कुछ शब्दों में ऐसी शक्ति होती है, जिन्हें सुनते ही मन के भीतर ऐसा कुछ जाग उठता है और रोम रोम में बल भर आता है, “वंदे मातरम्” ऐ्सा ही शब्द हैं। इसमें अपनी धरती के प्रति प्रेम है, मां के प्रति श्रद्धा है और उस मिट्टी के प्रति कृतज्ञता है जिसने हमें जीवन दिया। इसलिए वंदे मातरम् को किसी दल, किसी सरकार या किसी विचारधारा के दायरे में बांधना उचित नहीं है। यह जन-जन की आवाज है। भारत की आत्मा की आवाज है और उस सनातन भाव की अभिव्यक्ति है जिसमें धरती को मां माना गया है।

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने जब “वंदे मातरम्” लिखा, तब भारत अंग्रेजी शासन के अधीन था। देश में स्वतंत्रता की आकांक्षा थी, लेकिन उसे स्वर देना आसान नहीं था। ऐसे समय में मातृभूमि को प्रणाम करने वाले इन शब्दों ने लोगों के भीतर एक नई चेतना जगाई।

“सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्,
शस्यश्यामलां मातरम्।”

जल से भरी, फल-फूल से समृद्ध, शीतल वायु वाली और खेतों की हरियाली से सजी भारत माता। यह चित्र भारत के उस जीवन का है जिसे गांव का किसान भी समझता है और शहर में रहने वाला व्यक्ति भी। हमारी परंपरा में धरती को माता कहने का भाव बहुत पुराना है। अथर्ववेद कहता है, “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः”। यानी भारत माता का भाव किसी आज की राजनीति से पैदा नहीं हुआ। इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं।

1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने वंदे मातरम् का गायन किया। 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में स्वदेशी आंदोलन के दौरान यह गीत लोगों के बीच फैल गया और लोकप्रिय हो गया। जुलूस निकलते थे तो वंदे मातरम् गूंजता था। सभा होती थी तो वंदे मातरम् सुनाई देता था। अंग्रेजी सत्ता के सामने खड़ा भारतीय इसे अपनी मातृभूमि के प्रति प्रणाम और स्वतंत्रता की इच्छा के रूप में बोलता था।वंदेमातरम का उद्घोष करते हुए न जाने कितने ही स्वतंत्रता सेनानी जेल गए, कितनों ने यातनाएं सहीं और कितनों ने अपना जीवन देश के लिए दे दिया। उनके लिए भारत कोई मात्र भूभाग नहीं था। वह मां था। इसीलिए वंदे मातरम् उनके लिए गीत से कहीं अधिक था।

अब विवाद इस बात पर है कि वंदे मातरम् के कितने अंतरे गाए जाएं। कांग्रेस कार्यसमिति ने 1937 के अपने फैसले को आधार बनाते हुए पार्टी के कार्यक्रमों में केवल पहले दो अंतरे गाने का निर्णय दोहराया है। हाल में कांग्रेस ने इसी पुराने फैसले पर कायम रहने की बात स्पष्ट की है।

1937 का फैसला उस समय की परिस्थितियों में हुआ था। उस समय कुछ मुस्लिम नेताओं और संगठनों की आपत्तियां थीं और कांग्रेस नेतृत्व ने सार्वजनिक रूप से पहले दो अंतरों को स्वीकार करने का रास्ता चुना था। लेकिन आज 2026 है। भारत स्वतंत्र है। संविधान लागू है। वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत के रूप में सम्मान प्राप्त है। 

तो क्या 1937 का फैसला आज भी उसी रूप में अंतिम माना जाना चाहिए? यह प्रश्न कांग्रेस से पूछा जाना चाहिए। क्या वंदे मातरम् कांग्रेस की संपत्ति है कि वह तय करे कि इसे कितना गाया जाएगा? जिस गीत ने कांग्रेस के ही स्वतंत्रता आंदोलन में करोड़ों लोगों को प्रेरित किया, उसके प्रति आज कांग्रेस का रवैया केवल अपने पुराने प्रस्ताव से तय होना चाहिए? और मन में एक दूसरा सवाल भी आता है। यदि केवल दो अंतरे गाने के पीछे आज भी वही पुरानी चिंता है तो कांग्रेस आखिर किसे प्रसन्न करना चाहती है?

यह सवाल किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं है। भारत के हर नागरिक को अपनी आस्था और अपने विचार रखने का अधिकार है। सवाल केवल इतना है कि क्या किसी की नाराजगी की आशंका के कारण राष्ट्रीय भावना एवं जनभावना से खेला जाना चाहिए?

यहां एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट करना जरूरी है। संसद ने जुलाई 2026 में कानून पारित किया और 6 अगस्त 2026 को राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2026 लागू हो चुका है। इस कानून के तहत वंदे मातरम् को भी राष्ट्रगान के समान कानूनी संरक्षण दिया गया है। कोई व्यक्ति जानबूझकर इसके गायन को रोकता है या ऐसा करने वाली सभा में व्यवधान डालता है तो उसे तीन वर्ष तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।

गृह मंत्रालय ने 28 जनवरी 2026 के निर्देश में सरकारी और निर्धारित औपचारिक अवसरों के लिए वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों वाले संस्करण का प्रोटोकॉल तय किया है। इसी आधार पर आकाशवाणी ने भी मार्च से छह अंतरों वाला संस्करण प्रसारित करना शुरू किया।

विडंबना देखिए। एक तरफ कहा जा रहा है कि वंदे मातरम् का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए और वंदे मातरम् को राजनीति से ऊपर रखना होगा। कांग्रेस को जनभावनाओं को समझना चाहिए, यह देश का गीत है। स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति से जुड़ा गीत है। करोड़ों भारतीयों की श्रद्धा से जुड़ा गीत है। इसे वोट की राजनीति से ऊपर रखना चाहिए।

आज असली प्रश्न यह है कि हम वंदे मातरम् के भाव को कितना समझते हैं। जिस धरती को मां कहते हैं, उसकी नदियां गंदी न हों। उसके जंगल बचें। खेतों की हरियाली बनी रहे। समाज में भाईचारा रहे। नागरिक अपने कर्तव्य को समझें। देश के लिए काम करने वाला हर व्यक्ति सम्मान पाए। मां को प्रणाम करना केवल शब्दों से नहीं होता। उसके सुख-दुख की चिंता भी करनी पड़ती है। वंदे मातरम् इसी भावना का नाम है।अब यह न कांग्रेस का है, न भाजपा का। यह किसी एक समुदाय का भी नहीं है। यह उस भारत का है जिसमें किसान अपनी मिट्टी को माथे से लगाता है, जवान सीमा पर खड़ा रहता है और सामान्य नागरिक अपने घर-परिवार के साथ इस देश को अपना मानकर जीता है। इसलिए वंदे मातरम् को राजनीतिक रंग न देकर इसे किसी को खुश करने का साधन मत बनाइए। बस इसे उसी भाव से गाइए, जिस भाव से हमारे पुरखे स्वतंत्रता सेनानियों ने गाया था। वंदे मातरम्। 

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।