एक विकसित राष्ट्र का निर्माण सिर्फ तकनीक से निर्धारित नहीं होता, बल्कि अपनी स्थायी खूबियों को प्रगति के वाहक के रूप में बदल सकने की उसकी क्षमता से भी होता है। अब जब हमारा देश ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है, तब हम अत्याधुनिक तकनीक में तो निवेश कर ही रहे हैं, अपनी समृद्ध विरासत में भी नवाचार को बढ़ावा दे रहे हैं।

हमारी हथकरघा परंपरा उन बड़ी खूबियों में से एक है, जो हमेशा से हमारे साथ रही है। आज जब देश अपना 12वां राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मना रहा है, तब इस कुटीर उद्योग को एक ऐसे रणनीतिक क्षेत्र के तौर पर देखने का यह उपयुक्त अवसर है, जो स्थायित्व, प्रामाणिकता और सुदृढ़ आपूर्ति श्रृंखला को महत्व देने वाली दुनिया के लिए बेहद अहम है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकसित भारत 2047 का जो सपना देखा है, वह आत्मनिर्भरता, समावेशिता व सांस्कृतिक आत्मविश्वास पर आधारित है। हथकरघा विरासत और नवाचार को जोड़कर इस सपने को साकार कर रहा है। यह देश की स्त्रियों के नेतृत्व में विकास, उद्यमिता, आजीविका और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता को बढ़ावा दे रहा है।  

हथकरघा महज एक शिल्प नहीं है, बल्कि भारत की महान सभ्यतागत विशेषताओं में से एक है। सबसे पहले कपास की खेती और बुनाई करने वाली सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर विश्व व्यापार में भारतीय कपड़े के दबदबे वाली 18वीं सदी तक, भारत ने वैश्विक स्तर पर वस्त्र निर्माण की उत्कृष्टता के मानक स्थापित किए। बंगाल के प्रसिद्ध मलमल के साथ-साथ बनारसी सिल्क, कांचीपुरम की बुनाई, पोचमपल्ली इकत और अनगिनत क्षेत्रीय परंपराओं ने भारत को दुनिया भर में पहचान व प्रशंसा दिलाई। आज जब दुनिया प्रामाणिक, टिकाऊ व हाथ से बने उत्पादों की ओर मुड़ रही है, तब हमारे पास अग्रणी स्थान फिर से हासिल करने का ऐतिहासिक मौका है। हमारी हथकरघा क्रांति में वस्त्र ही नहीं, कारीगरी, विरासत, नवाचार और भरोसे का भी निर्यात होना चाहिए, ताकि हर उत्पाद ‘ब्रांड इंडिया’ की पहचान बने।

हथकरघा हमारे देश का सबसे बड़ा कुटीर उद्योग है। यह देश के 35 लाख से अधिक बुनकरों व उनसे जुड़े कामगारों की आजीविका का सहारा है। इन कामगारों में से लगभग 72 प्रतिशत महिलाएं हैं। पिछले दशक में सरकार ने कच्चा माल आपूर्ति योजना, 797 हथकरघा क्लस्टरों, 1.24 लाख से अधिक उन्नत करघों, लगभग 97,000 कारीगरों के कौशल विकास, जीआई टैग वाले उत्पादों, हैंडलूम मार्क, इंडिया हैंडमेड सर्टिफिकेशन, अर्बन हाट और डिजाइन रिसोर्स सेंटर जैसी पहल के जरिये इस क्षेत्र को सुदृढ़ किया है। आज 29 बुनकर सेवा केंद्र प्रशिक्षण, कौशल-उन्नयन, डिजाइन के विकास, कच्चे माल संबंधी सहायता और बाजार से जोड़ने जैसी सुविधाएं प्रदान कर रहे हैं। वहीं, 11 ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हैंडलूम टेक्नोलॉजी’ को सुदृढ़ किया जा रहा है, ताकि उन्नत प्रशिक्षण बढ़ाया जा सके व अधिक मूल्य वाले हथकरघा उत्पाद बनाए जा सकें।

नवाचार हमेशा से हथकरघा की यात्रा का हिस्सा रहा है। महात्मा गांधी के चरखे ने सूत कातने के काम को आसान, तेज और अपेक्षाकृत अधिक कुशल बनाया। इससे आत्मनिर्भरता का विजन आगे बढ़ा। हाल में, असम के मैना करघे और शिवसागर में विकसित चितरंजन करघे ने यह दर्शाया है कि करघे के बेहतर डिजाइन से बुनाई का काम कैसे आसान व अधिक उत्पादक हो सकता है। इस विरासत को आगे बढ़ाते हुए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के साथ मिलकर बनाया गया ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर हैंडलूम टेक्नोलॉजी’ ऐसे करघे विकसित कर रहा है, जो हल्के, मजबूत और उपयोग में आसान हैं।

तकनीक को कारीगरों की जगह लेने के बजाय उनके सशक्तिकरण का जरिया बनना चाहिए। बेहतर ब्रांडिंग, मूल्य वर्धन और बाजार तक सीधी पहुंच के जरिये इस क्षेत्र में किए जा रहे नवाचार बुनकरों की आय में काफी वृद्धि कर सकते हैं। हम अपने बुनकरों का सम्मान सिर्फ अपनी विरासत के संरक्षक के रूप में नहीं, बल्कि देश की प्रगति के शिल्पकार के रूप में भी करें। हमारे द्वारा खरीदा गया हर हथकरघा उत्पाद सदियों पुरानी परंपरा को संजोता है और भारत की कहानी को दुनिया तक पहुंचाता है।

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।