सामाजिक समरसता इस विषय पर अपने देश में गत कई दशकों से, या यूं कहे कि कई शताब्दियों से अलग-अलग प्रकार से लगातार प्रयास होते आ रहे हैं। परंतु उनकी सफलता के परिचय स्वरूप समाज में विषमता का उन्मूलन पूरी तरह से हुआ है, ऐसा आज भी नहीं कह सकते। और यह जगप्रसिद्ध सत्य है कि जिस देश को, जिस राष्ट्र को, जिस समाज को उन्नति करनी है, उसको एक होना, संगठित होना अनिवार्य शर्त है। अमरिका के पूर्व राष्ट्राध्यक्ष अब्राहम लिंकन का सुप्रसिद्ध वाक्य है- 'The house divided against itself cannot stand.' एकही समाज के लोग आपसमें विषमता का व्यवहार करें, विभाजन का व्यवहार करें, दोनों समूहों की स्थितियाँ, दोनों का स्थान एक समाज के होने के बाद भी इतना अलग-अलग, ऊपर-नीचे हो, यह जिस समाज में होता है उस समाज को उन्नति की आशा नहीं करनी चाहिए। और इसलिए, प्रगति की पूर्वशर्त एकता है, और एकता की पूर्वशर्त समता है। वास्तव में शतप्रतिशत समता संभव नहीं है। क्योंकि, प्रकृति हर एक मनुष्य को अलग बनाती है। लेकिन प्रकृतिने जितनी विषमता बनायी रखी है उतनी छोड़कर, बाकी सब मामलों में समता सम्भव है। और वह समता आनी चाहिए। तभी एकता प्रस्थापित होगी। 'समानशीलेषुव्यसनस्य सख्यम्।'

ऐसा कहा जाता है। मानवी प्रयत्नों की मर्यादा में सबको जितना समान बनाना सम्भव है, उतना बनाने का पूरा प्रयास करके उस में यशस्वी होना हैं। तो फिर सामाजिक एकता साकार होगी और एकता मूर्त होने के बाद ही देश का भाग्योदय होगा।

समरसता मन का भाव

विविधता में एकता, भारत की विशेषता है, ऐसा हम बड़े गर्व से कहते हैं। परंतु यह एकता, समता आती कैसी है? थोड़ी बहुत तो विविधता रहने वाली ही हैं; क्योंकि विविधता प्रकृति का स्वभाव है। एक परिवार में भी सब लोग समान नहीं होते। भिन्न-भिन्न स्वभाव रहते हैं, विविध क्षमताएँ रहती हैं, समझदारी के विविध स्तर रहते हैं। परंतु फिर भी, एक परिवार में सबके साथ समान व्यवहार होता है; समता का व्यवहार होता है। जो अच्छा परिवार है उसमें ऐसा वातावरण रहता है। परिवार में अगर कोई छोटा बच्चा है और उसकी उंचाई कम है, तो ठोकपिट के या खींचतान से उसको लम्बा नहीं किया करते। प्रकृति ने जिसको जैसा बनाया है वैसा वह रहता है। लेकिन परिवार में सबके साथ समान व्यवहार इसलिए होता है कि, इन सब विविधता के बावजूद हम सब एक हैं, एक परिवार के अंग हैं, यह भावना परिवार के सभी सदस्यों में होती हैं। हमसें ऊपर-नीचे कोई नहीं है। हमारी सबकी आवश्यकताएँ हैं, हमारे सबके कर्तव्य हैं। हम अपना-अपना कर्तव्य करें और सबकी आवश्यकताएँ पूर्ण हो, इसका प्रयास करें, ऐसा परिवार के सभी लोग सोचते हैं। यह सोच मन में जिस कारण उत्पन्न होती है, मन के उस भाव को समरसता कहते है।

विविधता प्रकृति का गुण है और वह गुण अपने संपूर्ण वैशिष्ट्य के साथ भारतमें प्रगट हुआ है। यहाँ सब प्रकार की विविधताएँ हैं। भाषा, खानपान, देवी-देवता, पंथ-संप्रदाय, जाति-उपजाति... हमारे यहाँ सब प्रकार के विविध लोगों का समूह समाजमें दिखाई देता है। परंतु, यह सब विविधता होने के बाद भी हम सब एक हैं। यह विविधता हमारी आत्मीयता में बाधा उत्पन्न नहीं करती। हम सबके साथ सम्मान का व्यवहार करें, आत्मीयता का व्यवहार करें। जो प्राप्त होगा, वह सभी लोग बांटकर खाएं। किसी को कम; किसी को ज्यादा, ऐसा नहीं होगा। सभी अपनी आवश्यकताएँ पूर्ण कर सकें और सभी

अपने-अपने कर्तव्य का पालन करें। यह बात सम्भव कैसी होती है? इसको सम्भव करने का प्रयास बहुत प्रकार से आजतक दुनियामें हुआ है। परंतु, यह सम्भव नहीं हुआ है। क्योंकि, आखिर यह बात पूर्ण होने के लिए जो एक विशिष्ट प्रयास करना चाहिए उसे सभीने छोड़ दिया। और इसलिए यह बात सम्भव नहीं हो पायी। भारत में भी इतनी सारी विविधताओं के बावजूद वह प्रयास होते आ रहा है। और इतनी विविधताओं के रहते उसमें से एकता उत्पन्न होती है। फिर विविधता इस समाज का अलंकार बनता है। भारत में एक होने के लिए सभीको एक जैसा नहीं बनाते। सबकी विविधता का स्वीकार, सम्मान करके हम चलते हैं। यह जो मन की भावना है जिसके कारण यह सम्भव होता है, उसको समरसता कहते हैं। प्रकृति की विविधता में जो अन्तर्निहित एकता है, उस अन्तर्निहित एकता का ही यह विविधता भरा आविष्कार है, यह ध्यान में रखकर सभी विविधताओं का सम्मान करना, यही समरसता का उद्देश्य है। जातिभेद का व्यवहार

