़ा, बड़ी संख्‍या में कन्‍वर्ट हो जाना पड़ा था, उनमें से कुछ पारसी किसी तरह से अपनी संस्कृति बचाने के लिए वहां से भागे तो सीधे गुजरात जा पहुंचे। वहां के हिंदू राजा जदि राना ने उन्हें शरण देने के साथ अपनी धार्मिक स्वतंत्रता बनाए रखने की पूरी छूट दी। आज पारसी समाज भारत के सबसे सफल और सम्मानित समुदायों में से एक है।

यदि कल की बात पीछे रख भी दें तो आधुनिक इतिहास में दलाई लामा और हजारों तिब्बती बौद्धों को भारत ने तिब्बत पर चीनी नियंत्रण के बाद गले लगाया। वे भारत में आज अपनी निर्वासित सरकार चला रहे हैं। उनके बच्‍चे भारतीय विद्यालयों एवं विश्‍वविद्यालयों से ज्ञान प्राप्‍त कर रहे हैं। एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति: ऋग्वेद का यह महावाक्य (सत्य एक है, विद्वान इसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं), हिंदू चिंतन का मूल आधार आप इस धरा पर सदियों से सतत साक्षत होते पाते हैं। वस्‍तुत: यह दर्शन कभी यह दावा नहीं करता कि "अकेला मेरा ही मार्ग सत्य है और बाकी सब नरक के भागी हैं।" कट्टरपंथ की शुरुआत इसी दावे से होती है कि "मेरा रास्ता ही एकमात्र सही रास्ता है", जोकि हिंदू दर्शन के मूल सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत है।

हामिद अंसारी के विवादित बयानों का कालक्रम और साक्ष्य

दूसरी ओर हामिद अंसारी  जैसे लोग हैं, जोकि अपनी एक तय मानसिक सोच से बाहर ही निकलना नहीं चाहते। वर्ष 2026 के जनसांख्यिकीय अनुमानों के अनुसार, भारत में मुस्लिम आबादी लगभग 20 से 22 करोड़ होने का अनुमान है, जो देश की कुल जनसंख्या का 14.5 से 15 फीसद के बीच बैठती है। लक्षद्वीप में सबसे अधिक लगभग 97 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्‍या हो चुकी है, जबकि जम्मू-कश्मीर में जनसंख्या में 69 फीसद हैं। वहीं देश के कुछ अन्‍य राज्यों में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है और वे सामाजिक-राजनैतिक रूप से एक बड़ा हिस्सा हैं। 

इस श्रेणी में असम सबसे आगे है, जहाँ 35 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय से है। इसके बाद पश्चिम बंगाल है, जहाँ सीमावर्ती जिलों में सघनता के कारण यह आबादी 27.5 से 28 फीसद के करीब मुस्‍लिम जनसंख्‍या है। दक्षिण भारत के केरल राज्य में भी मुस्लिम आबादी का अनुपात कुल जनसंख्या का 26.5 से 27 प्रतिशत के आसपास है।उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत भले ही 19.5 से 20 फीसद के करीब है, जोकि यहाँ मुस्लिम नागरिकों की संख्या देश में सबसे अधिक (लगभग 4.5 करोड़ से अधिक) है। इसी तरह बिहार में यह आबादी 17 फीसद से 17.5 और झारखंड में लगभग 15 प्रतिशत के आसपास होने का अनुमान है।

उत्तराखंड में लगभग 14 से 14.5, कर्नाटक में 13 से 13.5, तथा नवगठित तेलंगाना में भी यह अनुपात 12.5 से 13 फीसद के बीच ये जनसंख्‍या है। देश की राजधानी दिल्ली (एनसीआर) और औद्योगिक रूप से समृद्ध महाराष्ट्र में मुस्लिम आबादी का हिस्सा क्रमशः 13 और 12 प्रतिशत के करीब आंका गया है, जबकि गुजरात में यह आबादी लगभग 10.5 प्रतिशत के स्तर पर स्थिर है। शेष भारत के बड़े राज्यों जैसे राजस्थान (9.5), आंध्र प्रदेश (9), हरियाणा (7.5) और मध्य प्रदेश (7 प्रतिशत) में यह समुदाय महत्वपूर्ण जनसंख्‍या के रूप में मौजूद है। 

ओवरऑल ट्रेंड्स बताते हैं कि मुस्लिम समाज की हर राज्‍य में प्रजनन दर हिन्‍दुओं और अन्‍य अल्‍पसंख्‍यकों से अधिक बनी हुई है। यहां बड़ा प्रश्‍न यह है कि यदि इन पर अत्‍याचार हो रहे होते, इन्‍हें देश में किसी तरह से प्रताड़‍ित किया जा रहा होता, तो क्‍या इनकी जनसंख्‍या इतनी आसानी से बढ़ सकती है? 

