अलाउद्दीन खिलजी की कुटिलता और गोरा-बादल के अद्भुत शौर्य की गाथा

अपने स्वत्व और स्वाभिमान की रक्षा के लिए क्षत्राणियों की अगुवाई में स्त्रियों और बच्चों द्वारा स्वयं को अग्नि में समर्पित कर देने का इतिहास केवल भारत में मिलता है। इनमें सबसे अधिक शौर्यपूर्ण और मार्मिक प्रसंग चित्तौड़ की रानी पद्मावती के जौहर का है, जिसका उल्लेख इतिहास के विभिन्न विवरणों में मिलता है। इतिहास-प्रसिद्ध इस जौहर पर धारावाहिक और फिल्में भी बनी हैं। राजस्थान की लोकगाथाओं में सर्वाधिक उल्लेख इसी जौहर का मिलता है।

जौहर के विवरण भारत की अधिकांश रियासतों के इतिहास में मिलते हैं। जौहर की स्थिति तब बनती थी, जब पराजय और समर्पण के अतिरिक्त सारे मार्ग बंद हो जाते थे। जौहर के सर्वाधिक प्रसंग राजस्थान के हैं। वहाँ कोई भी ऐसी रियासत नहीं, जहाँ जौहर न हुआ हो। चित्तौड़ में सबसे पहला और सबसे बड़ा जौहर रानी पद्मावती का ही माना जाता है।

रानी पद्मावती सिंहल द्वीप की राजकुमारी थीं। उनका मूल नाम पद्मिनी था, जो विवाह के बाद पद्मावती हुआ। सिंहल द्वीप का नाम अब श्रीलंका है। उनके पिता राजा चंद्रसेन सिंहल द्वीप के शासक थे। उन्होंने अपनी बेटी पद्मिनी के विवाह के लिए स्वयंवर का आयोजन किया था। यह समाचार पूरे भारत में पहुँचा। चित्तौड़ के राजा रतन सिंह भी स्वयंवर में भाग लेने सिंहल द्वीप पहुँचे।वहाँ पद्मिनी से विवाह के इच्छुक राजाओं की बल, बुद्धि और कौशल की परीक्षा के लिए वन में आखेट की एक स्पर्धा आयोजित की गई थी, जिसे राजा रतन सिंह ने जीता और राजकुमारी पद्मिनी से उनका विवाह हुआ। राजकुमारी पद्मिनी महारानी पद्मावती बनकर चित्तौड़ आ गईं।

उनके रूप-गुण और राजा रतन सिंह के कौशल की चर्चा दूर-दूर तक हुई। यह चर्चा दिल्ली के शासक अलाउद्दीन खिलजी तक भी पहुँची। दिल्ली सल्तनत के दो हमले चित्तौड़ पर हो चुके थे, परंतु सफलता नहीं मिली थी। बल्कि गुजरात जाती दिल्ली सल्तनत की सेना से अपने क्षेत्र से होकर निकलने के लिए कर भी वसूला गया था। किंतु गागरोन की सहायता के लिए चित्तौड़ की सेना गई थी, जिससे उसकी शक्ति में कुछ गिरावट आई और दिल्ली ने तोपखाने की वृद्धि कर अपनी शक्ति बढ़ा ली थी।

स्थिति का आकलन करके दिल्ली की सेनाओं ने चित्तौड़ पर हमला बोल दिया। लगभग एक माह तक घेरा पड़ा रहा, किंतु सफलता नहीं मिली। अंततः अलाउद्दीन खिलजी ने एक कुटिल चाल चली। उसने कुछ भेंट के साथ समझौते का प्रस्ताव भेजा और आग्रह किया कि वह रानी पद्मावती का चेहरा एक बार देखकर लौट जाएगा।राजा ने प्रस्ताव मान लिया। सुल्तान अपने कुछ विश्वस्त सहयोगियों के साथ भोजन पर आया। उसने आईने में रानी को देखा और चलने लगा। राजा शिष्टाचारवश उसे किले के द्वार तक छोड़ने आए। सुल्तान अलाउद्दीन बहुत कुटिल था। उसने किले में प्रवेश करते समय द्वार पर कुछ सुरक्षा सैनिक छोड़ रखे थे। उसके इरादों की किसी को भनक तक न थी। जैसे ही राजा द्वार पर आए, उन पर हमला हुआ और उन्हें बंदी बना लिया गया। उन्हें बंदी बनाकर सुल्तान अपने शिविर में ले आया और रानी को समर्पण करने का प्रस्ताव भेजा।