जातिभेद के व्यवहार को धर्म में कोई स्थान नहीं; परंतु जब हम सामाजिक समरसता शब्द का उच्चार करते हैं, तो हमें अपने यहाँ की भाषा की विविधता स्मरण नहीं आती। पंथ-संप्रदायों की विविधता आँखों के सामने ज्यादा नहीं आती। हमारे सामने पहली बात जो आती हैं वह जातिगत विषमता की ही बात आती है। हमारे समाज में बहुत सारी जातियाँ हैं। और केवल जातियाँ ही नहीं, जातिभेद भी हैं। उस जातिभेद का उन्मूलन कैसे हो, यह सभी को सोचना है। सामाजिक समरसता इस शब्द का उच्चारण करने के बाद तुरन्त मन में ऐसा आता है कि, अब जातिभेद के बारे में ही कुछ सुनने को मिलेगा, इसके ही बारे कुछ बोलेंगे। ऐसा क्यों है ? कारण, उस सन्दर्भ में हमारे यहाँ इतिहास में भेदपूर्ण व्यवहार हुआ है। सामाजिक समरसता का विषय अगर हमें ठीक से समझना हैं तो हमारे मन से, अंग्रेजी में जिसे 'निगेशन' कहते हैं, वह निगेशन का भाव निकालना पड़ेगा। “नहीं, नहीं! हमारे यहाँ भेदपूर्ण व्यवहार ऐसा कुछ हुआ ही नहीं। कभी-कभार ऐसा होता है। जातिभेद/विषमता का तो हमारे यहाँ कुछ ऐसा हुआ ही नहीं। और ऐसा हुआ भी होगा तो भी मन में वह भाव नहीं है", ऐसी तरह-तरह की वकालत होती है। इस प्रकार की वकालत होनी नहीं चाहिए, लेकिन होती है। उसके भी कुछ कारण हैं ऐसा मुझे लगता है।

मैं जिस वातावरण में बड़ा हुआ, उसमें कोई भी विषम व्यवहार की वकालत नहीं करता था। जिस काल में मैं बड़ा हुआ हूँ, उसमें भी मैंने इसके बारे में ज्यादा नहीं सुना है। लेकिन पूर्व में ऐसा होता था। इस जातिगत भेदभाव के व्यवहार ने हमारे समाज को बाँट के रख दिया। केवल इतना ही नहीं, तो अपने ही समाज के कुछ घटकों से पशुवत् व्यवहार करने वाला एक समाज, ऐसी हमारी प्रतिमा सामने लाने का प्रयास करने का अवसर सारी दुनिया को इस व्यवहार से मिला। और जिसको इसका लाभ लेना था उन्होंने लाभ लेना शुरू किया। समाज में इसकी एक प्रतिक्रिया हुई- अपने समाज को, अपने देश को सारी दुनिया में अपमानित नहीं होने देना हैं, इसका विरोध करना है। पहले तो स्वाभाविक प्रतिक्रिया ऐसी ही होती थी। क्योंकि जो ऐसा कर रहे थे उनसे हमारा संघर्ष था। वे हमारे देश पर राज्य करने वाले लोग थे और हमें उनसे मुक्त होना था। जब लड़ाई-झगड़ा होता है, संघर्ष होता है, तब न्याय-अन्याय का विवेक बाद में देखा जाता हैं। प्रथम अपने पक्ष का समर्थन करने की मानसिकता होती है। यहीं चलता है। तो, यह एक कारण हो सकता हैं कि, जिसके चलते इस प्रकार के अन्याय का, भेदभाव का, हमारे शास्त्रों का भी हवाला देकर समर्थन हुआ। यानी, दुनिया में यह जो बात फैलाई जा रही थी कि, ये लोग ऐसे हैं, कि इनका मानना ही यह है कि ऐसा भेद होना चाहिए, इस के बात को और अधिक पुष्ट करने वाले युक्तिवाद हमारे यहाँ अपने बचाव लिए हुए। यह एक कारण हो सकता है। दुसरा भी एक कारण हो सकता है।

हम लोगों ने अपने शास्त्रों का गहराई से कभी चिंतन किया नहीं। अपने ही धर्म का सम्यक् विचार कभी किया नहीं। अगर इस प्रकार का चिंतन करते तो एक स्पष्ट बात ध्यान में आती, कि शास्त्रों में ऐसा कुछ हैं ही नहीं। यह जो व्यवहार हम कर रहे हैं वह व्यवहार हमारे धर्म के अनुसार, हमारे शास्त्रों के अनुसार गलत व्यवहार है। डॉ. बाबासाहब आम्बेडकरजी ने एक प्रश्न पूछा कि, आप लोक धर्म माने क्या समझते हैं? धर्म माने कुछ मूल्य है या उन मूल्यों के आधार पर जो एक आचरण की परंपरा अब बनी है, उसको आप धर्म मानते हैं? या कर्मकांड को धर्म मानते हैं? अंग्रेजी में 'कोड या वैल्यूज' ऐसा उन्होंने पूछा था। उन्होंने कहा, मैं 'कोड' को धर्म नहीं मानता। मैं 'वैल्यूज' को देखकर धर्म को तय करता हूँ। वैल्यूज के आधार पर यह भेदभाव का आचरण गलत है। यह अधर्म है; धर्म नहीं है। उस समय का हिन्दू समाज अगर उनकी बात सुनता और उसको मान लेता, तो बहुत सी बातें ठीक हो जाती। लेकिन यह हमने माना नहीं। अब देखिए, यह इतनी प्रदीर्घ परंपरा अपने यहाँ है, यह जो हिन्दु धर्म कहते हैं, या भारतीय धर्म कहते हैं, उनके मूल में एक आधार है कि, सत्य एक है और दिखने वाली सारी विविधता उस सत्य का आविष्कार है। अब वह सत्य चेतन है कि जड़ है, इसके बारे में मतभेद है। विविध दर्शनों के अलग-अलग निवेदन है। परंतु, एक से ही अनेक हुए है। और अनेकता में विचरण करते हुए, उसको सम्भालते हुए, लेकिन एकता की ओर बढ़ो। यहीं सब दर्शनों का सन्देश है।

बालासाहबजी का स्पष्ट वचन

पुणे के वसंत व्याख्यानमाला में पूजनीय बालासाहब देवरसजीने सुस्पष्ट कहा है कि, हमारे यहाँ के सभी दर्शन, हमारे सभी पंथ-सम्प्रदाय जिस बिन्दु से प्रारम्भ होते हैं, वहाँ धारणा एक ही है कि सत्य एक है। फिर बाद में वह सत्य कैसा है, उसका स्वरूप क्या है, वह जड़ है कि चेतन है, ईश्वर है कि नहीं है, पुनर्जन्म है कि नहीं आदि बातें आती हैं। इन बातों का विश्लेषण करते-करते फिर सभी का कहना अलग-अलग हो जाता है। लेकिन विश्लेषण अलग- अलग होने के बाद भी, आचरण कैसा करना है इस बात पर जब आते हैं तब हमारे यहाँ के सभी पंथ-सम्प्रदाय, सभी दर्शन एकही प्रकार की बात बताते हैं। न हमने दर्शन की उस मूल स्थापना का ध्यान रखा, न हमने उस स्थापना से सिद्ध होने वाले आचरण का ध्यान रखा। हम ग्रन्थों में, पोथियों में ही मगन रहें। और जब इस विषमता भरे आचरण को दुनिया देखने लगी तब उसके बचाव में हमने हमारे अज्ञान के कारण उसके समर्थन के लिए कारण ढूँढे। इसलिए स्वामी विवेकानन्दजी ने कहा हैं- “क्या धर्म की योग्यायोग्यता का मूल्यांकन आज के विज्ञान में, उस विज्ञान के प्रमेयों की सत्यासत्यता परखने के लिए जो कसौटियाँ लगाई जाती हैं, उन्हीं कसौटियों के आधार पर करना चाहिए ?" आगे वे कहते हैं कि, मेरा उत्तर है, हाँ।” आज के विज्ञान की उन्हीं कसौटियों के आधार पर अपने धर्म का भी पुनर्निरीक्षण करना चाहिए। और