एक राजनयिक और फिर लगातार दो बार (10 वर्षों तक) देश के उपराष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद पर रहने के बावजूद, हामिद अंसारी के कई बयानों और निर्णयों ने देश के बहुसंख्यक समाज और राजनीतिक विश्लेषकों को आज आहत किया है। उनके बयानों में एक खास प्रकार का चश्मा (Identity Politics) झलकता है। वस्‍तुत: आप उनके प्रमुख विवादित बयानों की सूची और उनके निहितार्थ इन घटनाओं से भी समझ सकते हैं। 

विदाई साक्षात्कार (अगस्त 2017)- मुसलमानों में असुरक्षा की भावना

अपने कार्यकाल के आखिरी दिन दूरदर्शन और राज्यसभा टीवी को दिए इंटरव्यू में अंसारी ने कहा कि देश के अल्पसंख्यकों (विशेषकर मुसलमानों) में घबराहट, बेचैनी और असुरक्षा का माहौल है। उनके इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया हुई। सवाल उठना स्‍वभाविक था कि जो व्यक्ति पिछले 10 सालों से देश के दूसरे सबसे बड़े संवैधानिक पद पर सुरक्षित बैठा था, जिसे देश ने अपार सम्मान दिया, वह पद से हटते ही पूरे देश को सहिष्णुता के कटघरे में खड़ा कर रहा है?  

तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में अपने विदाई भाषण में परोक्ष रूप से कहा था कि शायद अंसारी जी अब अपनी पुरानी राजनयिक और वैचारिक पृष्ठभूमि (जहाँ वे खाड़ी देशों में भारत के राजदूत रहे थे) के अनुसार काम करने के लिए स्वतंत्र महसूस कर रहे हैं।

 टिप्पणी (सितंबर 2026)

हाल ही में, सितंबर 2026 में नई दिल्ली में एक व्याख्यान के दौरान, हामिद अंसारी ने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के एक पुराने उद्धरण का सहारा लेते हुए कहा कि भारत को असली खतरा कम्युनिज्म से नहीं, बल्कि "हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता" से है। इस बयान को बहुसंख्यक हिंदू समाज को बदनाम करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, यह भी स्‍वभाविक ही है, क्‍योंकि वैश्विक स्तर पर जब रिलीजियस (मजहबी) कट्टरवाद और आतंकवाद एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं, तब भारत के एक पूर्व उपराष्ट्रपति द्वारा सिर्फ बहुसंख्यक समाज की सांप्रदायिकता को देश का सबसे बड़ा खतरा बताना उनकी पक्षपातपूर्ण मानसिकता को दर्शाता है।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की आलोचना (जनवरी 2022)

गणतंत्र दिवस के अवसर पर इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (आईएएमसी) द्वारा आयोजित एक वर्चुअल अमेरिकी कार्यक्रम में इन्‍हीं अंसारी साहब ने भारत में 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के उदय पर चिंता जताई और दावा किया कि यह नागरिक समाज को विभाजित कर रहा है। जबकि यह आज कौन नहीं जानता कि आईएएमसी नामक संगठन पर भारत विरोधी एजेंडा चलाने और पाकिस्तान की लॉबिंग से जुड़े होने के अनेक साक्ष्‍य समय-समय पर सामने आते रहे हैं। 

वस्‍तुत: ऐसे मंच पर जाकर भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति द्वारा देश की आंतरिक राजनीति और सामाजिक ताने-बाने पर टिप्पणी करने को आखिर क्‍या कहा जाएगा? यह सीधे तौर पर "विदेशी धरती से भारत की छवि खराब करने का प्रयास" माना जाएगा। इतना ही नहीं, बयानों के अलावा हामिद अंसारी का सार्वजनिक आचरण भी कई बार विवादों के घेरे में रहता रहा है, जिससे यह संदेश गया कि वे देश के सर्वसमावेशी प्रोटोकॉल के बजाय एक विशिष्ट दृष्टिकोण को प्राथमिकता दे रहे थे। 

उदाहरण स्‍वरूप आप देखें कि कैसे उन्‍होंने योग दिवस की अवहेलना की! जहां एक ओर 21 जून 2015 को विश्‍व के 192 देश एक साथ अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने के लिए एकसाथ आए, जब पूरा विश्व भारत की पहल पर पहला अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मना रहा था और राजपथ पर भव्य कार्यक्रम हो रहा था, तब तत्कालीन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी वहाँ अनुपस्थित थे। 

