आज ज्येष्ठ प्रचारक, अप्रतिम संगठक, मेधावी चिंतक तथा सिद्धहस्त लेखक हो. वे. शेषाद्रि जी की जन्मशती (26.5.1926 – 14.8.2005) का पावन अवसर है।

26 मई 1926 को बेंगलुरु में जन्मे हो. वे. शेषाद्रि जी 1942 में संघ के संपर्क में आए। एम.एससी. (रसायन शास्त्र) की शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात 1946 में संघ के प्रचारक बने। वे कर्नाटक के प्रथम प्रचारक दल के तीन प्रमुख कार्यकर्ताओं – कु. सूर्यनारायण राव तथा चंपकनाथ जी – के साथ प्रचारक जीवन में प्रविष्ट हुए।

1947 में कोलार जिला प्रचारक, 1948 में संघ पर प्रतिबंध के समय कारावास, 1953 में प्रांत कार्यवाह, 1953-1956 तक मंगलूरु विभाग प्रचारक का अतिरिक्त दायित्व, 1960 में कर्नाटक प्रांत प्रचारक, 1980 में सह क्षेत्र प्रचारक, 1981 में दक्षिण क्षेत्र प्रचारक, 1983 में अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख, 1984 में सह सरकार्यवाह तथा 1987 से 2000 तक सरकार्यवाह के रूप में संगठन दायित्व वहन किया। वर्ष 2000 में पुनः सह सरकार्यवाह तथा 2003 में अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख का दायित्व संभाला।

14 अगस्त 2005 को सायं 6:57 बजे उन्होंने अपनी लौकिक यात्रा पूर्ण की।

संघ के पंचम सरसंघचालक कु. सी. सुदर्शन ने उनके विषय में कहा था – “शेषाद्रि जी का व्यक्तित्व सृजनशील, संवेदनशील और स्थितप्रज्ञ था। वे वैश्विक विषयों के गहन विचारक थे।”

हो. वे. शेषाद्रि जी ने कन्नड़ में 30 तथा अंग्रेज़ी में 11 – कुल 41 पुस्तकों की रचना की। ‘उत्थान’, ‘विक्रमा’, ‘ऑर्गनाइज़र’ सहित अनेक पत्र-पत्रिकाओं में उनके सैकड़ों लेख, स्तंभ तथा प्रेरणादायी पत्र प्रकाशित हुए। प्रवास की अत्यंत व्यस्त दिनचर्या के मध्य भी उनका लेखन निरंतर चलता रहा।

1982 में उनकी कृति ‘तोर बेरळ’ को कर्नाटक सरकार के कर्नाटक साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया। यह पुस्तक वैचारिक जगत में अत्यंत प्रशंसित रही।

उन्होंने अपने अखंड प्रवास और सतत लेखन के माध्यम से स्वयंसेवकों के वैचारिक आधार को विस्तृत और सुदृढ़ किया तथा समाज के समक्ष संघ के विचारों और कार्य को प्रभावी रूप से प्रस्तुत किया।

शेषाद्रि जी की भाषण शैली भी अद्भुत थी। वे सरल एवं रोचक उदाहरण देकर अपनी बात श्रोताओं के मन में उतार देते थे। 1984 में न्यूयार्क (अमरीका) के विश्व हिन्दू सम्मेलन तथा ब्रेडफोर्ड (ब्रिटेन) के हिन्दू संगम में उन्हें विशेष रूप से आमन्त्रित किया गया था। उनके भाषणों से वहां लोग बहुत प्रभावित हुए।