उस कसौटियों पर जो टिकने वाला है वह रखना चाहिए। जो उन कसौटियों पर टिकने वाला नहीं है- स्वामीजी के शब्द है- "वह कचरा है, वह जाना चाहिए और जितने जल्दी जाएगा उतना अच्छा।” पूजनीय बालासाहबजी ने जब वसंत व्याख्यानमाला के भाषण में यह कहा कि, “If untouchability is not wrong, nothing is wrong.” (अस्पृश्यता अगर गलत नहीं है, तो कुछ भी गलत नहीं है।) और “It should go lock, stock and barrel.” (जड़-मूल से उसको छोड़ देना चाहिए, उसको बाहर जाना चाहिए।) जब उन्होंने यह कहा तब उनका भी मतलब यही था। परंपरा में पिछले दो हजार वर्षों में धर्म के नाम पर जो कुछ हमारे देश में होता आया है, वह सब धर्म नहीं है। यह हमको पहले मानना पड़ेगा। और इसलिए हमारे इतिहास में हमारा जो आचरण रहा है उसमें भेदभाव हुआ है, यह भी हमको मानना पड़ेगा। यह जब हम मानेंगे, तब समरसता के विषय को हम ठीक तरह समझ सकेंगे।

यह भेदभाव हुआ है। उसके परिणामस्वरूप हमारे यहाँ सामाजिक दृष्टि से समाज का एक बड़ा अंग- जो पहले कभी बराबरी में परिश्रम करके समाज के प्रगति में योगदान दे रहा था, वह सामाजिक दृष्टि से उपेक्षित, वंचित, पीड़ित और आजकल की भाषा में दलित बन गया। बन गया माने बनाया गया। और उसको हजारों साल वैसा ही रखा गया। यह वास्तविकता है। इसका धर्म से या मूल्यों से कोई संबंध नहीं है। उसका 'कोड' से या कर्मकांड से संबंध है। कोड बदलते रहता है। देश-काल-परिस्थितिनुसार उसको बदलना ही चाहिए। मूल्यों के आधार पर बार-बार परीक्षण करते हुए, देश-काल-परिस्थिति के अनुसार कोड बदलना चाहिए। वह बदला नहीं गया। वैसे ही चलता रहा। अब वह परंपरा बन गयी है इसलिए वह सही है, यह मानना गलत है। वह सही नहीं है। क्योंकि मूल्यों के आधार पर वह परंपरा टिकती नहीं हैं।

'पुराणमित्येव न साधु सर्वम् न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्। सन्तः परीक्षान्यतरत् भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ।।'

यह सुभाषित भी बालासाहबजी ने उसी भाषण में उद्धृत किया था। पुराना है इसलिए सब कुछ अच्छा है और जो नया है, वह सब कुछ त्याज्य है, ऐसा नहीं है। परीक्षा करो। यह परीक्षा हमने दो हजार वर्षों में की नहीं। और परिणाम यह हुआ कि मूल्य छूटते गए। परंपरा चलती रही, रूढ़ि बनी और वह गले की फाँस बन गई। इसलिए यह जो समरसता का विषय है, वह विषय प्रतिपादन का कम, आचरण का ज्यादा है। बोलने के बजाय, कृति प्रारंभ करनी पड़ेगी।

विषमता मन से निकालना : 

विषमता को मन से बाहर करना होगा। इस विषमता को मन से जो समर्थन है, उसे निकालना पड़ेगा। हम विषमता नहीं मानते। हम भारत माता के पुत्र हैं। हममें कोई भेद नहीं। हाँ, जाति हैं। वह एक वास्तव है। आज भी है। लेकिन अब वह एक व्यवस्था रही है क्या? ऐसा कुछ नहीं। फिर भी वह अस्तित्व में है। जिस घरमें जन्म हुआ, उस घर का सब कुछ हमें चिपकता है, तो यह भी चिपकता है। लेकिन उससे हमारे आचरण में कुछ अंतर पड़ता है क्या ? कुछ अंतर नहीं पड़ता। भारत माता के सभी पुत्र समान है। समान है, इसलिए ऐसा मानना और समानता का व्यवहार हमको करना पड़ेगा। समरसता के विषय में प्रबोधन बहुत आवश्यक है। लेकिन वह प्रबोधन केवल भाषणों से होनेवाला नहीं है। भाषण बहुत हुए इस संदर्भ में। लेकिन 'सामाजिक समता और हिन्दू संगठन' यह जो बालासाहब देवरसजी का भाषण है, वह अगर आप ध्यानपूर्वक पढ़ेंगे तो उसमें सारी दिशा, संघ का विचार, हम कैसा सोचते है, सब साफ है। जाति आयी कैसे ? व्यवसाय से। बादमें उनकी जाति बन गई और वह जन्मना हो गई। और चलती रही। धीरे धीरे वे मजबूत बन गयी। लेकिन जाति के मूल में विशिष्ट व्यवसाय है। आज व्यवसाय और जाति का संबंध नहीं रहा। इसलिए जाति धीरे-धीरे जाएगी। वे पूर्णरूपेण जाए इतना ही हमको देखना है। जाति की चर्चा तो समाज में चलती ही रहती है; लेकिन जाति से ऊपर उठकर व्यवहार कैसे करना है, यह हमें सोचना है। साथ-साथ इस जातिभेद के कारण समाज का जो अंग पीछे रह गया है, वह जल्दी से जल्दी सब समाज के बराबरी में आए इसलिए भी प्रयास करना हैं। यह दो काम अगर हम करते हैं, तो यह विषमता की समस्या समाप्त हो सकेगी। परंतु ये दो काम करने के लिए ‘यह क्यों करना' यह भाव भी मन में आवश्यक है। इस काम का प्रारंभ प्रथम मेरे से होता है। मैं इस बात को बोल रहा हूँ, लेकिन वास्तव में मेरे मन में क्या है, यह मुझे सोचना पड़ेगा। लोग मेरी कृति से अंदाज लगाएंगे। लेकिन मेरी कृति निर्दोष होने के बाद भी मेरे मन में क्या हैं, इसे मैं ही जानता हूँ। और कोई उसको बता नहीं सकता। मेरे मन से यह भेदभाव जड़-मूल से गया है कि नहीं गया है? यह देखना महत्त्व का है। केवल कुछ प्रतिकात्मक कार्यक्रम करने से बात नहीं बनेगी। मन को वैसा बनाना पड़ेगा। प्रतिकात्मक कार्यक्रम करते रहने से मन वैसा बनता है; लेकिन मन वैसा बना कि नहीं, यह भी हमें देखना पड़ेगा।