आज फिर यह बात कौन नहीं जानता कि प्रतिबंधित इस्‍लामिक अतिवादी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के मंच पर उनकी प्रभावी उपस्थिति दर्ज की जाती रही।  बात यह सितंबर 2017 की है। पदमुक्त होने के तुरंत बाद, अंसारी केरल के कोझिकोड में पीएफआई से जुड़े एक संगठन 'नेशनल वीमेंस फ्रंट' के कार्यक्रम में शामिल हुए। जिस इस्‍लामिक कट्टरपंथी संगठन पर सुरक्षा एजेंसियों की पैनी नजर हो, जो लगातार देशविरोधी गतिविधियों के लिप्‍त रहे। देश के पूर्व उपराष्ट्रपति का ऐसे विवादित पृष्ठभूमि वाले संगठन के मंच पर जाना स्‍वभाविक तौर पर उनके आचरण पर गंभीर सवाल खड़े करता है।अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भारत के विभाजन के मुख्य सूत्रधार मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर को लेकर जब विवाद हुआ, तो अंसारी ने यूनिवर्सिटी के छात्रों के रुख का समर्थन करते हुए पत्र लिखा। इस आचरण को भी सहजता से स्वीकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि जिन्ना की तस्वीर का समर्थन करना देश के विभाजन के घावों पर नमक छिड़कने जैसा है। 

यदि हम वेंकैया नायडू के बयान की गहराई में जाएं, तो भारत का ताना-बाना इस बात की गवाही देता है कि बहुसंख्यक हिंदू समाज ने कभी भी राज्य सत्ता का उपयोग दूसरों को दबाने या उनका धार्मिक स्वरूप बदलने के लिए नहीं किया। ईश्वर एक है, परन्‍तु उस तक पहुँचने के रास्ते अनेक हैं (सर्वधर्म समभाव) यह विचार सनातन हिन्‍दू धर्म, हिन्‍दुत्‍व का मूल विचार दर्शन है। हिंदू समाज की संरचना ही इस प्रकार की है कि उसमें 'कट्टरपंथ' एक अपवाद तो हो सकता है, लेकिन वह समाज का मुख्य नियम कभी नहीं बन सकता।

आत्ममंथन की आवश्यकता

"हिंदू कभी कट्टरपंथी नहीं होता हामिद साहब, आप अपने बयानों पर गौर करें, अपने आचरण को देखें", वस्‍तुत: यह पंक्ति एक तरह से देखें तो आपकी मानसिकता को दर्शा रही है, जो दक्षिणपंथ के नाम पर आपके मन के भीतर भरे हुए हिन्‍दू द्रोह को बाहर ले आई है। आज आपका यह हिन्‍दुओं के प्रति विद्वेषपूर्ण आचरण साफ बता रहा है कि आप नफरत, ईर्ष्या, या शत्रुता से किस हद तक भरे हुए हो। 

वस्‍तुत: हर हिन्‍दू को या कहना चाहिए कि देश के उस आम नागरिक को भी यह पीड़ा है कि जिस बहुसंख्यक समाज ने देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम, डॉ. जाकिर हुसैन, फखरुद्दीन अली अहमद और खुद हामिद अंसारी को सहर्ष और ससम्मान बिठाया, उसी समाज को बार-बार 'असहिष्णु' और 'कट्टरपंथी' साबित करने का प्रयास किया जाता है।

हामिद अंसारी जैसे प्रबुद्ध, अनुभवी और दीर्घकाल तक सत्ता के शीर्ष पर रहे व्यक्तित्व से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे देश को जोड़ने वाले धागे बनेंगे। जब वे विदेशी मंचों या संकीर्ण सामाजिक मंचों से देश के सामाजिक ताने-बाने पर सवाल उठाते हैं, तो वे सच मायनों में उन ताकतों को भी बल दे रहे होते हैं जो भारत को कमजोर करना चाहती हैं। भारत की सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता इसलिए सुरक्षित है क्योंकि यहाँ का बहुसंख्यक हिन्‍दू समाज स्वभाव से उदार और सनातन मूल्यों से पोषित है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि बयानों की राजनीति से ऊपर उठकर भारत की मूल सांस्कृतिक चेतना और संवैधानिक मर्यादाओं का आदर किया जाए। अच्‍छा हो हामिद साहब इस बात को समझें!

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