मनोहर अपनी पत्नी से झगड़ कर घर से बाहर निकल आया। आज पीने के लिए उसके पास एक नया पैसा नही था। उसकी पत्नी आज सावन सोमवार का व्रत रखे हुए थी, मगर फलाहार के नाम पर एक लोटा जल के अतिरिक्त घर में कुछ और न था। वह मंदिर गयी, शिव को जल अर्पित कर वापस आयी पानी पीकर घर के काम में लग गयी।

मनोहर बाजार गया, बार बार मधुशाला पर जाता, लोगों से अनुनय विनय करता कि उधारी मिल जाये पर शराबी को कौन उधार देता। अचानक उसे पंडित राम निहोर दिखे, सीधा बांधे राम राम कहते चले जा रहे थे। वह भाग कर पंडित जी के पास गया और उनसे उधारी के लिए प्रार्थना करने लगा। 

देखो जजमान हमारे पास सीधा पिसान है इससे काम चल जाएगा तो ले लो, पंडित राम निहोर ने पोटली की तरफ इशारा करते हुए कहा।

महाराज कुछ नकद हो तो दे दीजिए यह उपकार मैं नही भूलूंगा, आर्त स्वर में मनोहर बोला।

नकद तो नही है पर एक जगह मैं कथा सुनाने जा रहा हूँ, तुम चलो तो वहाँ मिल सकते, ज्यादा देर नही बस एक घण्टे में सौ सवा सौ रुपये मिल जाएंगे। पंडित ने मधुर स्वर में कहा।

अंधा क्या चाहे दो आंख, मनोहर चलने के लिए तैयार हो गया पर पंडित जी ने एक शर्त रखी, उसे कहा कि वह नहाकर धोती पहन कर उनके साथ बैठेगा, कोई पूछेगा कि वह कौन तो मुंह बंद कर केवल हाथ जोड़ लेगा, यह कह कर पोटली से एक नई धोती निकाली और उसे देकर सरकारी नल पर जाने को कहा। मनोहर को पीने की तलब इस कदर थी कि वह झट्ट से नहाने चला गया।नहा धोकर नई धोती पहन कर जब वह आया तो पंडित जी ने फिर पोटली से शीशा कंघी तिलक चंदन निकाला, चंदन का लेप माथे ओर लगाते ही मनोहर का तमस कुछ कम हुआ, उसने शीशे में स्वयं को देखा, तिलक चंदनयुक्त माथा चमक रहा था। 

पंडित जी उसे कथा में ले गए। वह ऋतध्वज और मदालसा की कथा कहने लगे, कथा ज्यों ज्यों आगे बढ़ती गयी उपस्थित जनमानस के अश्रु बहने लगे और जब आखिर में मदालसा पति वियोग में प्राण त्याग देती है पूरा समाज भावातिरेक के सागर में डूब जाता है। मनोहर के मन की कालिमा धीरे धीरे पिघलती है। वह सोचता है कि उसे कितनी साध्वी पत्नी मिली है, अपने धर्म पर अडिग, बालकों को उसने सारे कुसंग से बचाते हुए किस तरह शिक्षा दी, और वह ! उसने तो पातालकेतु से भी घोर पाप किया। उसके अंदर का भाव संवेदना के मुरझाए बीज से अंकुर फूट पड़े। वह रोते हुए पंडित जी के चरणों मे गिर पड़ा। पंडित जी ने उसके सिर पर हाथ फेरा और कथा समापन के पश्चात मिली सारी दक्षिणा उसे दे दी।

मनोहर जब घर आया तो उसके पास एक झोला था जिसे उसने रमा को थमा दिया, रमा ने देखा तो उसमें बिंदी के पत्ते, हरी चूड़ियां, बताशे और भगवान शिव की एक पिंडी थी। उसने मनोहर की आंखों में देखा, उसके नयनों प्रेम का अगाध सागर हिलोर मार रहा था। मनोहर ने रमा का हाथ अपने हाथों में कसकर पकड़ लिया, कहा सुना माफ करना रमा, आज मनोहर का पुनर्जन्म हुआ है। 

रमा डबडबाई आंखों से मनोहर को देखती रही, फिर बोली कि चलो पंडित जी के पास चलकर शिवलिंग की थापना का साइत सुकाल पूछ आते हैं और इस बहाने वह भी उनका आशीर्वाद ले लेगी। मनोहर तैयार हो गया।

जब वे पंडित जी के घर पहुँचते है तो पता चला पंडित जी कल से ही शहर में नही हैं, वह किसी जजमान के यहाँ भागवत कहने दूसरे शहर गए हैं।

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।