बालासाहब देवरसजी के पुणे के भाषण के बाद चर्चा हुई कि, इस भाषण ने समाज के लिए एक दिशादर्शक कार्य किया है। लेकिन स्वयंसेवकों के लिए इस भाषण में आचरण का संकेत है। स्वयंसेवकों का आचरण कैसा है, कैसा होना चाहिए? क्योंकि आज स्वाभाविक वातावरण ऐसा नहीं है कि मैं किये बिनाही मेरा विभिन्न जातियों से संपर्क आवे। सबके अपने-अपने अलग मकान हैं, अलग बस्तियाँ हैं, और विकास के कारण सबके अलग-अलग बाजार भी बन गये है। सब कुछ अलग है। विभिन्न जातियाँ हमारे सम्पर्क में आने का और उनसे मिलने का मौका ही नहीं आता है। मेरा जीवन, मेरे दायरे में ही व्यतीत हो जाता है। पढ़ने के लिए जाता हूँ, ऑफिस जाता हूँ, तो स्वाभाविक दृष्टि से मेरी जाति के लोग इकठ्ठा आ ही जाते हैं मेरे पास। या, मैं उनके पास चला जाता हूँ। मैं अगर विशेष प्रयास न करूं तो ये अपने ही लोगों का दायरा टूटने वाला नहीं है। ऐसी वस्तुस्थिति है।

हमारा आचरण :

इसलिए स्वयंसेवकों में यह चर्चा चली कि हमको जरा आगे होकर इसका प्रयास करना चाहिए। प्रवास में हमारा भोजन कहां रखेंगे ? महाराष्ट्र जैसे प्रांतों में जातिभेद की विशेष समस्या नहीं है, इसलिए इस बात का कोई विचार नहीं करता। जो कार्यकर्ता है उसके यहां भोजन रहता है। लेकिन किसी-किसी प्रांत में जातिभेद की रूढ़ि की पकड़ ज्यादा है। वहां, अधिकारियों का बताए बिना, स्थानीय कार्यकर्ता ही तय कर लेते हैं कि इनको कहां भोजन कराना और कहां नहीं कराना। हमको थोड़ा उसके ऊपर उठकर सोचना है कि हमको कहां भोजन करना है।

इसलिए हमारे एक विभाग कार्यवाह ने तय किया की, प्रवास के दौरान समाज में जिनको तथाकथित अस्पृश्य कहा जाता है, उसी कार्यकर्ता के यहां भोजन करूंगा। इस विभाग कार्यवाह ने बताया कि, "मेरे घर में तीन पीढ़ी से किसी ने ऐसा किया नहीं। शायद उसके पहले से यह चला होगा। लेकिन अब मैं प्रारंभ करता हूँ। मेरी माताजी इसके विरूद्ध है। लेकिन मैं नहीं मानूंगा।" उसने आचरण शुरू किया। उसका यह निश्चय अभी भी कायम है। लेकिन उसने अपना पहला अनुभव बताया- “मैंने तय किया था, मैं स्वयंसेवक हूँ, मैं मन से समानता मानता हूँ। इसलिए मैं उस विशिष्ट जाति के स्वयंसेवक के घर भोजन को गया। भोजन करने के लिए बैठा। पहले दो कोर गले के नीचे उतारने के लिए बहुत परिश्रम करना पड़ा।” एक तो मन की बात है, और दूसरी आदत की बात है। आदत दो हजार वर्षों की लगी है, उसको भी छोड़ना पड़ेगा। मेरे से प्रारंभ करना पड़ेगा। मुझे यह सोचना पड़ेगा कि मेरे मित्रों में हिन्दू समाज के सब वर्गों के मित्र हैं कि नहीं, उनके साथ मेरा व्यवहार स्वाभाविक है कि नहीं ? कि उनके साथ व्यवहार करते समय मैं सावध (कॉन्शस) रहता हूँ? बिल्कुल सहज, स्वाभाविक, जैसे बाकी सब मित्र हैं वैसा वह भी मेरा मित्र है, ऐसी मन की भावना होनी चाहिए। ऐसी मेरी मित्रता हिन्दू समाज के सब स्तरों में है कि नहीं? उनके यहाँ मेरा आना-जाना है कि नहीं ? अपने घर में उनका आना- जाना है कि नहीं ? हजार भाषणों से ज्यादा असर एक कार्यकर्ता के व्यवहार का होता है; समाज के एक व्यक्ति के व्यवहार का होता है। और इसलिए अपने से इस बात का प्रारंभ करना पड़ेगा। इसके बारे में प्रबोधन बहुत बार हुआ होगा। परंतु आगे बढ़कर इसको करना पड़ेगा। उसका प्रारंभ अपने मित्र मंडली से, अपने आचरण से, अपने व्यवहार से, अपने मन-वचन-कर्म से करना पड़ेगा।

हर एक प्रांत में, वहाँ की भाषा में कई कहावतें-मुहावरें हैं, जिसमें जातिवाचक शब्दों का प्रयोग है। हमारे मन में कुछ नहीं रहता, लेकिन बोलते समय हम आदत से बोल देते हैं। उसके पीछे भाव कुछ नहीं रहता, लेकिन सुनने वाले को वह चुभता है। हमारा मन निर्मल हो, सबके प्रति समबुद्धि रखने वाला हो, हमारा वचन दंशमुक्त हो। दूसरों को जिन बातों से दंश होता है उन बातों को हम न कहें। हमारे बोलने का भी हमें विचार करना पड़ेगा। ऐसे कई मुहावरें-कहावतें है, उनको छोड़ना पड़ेगा। हमारे अपने जो आदर्श महापुरूष

हैं, उनको हम विशेषण लगाते हैं; पूजनीय आदि। लेकिन अन्य महापुरुषों को आदरयुक्त विशेषण नहीं लगाते। यह आदत हो गयी है; इसके पीछे कुछ भाव नहीं रहता। लेकिन समाज देख रहा है, सुन रहा है। वो उसको पकड़ लेता है। यह आदत को भी ठीक करना पड़ेगा और सभी वर्गों से मित्रता करनी पड़ेगी। सभी लोगों को मित्र बनाने वाला अपना व्यवहार हो। समाज में कई प्रकार के संवाद चलते रहते हैं। वह सुनके अपने मन में भी कभी-कभी गाठें बन जाती हैं। वह गाठें हम बनने ना दें। तो हमारा यह जो प्रत्यक्ष कर्म है, प्रत्यक्ष व्यवहार है, वह इतना सहज, सरल हो सकता है। मेरे अपने जीवन में यह बात दिखनी चाहिए।

