बंगाली समाज का वो निर्णायक वर्ग केवल अभिभावक के रूप में अपने बच्चे को आईआईटीयन और डॉक्टर बनाने में लगा हुआ है, बाद के समय में उन्ही बच्चों द्वारा प्रताड़ित-परित्यक्ता ज़िंदगी गुज़ारने को मजबूर है। यह बंगाल के हर गली की कहानी है, घरों में अकेले बूढ़े माँ -बाप बचे हुए है और बच्चे विदेशों में सेटल -साल में एक बार विजिट पर आने वाले बन गए है। यही मौक़ा TMC के हाथ लग गया है । मनमानी करने का और भ्रामक अराजकता उत्पन्न कर सत्ता पर काबिज रहने का और समाज के बीच अपने झूठे नैरेटिव को सेट करने का। 

TMC के इसी मंच से उनकी एक सांसद श्रीमती महुआ मोइत्रा अपने उच्चतम आवाज़ में यह कहती हैं कि —“आज जो TMC के साथ नहीं है वो बंगाली ही नहीं है।”

 क्या बंगाली होने का सर्टिफिकेट TMC की  एक ऐसी  महिला से बंगाली समाज को लेना पड़ेगा जो खुले आम कहती है कि—“ माँ काली मदिरापान और धूम्रपान करती है।” ऐसी कूटरचना और राजनैतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए दिए गए बयान केवल TMC की नहीं अपितु समस्त बंगाली समाज और असंख्य वैभव-गाथा वाले बंगाल को कलंकित करने का काम कर रही है । 

90 के दशक में जिस प्रकार चुनावी हिंसा और बैलेट बॉक्स लूट के कारण बिहार कलंकित था ममता बनर्जी को कार्यकाल में बंगाल उससे कहीं आगे निकल गया है। बंगाल आज रोज़ नए रिकॉर्ड बना रहा है। राजनीतिक हिंसा और द्वेष का होनख कोई बड़ी बात नहीं जिस प्रकार पूर्वी बंगाल ने 'हिंदू जेनोसाइड'  को बार बार झेला है। अगर हालात ऐसे रहे तो आशंका है कि _उसी प्रकार पश्चिम बंगाल में भी आने वाले वर्षों में बंगालियों के ऐसे क़त्ले आम को अंजाम दिया जा सकता है। बंगाल और बंगालियों के बीच होम्योपैथी दवाई बहुप्रचलित है। क्योंकि उसमें ना सर्जरी दिखती है और न ही कड़वी दवाई, ठीक उसी प्रकार बंगालियों के मन में धीमा मीठा जहर घोल कर उनके देश के संघीय ढांचे से अलग करने का कुत्सित प्रयास सत्ताधारी TMC पार्टी हर दिन कर रही है। 

पश्चिम बंगाल की  ममता बनर्जी सरकार 
शासकीय अधिकारियों को, विपक्षी पार्टियों के नेताओं को और आम जानता को डराने का काम जो TMC के नेता दैनिक रूप से कर रहे हैं। मानो प्रशासन और न्याय व्यवस्था बंगाल में लंबी छुट्टी पर गयी हुई है। एक क़ानूनजीवी और TMC सांसद कल्याण बनर्जी—“देश के चीफ इलेक्शन कमिश्नर की उंगली काटने की बात कर रहे हैं।”  

ऐसे सांस्कृतिक पतन को देखकर, इसे सहन कर रहे शांत बैठे लोगो को देखकर दुख और आश्चर्य लगता है। 

बंगाल में बहने वाली हुगली नदी के जल में कहते हैं कोई जीवाणु पनप नहीं पाता है। कोई विष उत्पन्न नहीं हो पाता है तो ऐसे में बंगाल में रोज़ इसी हुगली नदी के पानी पीने वालो के बीच ऐसा विष और नकारात्मकता कैसे उत्पन्न हो गई? जो सालों से टिकी हुई है । यह वैज्ञानिक और सामाजिक सोध का विषय है। 

बंगाल में आने वाले दिनों में चुनाव होने वाला है ऐसे बंगाल में राजनीतिक सरगर्मियां चरम पर है, TMC ही चारों ओर लड़ते दिख रही है। अपनी ख़ुद के कमज़ोरियों को छुपाने के लिए और अपने 15 सालों के सत्ता के विफलता को किसी भी स्तर पर उतरकर लोगों के मन से मिटाने के लिए TMC का ख़ूनी तांडव देखने को मिल रहा है। देखना दिलचस्प रहेगा, बंगाल का 'भद्रोलोक' समाज कब तक ऐसे अभद्र प्रयास को संजोकर रखता ? कब तक अराजकता के सहारे देश के ब्रेन-कैपिटल को उसके वैभव से दूर रखने में ममता बनर्जी और उनके साथी सफल हो पाते हैं?पिछले 50 सालों में बंगाल कितने पीछे जा चुका है यह किसी से छुपा नहीं है, 1947 में आज़ादी के समय  केवल कोलकाता की GDP देश के आर्थिक राजधानी कही जाने वाले मुंबई से दुगुनी थी। आज मुंबई की  GDP कोलकाता के तीन गुना से भी अधिक है। इस ब्रेन-ड्रेन वाले जगह से क्या बंगाल वापस वैभव का सफ़र कर पाएगा? अब यह कोलकाता के बुद्धिजीवी बंगाली समाज को सोचना होगा और तय करना होगा।

— गोपाल सामंतो