ब्रिटिश काल के दस्तावेजों में कुछ ऐसी घटनाओं का उल्लेख मिलता है, जिनका विवरण इतिहास की पुस्तकों में नगण्य है। ऐसी ही एक घटना बैतूल जिले की है, जब वनवासियों ने वनरक्षण और अपने वनाधिकार के लिए संघर्ष किया। इस संघर्ष में अनेक बलिदान हुए, किंतु ब्रिटिश सरकार के गजेटियर में नाम का उल्लेख तो नहीं, लेकिन एक बलिदान का उल्लेख है। जबकि जनचर्चाओं में बलिदानियों की संख्या अनेक थी। पुलिस गोलीचालन करके लौट गई थी। लाशें उठाने वाला भी कोई न बचा था।

अंग्रेजों ने कानून बनाकर भारत की समस्त वन-संपत्ति पर अपना पूर्ण अधिकार कर लिया था और वनवासियों को बंधुआ मजदूर बनाकर उनसे ही वन-संपत्ति एकत्र करने का काम लेते थे। वनवासियों से ही बलपूर्वक वनोपज तुड़वाते और व्यापार करके धन कमाते थे। वनवासी वन-संपत्ति से पूरी तरह बेदखल हो गए थे। यदि कोई वनवासी अपनी निजी आवश्यकता के लिए वनोपज तोड़ लेता था, तो उसे दंडित किया जाता था। यह अंग्रेजों की कूटनीति थी कि वनवासी बंधुआ मजदूरों से काम लेने के लिए उनके बीच से ही कुछ लोगों को जमादार बना दिया था, ताकि वनवासियों पर किए जाने वाले इन अत्याचारों पर उनका नाम न आए। ये जमादार ही वनवासियों से काम लेते थे। जमादारों को अंग्रेज सिपाही नियंत्रित करते थे।

वनवासियों पर अंग्रेजों के इस अत्याचार के विरुद्ध बैतूल क्षेत्र के कोरकू वनवासी युवा गंजन सिंह कोरकू ने आवाज उठाई। उन्होंने वनवासियों को एकत्र किया और अपने वनों की सुरक्षा करने का आह्वान किया। उन्होंने समूचे वनक्षेत्र में घूमकर वनवासियों को संघर्ष के लिए संगठित किया। उनके आह्वान का प्रभाव पड़ा और वनवासी एकत्र होने लगे।

वनवासियों के पास साधनों का अभाव था। उनके हथियार कुल्हाड़ी, हँसिया और तीर-कमान थे। वे इन्हीं को लेकर संघर्ष के लिए आगे आए। लगभग पाँच सौ वनवासियों की टोली तैयार हुई और अंग्रेजों के जमादारों, नाकेदारों और सिपाहियों को भगा दिया। उन्होंने क्षेत्र के वनों पर अधिकार कर लिया और वहाँ तैनात अंग्रेजों के नाकेदारों और चौकीदारों को भगा दिया।

इससे अंग्रेज बौखला गए। बड़ी संख्या में पुलिस बल आया। वनवासियों ने मोर्चा लिया। यह 22 अगस्त 1930 का दिन था। पुलिस ने पहले लाठीचार्ज किया, लेकिन वनवासी डटे रहे। पुलिस ने गोली चलाई। इसमें एक वनवासी की मृत्यु हुई। इस बलिदानी का नाम तक नहीं मिलता। लोकचर्चाओं में कहा जाता है कि अनेक वनवासी बलिदान हुए। जो घायल हुए, वे बाद में दिवंगत हुए। इनमें से किसी का उल्लेख नहीं मिलता।

पुलिस गंजन सिंह को जीवित पकड़ना चाहती थी, लेकिन वे निकलने में सफल हो गए। अंग्रेजों ने उन्हें फरार घोषित करके उन पर पाँच सौ रुपये का इनाम घोषित किया। लगभग एक माह पश्चात् एक विश्वासघाती के कारण गंजन सिंह पचमढ़ी में गिरफ्तार कर लिए गए। उन्हें पाँच वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। उन्हें रायपुर जेल में रखा गया।

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