कुटुंब और परिवार : 

कुटुंब और पारिवारिक जीवन में एक पहलू है- मेरा व्यक्तिगत जीवन । दूसरा पहलू है मेरा परिवार, मेरा कुटुंब । उस कुटुंब में भी इस प्रकार का वातावरण हमको लाना पड़ेगा। दो शब्दों का उपयोग मैंने किया- परिवार और कुटुंब। हम इन दो शब्दों का समानार्थी भी उपयोग करते हैं। लेकिन उसकी अलग से भी व्याख्या हो सकती है। कुटुंब है जो रक्तसंबंध से बनते हैं। लेकिन उस कुटुंब के चरितार्थ में जिन-जिनका हाथ लगता है उनको मिला के परिवार बनता है। ऐसा मानकर, हम प्रयास करें कि अपना जो कुटुंब है, वह परिवार बनें। हमारे घर में काम करने के लिए कोई आता है, या कोई महिला आती है। ठीक है। वह आजीविका के लिए काम करती है, हम उसको पैसे देते हैं, लेकिन इससे बढ़कर अपना संबंध आगे जा सकता है क्या? वह हमारे इस विस्तारित कुटुंब की घटक यानी परिवार की घटक बन सकती है क्या? अपने घर के पर्व-त्यौहारों में हम अपने रिश्तेदारों को सम्मानपूर्वक बुलाकर आवभगत करते हैं, वैसे इनको भी हम कभी अनुभव दे सकते हैं क्या ?

हमारे एक कार्यकर्ता ने उसके नए घर के वास्तु शांति के निमित्त भोजन रखा था। लोग पूछने लगे कि भोजन कब है, कितने लोगों को बुलाया है? उन्होंने कहा कि आप सब कार्यकर्ता लोगों के लिए भोजन समारंभ बाद में है। अभी हमारे परिवार का कार्यक्रम हम करने वाले हैं। परिवार के कार्यक्रम में हम संघचालकजी को बुलानेवाले है। इस कार्यक्रम में सम्मिलित होने के बाद संघचालकजी ने बताया कि, वहाँ परिवार यानी उस कार्यक्रर्ता ने अपने जितने रिश्तेदार थे उनको तो बुलाया ही, लेकिन वह कपड़े धोने के लिए जिस लॉन्ड्री में डालते थे उस लॉन्ड्रीवाले को भी सपरिवार बुलाया था। जिस हेअर कटिंग सैलून में वह जाते थे उनको भी बुलाया। घर बनाने में जो लोग लगे थे, उनको भी सपरिवार बुलाया। और जैसे अपने रिश्तेदारों को बिठाके भोजन कराया, वैसे उनको भी बिठाके भोजन कराया। क्या यह अनुभव हम अपने कुटुंब को परिवार बनाकर समाज में दे सकते हैं? देना चाहिए। क्योंकि ये संवेदना का प्रश्न है।

समरसता अर्थात् मन की संवेदना :

समरसता यह मन की संवेदना है। मन की संवेदना मनुष्यता है; बंधुभाव है। कोई कुछ काम करता है, कोई कुछ काम करता है। किसी के यहां मैं नौकरी करता हूँ, या मेरे यहां कोई नौकरी करता है। लेकिन यह तो आजीविका का प्रश्न है। वह जैसा चलता है चलेगा, लेकिन यह मेरा अपना है, ऐसा अपने घर में आनेवाले हर व्यक्ति को अनुभव आता है कि नहीं? या पोर्च तक किसी को प्रवेश, बरामदे तक किसी को प्रवेश, आजकल जिसको ड्रॉइंग रूम बोलते हैं उसमें किसी को प्रवेश, रसोई में और किसी को प्रवेश, पूजाघर में और किसी को प्रवेश, ऐसे स्तर बनेंगे ? आदत तो है ऐसी। वह अब छोड़नी पड़ेगी। ये जो सारी गलत आदतें लगीं हैं उसको कठोरतापूर्वक छोड़ना पड़ेगा। हमारे सब संतों ने उडुपी में ये घोषित कर दिया है कि, इस प्रकार के भेदभाव को हिन्दु शास्त्रों का कोई आधार नहीं है। बहुत साल हो गए। 1972 में उन्होंने घोषित किया। उन्होंने यह घोषणा करने के बाद श्रीगुरुजी ने श्री सूर्यनारायणराव जी को पत्र लिखा। उसमें लिखा था, यह प्रस्ताव हो गया बहुत अच्छा हो गया, लेकिन प्रस्ताव से काम होने वाला नहीं। प्रस्ताव में जैसा कहा गया है वैसा समाज का आचरण हो, इसलिए स्वयंसेवकों को आगे बढ़कर अपना उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। क्योंकि यह बोलने का मामला है ही नहीं, यह आचरण का मामला है। क्या हम अपने परिवार में ऐसा अनुभव दे सकते है ? हमारे घर में जो नयी पीढ़ी है, कम से कम उनको इन सारी रूढ़ि-रीतियों से मुक्त रखकर व्यवहार करना सिखा सकते हैं ?यशवंतराव केळकर हमारे कार्यकर्ता थे। बहुत लोगों ने तो फार्म भरना पड़ा। उनके दो बालक जब स्कूल में गए, वहां उनको जाति पूछी गई। इनको पता ही नहीं था जाति क्या है ? तो घर आकर पूछने लगे जाति क्या होती है? हमको क्या लिखना है ? माता-पिता को स्कूल में जाकर समझाना पड़ा। उसके बाद भी फॉर्म में जाति लिखनी पड़ी की नहीं, मुझे मालूम नहीं। यह संस्कार बाहर नहीं होगा, अपने घर में हमको बच्चों को इस प्रकार आदत डालनी पड़ेगी।

हमारा सामाजिक व्यवहार : 

तीसरी बात है हमारा सामाजिक व्यवहार। यह सामाजिक व्यवहार भी अपने जीवन का एक अंग है। अपने जीवन का एक परिचय वह भी है। इस सामाजिक व्यवहार में सबसे पहले दो शब्द आते है- रोटी व्यवहार और बेटी व्यवहार। अब परिस्थिति के दबाव में रोटी व्यवहार तो होता है। लेकिन वह दबाव में होता है; सहजता से होता है क्या ? 