रानी ने सभासदों से परामर्श किया। गोरा और बादल, जो रिश्ते में राजा के भतीजे थे, ने संघर्ष का बीड़ा उठाया। राजा को मुक्त कराने की योजना बनी। योजनानुसार सुल्तान को समाचार भेजा गया कि रानी अपनी सखी-सहेलियों और सेविकाओं के साथ समर्पण करने आना चाहती हैं। रानी पद्मावती को प्राप्त करने को आतुर अलाउद्दीन ने सहमति दे दी। तैयारी की सूचना भी सुल्तान को मिली और रानी की ओर से यह आग्रह भी किया गया कि वह अंतिम बार राजा से मिलना चाहती हैं। अतः राजा के बंदी शिविर से होकर सुल्तान के दरबार में उपस्थित होंगी। इस प्रस्ताव पर भी सहमति मिल गई।

चित्तौड़ में दो सौ डोले तैयार हुए। कहीं-कहीं डोलों की यह संख्या 800 भी लिखी गई है। कुछ डोलों में दिखावे के लिए महिलाएँ थीं, परंतु अधिकांश में लड़ाके नौजवान थे, जो अपने राजा को कैद से छुड़ाने का संकल्प लेकर जा रहे थे।अंततः शिविर के कैदखाने के समीप जैसे ही ये डोले पहुँचे, सभी सैनिक डोलों और पालकियों से बाहर आ गए। यह छापामार लड़ाई थी, जो गोरा-बादल के नेतृत्व में लड़ी गई। किसी को अपने प्राणों का मोह न था, बस राजा को मुक्त कराने का संकल्प था। इन सभी का बलिदान हो गया, पर राजा मुक्त होकर सुरक्षित किले में पहुँच गए।

यह 22 अगस्त 1303 का दिन था। राजा मुक्त होकर किले में तो आ गए थे, परंतु किले में राशन और सैन्य शक्ति, दोनों का संकट था। सेना के अधिकांश प्रमुख सरदार राजा को मुक्त कराने की छापामार लड़ाई में बलिदान हो गए थे। इस घटना से बौखलाए अलाउद्दीन खिलजी का तोपखाना गरजने लगा। अंततः रानी द्वारा जौहर और राजा रतन सिंह द्वारा शाका करने का निर्णय हुआ। 25 अगस्त 1303 से जौहर की तैयारी आरंभ हुई और रात को ज्वाला धधक उठी। पूरी रात किले के भीतर की सभी स्त्रियों ने अपने छोटे बच्चों को गोद में लेकर अग्नि में प्रवेश किया। 26 अगस्त के सूर्योदय तक किले के भीतर सभी नारियाँ अपने छोटे बच्चों को लेकर अग्नि में समा गईं। इनकी संख्या सोलह हजार बताई जाती है।

26 अगस्त को ही किले के द्वार खोल दिए गए। जितने सैनिक किले में थे, वे सभी राजा रतन सिंह के नेतृत्व में केसरिया पगड़ी बाँधकर निकल पड़े। भीषण युद्ध हुआ, पर यह युद्ध दिन के तीसरे प्रहर तक ही चल पाया। राजा रतन सिंह का बलिदान हो गया।इस प्रकार 26 अगस्त को राजा ने अपने स्वत्व और स्वाभिमान की रक्षा के लिए अंतिम श्वास तक युद्ध किया, वहीं रानी पद्मावती ने सोलह हजार स्त्रियों और बच्चों के साथ स्वयं को अग्नि में समर्पित कर दिया।

इसके बाद अलाउद्दीन खिलजी किले में घुसा। उसे चारों ओर जलती अग्नि और राख के ढेर मिले। उसने किले में कत्लेआम का आदेश दिया। अलाउद्दीन खिलजी के इस अभियान का वर्णन अमीर खुसरो की रचना ‘खजाइन-उल-फुतूह’ (तारीख-ए-अलाई) में मिलता है। इस विवरण के अनुसार, खिलजी की सेना ने एक ही दिन में लगभग 30,000 लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। अलाउद्दीन खिलजी ने अपने बेटे खिज्र खाँ को चित्तौड़ का शासक नियुक्त किया और चित्तौड़ का नाम ‘खिज्राबाद’ कर दिया था।रानी पद्मावती का जौहर स्थल आज भी चित्तौड़ में स्थित है। वहाँ लोग जाते हैं, श्रद्धा से शीश झुकाते हैं तथा रानी को सती देवी मानकर अपनी इच्छापूर्ति की प्रार्थना करते हैं।

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।
अपने लेख इस पते पर भेजें :- editatalraag@gmail.com