साधना, सिद्धि, प्रसिद्धि और ख्याति : 'भाषा की पाठशाला'
भाषा-विज्ञान के आधार पर समझें कि कैसे मिलती है प्रसिद्धि:– 

सिद्धि शब्द बना है– सिद्ध शब्द से। सिद्ध होने की अवस्था ‘सिद्धि’ है। सिद्ध होना अर्थात् पूर्ण हो जाना, पक जाना या तैयार हो जाना। लक्ष्य ‘सिद्ध’ होने में लक्ष्य के पूर्ण होने का भाव स्पष्ट दिखता है। खाना बनाते समय जब कहा जाता है कि चावल या दाल सिद्ध हो गया है, तो उसका अर्थ है कि वह पक कर तैयार हो गया है।

सिद्धि शब्द के मूल में ‘सिध्’ है, जिससे साधक, साधना, साधु इत्यादि शब्द बने हैं। 

साधना :– सामान्य अर्थ में साधना [सिध्+ णिच् + युच् + टाप् = साधना] का अर्थ अभ्यास अथवा तैयारी है।

साधक और सिद्ध :– जो साधना कर रहा है, वह साधक और जिसने साध लिया वह सिद्ध। यह किसी साधक की पूर्णाहुति की यात्रा है। साधक अभी उद्यमरत है; लेकिन उससे ग़लती हो सकती है। सिद्ध को महारत हासिल है, ग़लती की गुंजाइश ख़त्म हो गई।

बहरहाल, जिस गुण को साध लिया गया, उसमें ‘सिद्धि’ हो गई। जब यह सिद्धि कुछ विशेष प्रकार की हो तो ‘प्रसिद्धि’ कही जाएगी। 

प्रसिद्धि :– प्रसिद्धि शब्द ‘सिद्धि’ में ‘प्र’ उपसर्ग जुड़कर बना है। ‘प्र’ उपसर्ग का अर्थ है– विशेष, विशिष्ट, ख़ास इत्यादि। इस तरह प्रसिद्धि का अर्थ हुआ– ‘विशिष्ट सिद्धि’।

यह हर क्षेत्र के लिए सत्य है। मान लीजिए कि किसी ने तबला बजाने में महारथ हासिल कर ली या ‘सिद्धि’ कर ली। अब, इसका अर्थ यह हुआ कि उसने तबले को विशेष रूप से साध लिया है। यहाँ, विशेष रूप से साधने वाला ‘प्रसिद्ध’ कहलाएगा और उसकी यह सिद्धि 'प्रसिद्धि' कहलाएगी।

विचारणीय है कि साधारण रूप से बहुत लोग तबला बजाते होंगे; लेकिन प्रसिद्धि तभी है, जब इस कला को विशेष रूप से ‘साधा’ जाए। कहा भी जाता है– ‘जो भी करो, विशेष करो, सर्वोत्तम करो! प्रसिद्धि तभी मिलेगी।’

ख्याति : 'ख्या' का अर्थ है– कहना, घोषणा करना, समाचार देना आदि। विदित है कि आख्या में कहने और बताने का भाव है; संख्या[सम्+ख्या] में गिनकर कहने का भाव है; जबकि व्याख्या में विशेष रूप से कहने का भाव है। ख्यात[ख्या+ क्त] का अर्थ है– कहा गया, पुकारा गया, विश्रुत(विशेष रूप से जिसके बारे में सुना गया) इत्यादि। जो 'ख्यात' हो गया, उसकी 'ख्याति' हो गई। कोई विख्यात होता है तो कोई कुख्यात(बुरे कार्य के लिए ज्ञात) हो जाता है। ख्याति हो गई; अर्थात् नाम हो गया।  

प्रसिद्धि से 'ख्याति' इस अर्थ में भिन्न है कि बिना आंतरिक गुणवत्ता के; अर्थात् बिना सिद्धि के भी 'ख्याति' हो सकती है। प्रचार अथवा किसी अन्य उपाय से कोई ख्यात हो सकता है; लेकिन यदि उसमें सिद्धि नहीं है तो उसे प्रसिद्ध नहीं कहा जाना चाहिए।