बचपन में हमारे विद्यालय का एक वनविहार का कार्यक्रम था। हम सब गए उसमें। अपने घर से भोजन का डिब्बा लेके जाना था। वैसे गए। पैदल चलके नदी पार एक आम का बगीचा था, उसमें बैठे, खेल हुए। बाद में हम भोजन के लिए बैठे। मेरे साथ जो बैठे थे, उन्होंने अपना डिब्बा खोला और “यह रोटी चलेगी क्या”, ऐसा पूछा। मुझे 'यह चलेगी क्या' वगैरह समझ में नहीं आया। मैंने कहाँ, "क्यों नहीं चलेगी? अरे, हमारी रोटी आपको चलती है, आपकी रोटी हमको क्यों नहीं चलेगी?" वे मित्र बोले- “वैसा नहीं... आप लोगों में पतली रोटी होती है और घी चुपड़ी होती है। हमारे लोगों में मोटी रोटी और सूखी होती है।” यह भाव मनमें रहता था। अभी भी है। नहीं है, ऐसा नहीं कह सकते। और उसके चलते 'आप लोग और हम लोग' ऐसा विभाजन होता है। यह 'आप लोग और हम लोग' छोड़कर रोटी व्यवहार में हम भोजन कर सकते हैं क्या? मन में भी नहीं आना चाहिए। यह दिखावे की बात नहीं है, यह मन से करने की बात है। इसमें प्रामाणिकता की आवश्यकता है। बेटी व्यवहार की बात जरा ज्यादा कठिन है। कठिन यानी और कुछ कठिनाई नहीं उसमें; लेकिन विवाहबंधन में वधू-वर की अनुरूपता, दोनों परिवारों की अनुरूपता, उनकी एक दूसरे के प्रति सहमति यह भी देखना पड़ता है। इसलिए उसको कानून बनाकर थोप नहीं सकते। वह मन से होनी चाहिए। लेकिन ऐसा जब होता है तब हम लोग उसके पक्ष में खड़े होते हैं कि नहीं होते ? हमारी भूमिका क्या रहती हैं? 

जीवन की पद्धति जैसे बदल रही है उसमें यह भी बंधन धीरे-धीरे टूट रहा है। अब टूट रहा है तो वह जल्दी टूटे और ठीक से टूटे, यह हम देखते हैं कि, अपनी पुरातन कल्पनाओं के कारण इस टूटने के विरोध में खड़े हो जाते हैं? महाराष्ट्र में, जो शायद 1942 में पहला अंतरजातीय विवाह था, उसमें पूजनीय गोलवलकर गुरुजी का संदेश गया था। उसमें उन्होंने कहा था कि, अंतरजातीय विवाह आप लोग कर रहे हो और वह केवल शरीर का विचार करके नहीं कर रहे हो, तो समाज में यह भेद समाप्त हो इसका उदाहरण रखने की भावना आपके मन में हैं, इसलिए मैं आपके इस विवाह का अभिनंदन करता हूँ। श्रीगुरुजी ने यह 1942 में कहा है। आज हमारी इसे निःसंदिग्ध रूप में चार लोगों में कहने की तैयारी हैं कि नहीं? यह करना पड़ेगा। समाज में ऐसे अनेक प्रश्न खड़े हो जाते हैं, तब हमारी भूमिका कैसे रहती हैं? भावनाएं भडकती हैं। विषमता गई नहीं है। इसलिए एक-एक विषय को लेकर पार्टियां बन जाती हैं। राजनीतिक दल की बात नहीं कर रहा हूँ मैं, समाज में धड़े खड़े हो जाते हैं। उस भावना के आवेग में न बहते हुए, उचित-अनुचित का विचार करके सामाजिक समता-समरसता को प्रस्थापित करनेवालों का ही हम समर्थन करें। उसी पक्ष के समर्थन में हम खड़े रहे और समाज के दो भाग न होने दें, ऐसी हमारी भूमिका रहनी चाहिये।

आरक्षण के प्रति दृष्टिकोण : 

जिन विषयों का हमारे दैनंदिन जीवन में संबंध नहीं आता, उनके बारे में तो ठीक है, यह साहस हम कर भी लेते होंगे। लेकिन आरक्षण जैसा विषय है, सीधा अपने से संबंधित है, अपने बालकों से संबंधित है। इस आरक्षण के संदर्भ में संघ की भूमिका है कि, सामाजिक भेदभाव जब तक है तब तक सामाजिक आरक्षण चलेगा। और सामाजिक भेदभाव समाप्त हुआ है, अब आरक्षण समाप्त करो, यह कौन तय करेगा ? जो सामाजिक भेदभाव के शिकार है, वे तय करेंगे। यह संघ की प्रारंभ से भूमिका है।

 पूजनीय बालासाहब देवरसजी ने एक पत्र परिषद में भी यह कहा है। क्योंकि यह वास्तविकता है। सामाजिक भेदभाव हआ है, और वह अभी गया नहीं है। अभी भी उदाहरण आते हैं। अखबार में समाचार आते हैं- मंदिर में प्रवेश नहीं हुआ, कुएं से पानी निकाला इसलिए पीटा - ये सब बाते अभी भी आती ही हैं। लेकिन आप जरा बारीकी से आपस का व्यवहार देखो। ऑफिसेस में देखो, इधर देखा-उधर देखो। अभी भी भेदभाव है। पहले यह भेदभाव सहन किया जाता था, आजकल सहन नहीं किया जाता है। उसका प्रतिकार होता है। इतना ही फर्क पड़ा है। यानी भेदभाव मन में है। यह मन से जाना चाहिए। विषमता का स्थान मन में है। वह व्यवस्था में है; शास्त्रों में नहीं है। व्यवस्थाएं विषमता का स्थान इसलिए बनती हैं कि वह मन में होता है। अच्छी व्यवस्था भी विषमता से तब हो जाती है, जब चलाने वालों के मन में अपना-पराया भाव आता है। और इसलिए अभी भी सामाजिक भेदभाव के लक्षण दिख ही रहे हैं। वह गया नहीं। वह नष्ट हो इसके लिए प्रयास करना पड़ेगा। 

इसलिए हम कहते भी हैं कि, कम से कम सारे हिन्दू समाज का मंदिर, पानी, श्मशान की जगह सबकी समान हो; एक हो। सब मंदिरों में सबको प्रवेश रहे, पानी के सब स्थानों पर हिन्दू समाज के सब घटक पानी भर सके और सब श्मशान सब हिन्दू लोगों के लिए खुले हो। यह होना चाहिए। तभी यह भेदभाव मन से गया है प्रत्यंतर समाज के प्रत्येक घटक को आएगा। लेकिन जब आरक्षण की बात आती है तो, दो धड़े खड़े हो जाते है। यह ठीक बात है कि अन्याय किसी पर नहीं होना चाहिए। और इसलिए आज की पीढ़ी में आरक्षण के कारण जिनका अवसर छिनता हैं, उनके मन में चिढ़ है। परंतु अगर हम एक समाज है, तो क्या हम यह विचार नहीं कर सकते कि, आज तक 1 हजार वर्ष, 1500 वर्ष, 2 हजार वर्ष तक जिन्होंने सहन किया, सहन ही करते आए है और सब सहन करते हुए भी हिन्दू समाज के अंग बनकर रहे। थोड़ा बहुत प्रतिकार हुआ, बगावत की भाषा हुई, कुछ कृति हुई तो वह पिछले सौ साल में हुई, उसके पहले तो ऐसा नहीं था। इतना सब सहन करके सब प्रसंगों में हिन्दू समाज के साथ खड़े रहे, देश के लिए लड़े। सब कुछ सहन किया। हजार साल उन्होंने सहन किया, हम सौ साल सहन नहीं कर सकते ? सहन करना चाहिए।

हमारा सामाजिक कर्तव्य : 

दीनदयालजी और नानाजी देशमुख, संघ में काम करते थे, राजनीति में नही गए थे, तब की एक घटना बताते हैं। देहातों में पैदल जाना पड़ता था। एक बार पैदल जाते समय, दीनदयालजी का पैर फिसला और वे गढ्ढे में जा पड़े। साथ के स्वयंसेवक तथा नानाजी, दीनदयालजी उपर आने की राह देखते रहे। आखिर दीनदयालजी ने स्वयंसेवकों को कहा- “भाई, जरा हाथ तो दो!" उपर आने के बाद दीनदयालजी ने कहा- “देखो, गढ्ढे से बाहर निकलने के लिए मैं अपने पंजों पर खड़ा रहा, एड़ियां ऊंची की, हाथ ऊपर किया और तुम ने क्या किया? तुम झुक गए और मेरा हाथ पकड़ के मुझे खींच लिया।" 'ऊपरवाला झुकता है और नीचेवाला उठता है...' यह दोनों बातें जब इकठ्ठा होती है, तब समाज की उन्नति होती है। समाज की उन्नति का यही शास्त्र है। अब नीचेवाला अगर हाथ ऊपर कर रहा है और उठने की चाह रख रहा है, और ऊपरवाले हम, अगर एक ही समाज के हैं, तो झुकना हमारा कर्तव्य है। कर्तव्य है, इसलिए वह निभाना चाहिए। दिल पर पत्थर रखकर करना चाहिए। थोड़ा हमने भी सहन करना चाहिए, कुछ नहीं बिगड़ता, ऐसा विचार हमने करना चाहिए। यह समझदारी की बात है। यह आत्मीयता की बात है। यह बात प्रेम की है, बंधुभाव की है, मनुष्यता की है और उसी को धर्म कहते हैं। धर्म के जो एथिक्स है, धर्म के जो मूल्य है, वैल्यूज हैं वो यही हैं। सत्य, ज्ञान, प्रेम और करुणा इन तत्त्वों के आधार पर जो खड़ा नहीं है, वह धर्म नहीं है। और इसलिए अपने सब पंथ-संप्रदायों में अपने-अपने तत्त्वज्ञान को धम्म, धर्म ऐसे शब्द दिए। ये शब्द विदेशी भाषाओं में नहीं है। ये शब्द भारत की भाषाओं में, भारत के पंथ-संप्रदायों में ही हैं। इन मूल्यों के आधार पर अगर विचार करते हैं तो ऐसे प्रसंगों में हम कहां खड़े होते हैं, यह ध्यान में आएगा। हमको कहां खड़ा होना चाहिए, यह ध्यान में आएगा। यह हमारा सामाजिक कर्तव्य है। उसको निभाना पड़ेगा। विषमता का राक्षस उसके सिवाय नहीं भागेगा।

समझदारी का व्यवहार : महापुरुषों की जयंतियां जैसे कार्यक्रम अपने यहाँ होते रहते हैं। दुर्भाग्य से इस विषमता के चलते, हमने उनको भी जातियों में बांट लिया। किसकी जयंती कौन करता है यह ध्यान में आता है। महापुरुषों का उपदेश, उनका जीवन पूरे समाज के लिए था। उनके लिखे ग्रंथ पूरे समाज में पढ़े जाते हैं। उनके लिखे हुए काव्य, सारे समाज में उनका पारायण होते रहता है। लेकिन उस महापुरुष को भी हम उसकी जाति से ही देखते हैं।

 भारत की आध्यात्मिक परंपरा में ईश्वर को देखने वाला, अनुभव करने वाला, या जो ईश्वर नहीं मानते, सत्य को अनुभव करने वाला कोई संत ऐसा नहीं है जिसने इस प्रकार की जातिगत विषमता का समर्थन किया हो। एक भी संत ऐसा नहीं है। किसीने संघर्ष किया, किसीने नहीं किया; लेकिन समर्थन किसी ने नहीं किया। यह पक्की बात है। तो हम कैसे उनको बांट रहे जातियों में? इन सबकी जयंतियां, पुण्यतिथियां मिलकर होनी चाहिए। हमने कार्यक्रमों में जाना चाहिए।वाल्मीकि जाति का एक भी बंधु जहां नहीं रहता ऐसी बस्ती में भी वाल्मीकि जयंती होनी चाहिए। सामाजिक आचरण में हमारे मन के समरसता की अभिव्यक्ति इसी प्रकार होनी चाहिए।

सामाजिक विषमता के संबंध में चर्चा चलती है। अभी भी समाज में धड़े बंटे हैं इसलिए चर्चा में अभिनिवेश आता है और सामान्य स्थिति में जिन बातों को सुनकर हम चिढ़ जाएंगे, ऐसी बातें होती है। किसी को चिढ़ आए ऐसी बात हमने नहीं करनी चाहिए। और हमको चिढ़ लानेवाली कितनी भी बातें सुननी पड़ेगी तो भी शांत रहना चाहिए। समझ लेना चाहिए कि, जिनको काफी कुछ सहना पड़ा है, वे उसकी भड़ास निकाल रहे हैं। निकल जाने दो। है तो अपने ही ना ! घर में कभी-कभी ऐसा होता है। कोई बहुत संतप्त हो जाता है और जो मिलेगा उसको डांटता है। तो लोग क्या करते हैं? गृहत्याग नहीं करते। उसको घर छोड़ने के लिए मजबूर नहीं करते। वे उसका क्रोध शांत होने देते, बाद में फिर जो बात करनी है वो करते हैं। हम अगर एक घर के लोग हैं, हम अगर भारतमाता के पुत्र हैं, हमारा यह अगर रिश्ता हैं, हम अगर परस्पर आत्मीयता से जुडे हैं, तो हमको भी सहन करना, समझ लेना, सीखना चाहिए।

मैं नागपुर का प्रचारक था तब कई साल पहले एक बौद्ध भिक्खु नागपुर आए थे। वे गीत आदि सिखाते थे बच्चों को। उनको संघ की काफी जानकारी थी। उन्होंने एक जगह भाषण में कहा कि, धर्म याने क्या है ? संघ याने क्या है ? वे मराठी भाषा में बोलते थे। वे कहते थे, बस, दो शब्द है मराठी में- 'समजून घ्या!' याने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और 'समजून घ्या' याने धम्म। इसका अर्थ- 'समझ लो याने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और 'समझ लो' याने धम्म। ऐसा वे बताते थे। यह जो एक-दूसरे के अंतर को समझने की, भाव को समझने की बात है, वह अगर मन में है तो इन भड़काने वाली कृतियों से अपना आचरण प्रभावित नहीं होता, अपना रवैया प्रभावित नहीं होता। इन सब बातों के उदाहरण सामाजिक समरसता क्षेत्र में काम करने वाले सब लोगों ने अपने जीवन में रखे हैं। अपने विचारों को लेकर वे चले। अपने विचारों पर कायम रहे। लेकिन समझदारी के साथ व्यवहार किया। जिनको हम उदाहरण मानते हैं, वे किसी भी विचारधारा के हो, सारे देश में जिनकी उदाहरण के नाते मान्यता बनी है या बन रही है, उन सबके जीवन देखो, उनके वचन देखो। आपको ये सब बातें उनके करनी में दिखेगी। अपने-अपने विचार को लेकर पूर्ण दृढ़ता के साथ प्रयास करते हुए भी ये बातें उन्होंने रखी हैं। अपने आचरण से रखी है। दुर्भाग्य है, उन्ही महापुरुषों को लेकर हम आपस में लड़ते रहते हैं। उन्होंने तो हमको आपस में लड़ना नहीं सिखाया। सत्य के लिए लड़ना जरूर सिखाया। एक संस्कृत सुभाषित हैं। उसका अर्थ है- 'तपता हुआ सूरज उतना कष्ट नहीं देता जितना उस सूरज के ताप से तपी हुई रेती शरीर को कष्ट देती है।' कभी- कभी ऐसा होता है। लेकिन हम सब लोग रेती होने बाद भी सूरज के ताप से ज्यादा न तपे, इतना ध्यान में रखना पड़ेगा और कुछ नहीं ।

समरसता तत्त्व की अनुभूति : 

ऐसी सारी परिस्थितियों में बात कैसे करना, कौन सी भूमिका लेना, कहां खड़े रहना, इसका विचार करके हम चलेंगे तो सामाजिक समरसता का प्रत्यक्ष आविष्कार सामाजिक जीवन में भी, सब घटकों की अनुभूति में आएगा। आज यह अनुभूति सारे देश में देने की आवश्यकता है। विचार तो बहुत हो गया। भाषण भी बहुत हो रहे है। होंगे और होते रहेंगे। वे होने दो। वह भी अच्छा है। उसमें से प्रबोधन होता है। लेकिन अध्ययन भी करना चाहिए ना ! क्या कहा डा. बाबासाहब आंबेडकरजी ने ? अपने पूरे जीवन में उन्होंने जितने विषयों के बारे में जो जो विचार प्रगट किए, क्या कहा है उन्होंने ? हम अध्ययन करें। अध्ययन करेंगे, तो आपको एक दूसरे बाबासाहब नजर आएंगे। उनके समकालीन लोगों ने तो उनको प्रत्यक्ष देखा था। इसलिए बाबासाहब का है। अब हम केवल बाबासाहब ने उस समय क्या विचार व्यक्त किये थे वे पढ़ बोलना उनके समझ में आने में कोई दिक्कत नहीं आयी। अब बाबासाहब नहीं सकते है। लेकिन वे विचार हमें समग्रता से पढ़ने पड़ेंगे। किस मनोभूमिका में, किस विचार के अधिष्ठान पर, कब बाबासाहब ने क्या बोला, यह हमें देखना पड़ेगा, उसका अध्ययन करना पड़ेगा। ये सारे महापुरुष अपने देश में एकता प्रस्थापित हो, समता प्रस्थापित हो, इसी के लिए प्रयास करने वाले लोग थे। जिस बिंदु से उनको कार्य प्रारंभ करना पड़ा और जिस परिस्थिति में काम करना पड़ा, और कभी-कभी जिन लोगों में काम करना पड़ा, उनको लेकर उनकी भाषा में फर्क है। भाव में कोई फर्क नहीं। 

स्वामी विवेकानन्द ने जो कहा, वही डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने कई बार कहा। यानी बाबासाहब उनके अनुयायी थे, ऐसा नहीं है। लेकिन प्रामाणिकता से विचार करने वाले ये सारे लोग हैं। अपने समाज के हित की उनकी आंतरिक तड़पन उत्कट है। विचारधारा अलग होगी, पालन पोषण अलग;अलग वातावरण में हुआ होगा। अलग परिस्थिति में काम करना पड़ा होगा, अलग लोगों के लिए बोलना पड़ा होगा, लेकिन भाव तो एक ही है। सबका अध्ययन करने के बाद यह ध्यान में आता है और इन सभी के हृदयों की समरसता हमारे समझ में आती है। उससे हमको मदद मिलती हैं। कई प्रकार की जटिल परिस्थितियों में इन सारी बातों का अध्ययन करके अगर हम चलते हैं, तो हमारा रास्ता साफ हो जाता है। इसलिए अध्ययन करना चाहिए, पढ़ना चाहिए। यह सारा व्यवहार हम करेंगे, तो सामाजिक समरसता याने क्या, यह बताने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इसको केवल बोलते रहेंगे, बहुत बोलेंगे तो भी कम समझ में आएगा। शायद समझ में नहीं भी आएगा। क्योंकि आखिर किसी वस्तु का वर्णन करने की, वस्तु को समझने की विचारों की मर्यादा होती है और विचारों के अभिव्यक्ति की, शब्दों की मर्यादा होती है। वस्तु वास्तविक क्या है, वह अनुभव से ही पता चलता है। वह अनुभव देने के लिए हम अपने मन की तैयारी करें। हम अपने घर की तैयारी करें। हम अपने कार्यकर्ता समूह की तैयारी करें और हम अपने व्यक्तिगत-कौटुंबिक और सामाजिक व्यवहार के द्वारा इस समरसता तत्त्व की अनुभूति सबको दें। इसकी आवश्यकता है।

यह सब बातें पूजनीय बालासाहब देवरसजी अपने पुणे के भाषण में कही थीं। सामाजिक समता और हिन्दू संगठन, हमारे लिए सदा के लिए दिशानिर्देश है। उस विषय के बारे में जो करना हैं, उसके बारे में जरा विस्तारपूर्वक कुछ अपने अनुभव की बातें जोड़कर आपके सामने रखा है।

(राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत का नागपुर नागरिक सहकारी बैंक द्वारा, 16 दिसम्बर 2015 पूजनीय बालासाहबजी देवरस जन्मदिन पर आयोजित व्याख्यान में दिया गया भाषण)

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।