भारत के स्वतंत्रता संग्राम के पन्नों में कुछ अध्याय ऐसे हैं, जिन्हें जानबूझकर धुंधला कर दिया गया। 1921 का मोपला अथवा मालाबार नरसंहार ऐसा ही एक प्रसंग है। इसे आज तक "किसान विद्रोह" या "अंग्रेज़ विरोधी आंदोलन" बताकर दरकिनार किया जाता रहा जबकि प्रत्यक्षदर्शियों, तत्कालीन सरकारी अभिलेखों और समकालीन नेताओं की साक्षी स्पष्ट करती है कि यह एक योजनाबद्ध हिंदू नरसंहार था।

20 अगस्त 1921 को वर्तमान केरल राज्य के मालाबार क्षेत्र के तिरूरंगाड़ी में पुलिस द्वारा खिलाफ़त नेताओं की गिरफ्तारी ने हिंसा की चिंगारी भड़का दी। पृष्ठभूमि यह थी कि प्रथम विश्वयुद्ध के बाद तुर्की के खलीफा की सत्ता संकट में थी और भारतीय मुसलमानों ने उसके समर्थन में खिलाफ़त आंदोलन छेड़ दिया। महात्मा गांधी ने हिंदू-मुस्लिम एकता की आशा में इस धार्मिक आंदोलन को स्वतंत्रता संग्राम से जोड़ दिया। यही गांधीजी की ऐतिहासिक भूल थी। जिस आंदोलन का संबंध भारत की स्वतंत्रता से नहीं, बल्कि तुर्की के खलीफा से था, उसे भारत के राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ देने से राष्ट्रीय संघर्ष की दिशा ही सांप्रदायिक रंग में रंग गई।

परिणाम सामने था। मालाबार की धरती रक्त से लाल हो गई। हजारों हिंदुओं की हत्या हुई। महिलाओं के साथ बलात्कार, जबरन धर्मांतरण और मंदिरों की तोड़-फोड़ हुई। समकालीन सरकारी रिपोर्टों में 10,000 से अधिक मौतें, 45,000 विस्थापित और हजारों मंदिरों व घरों की लूट दर्ज है। एनी बेसेंट ने अपने लेख में इसे स्पष्ट शब्दों में "हिंदुओं के विरुद्ध युद्ध" कहा। सी. शंकरन नायर ने अपनी पुस्तक Gandhi and Anarchy (1922) में लिखा कि यह कोई स्वतंत्रता संग्राम नहीं था, बल्कि "कट्टरपंथी उभार था जिसमें हिंदुओं का नरसंहार और मंदिरों का अपमान किया गया।"

गांधीजी ने हिंसा की निंदा की लेकिन मुसलमान समाज और नेतृत्व की आलोचना से बचते रहे। कांग्रेस ने भी इस हत्याकांड को "किसान असंतोष" बताकर ढकने की कोशिश की। इस पर बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर ने तीखी आलोचना की और कहा कि गांधी और कांग्रेस हिंदुओं की पीड़ा को अनदेखा कर रहे हैं। बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने भी अपने भाषणों में मोपला कांड का उल्लेख किया और कहा कि यह घटना हिन्दू समाज के लिए चेतावनी है। यदि हम संगठित नहीं हुए तो यही त्रासदियाँ बार-बार घटेंगी।

वीर सावरकर ने अपनी पुस्तक “मोपला” में इसे केवल नरसंहार ही नहीं, बल्कि कांग्रेस की तुष्टिकरण नीति का परिणाम बताया। उन्होंने चेताया कि यदि इस मानसिकता को नहीं बदला गया तो भविष्य में इससे भी बड़े विभाजन और रक्तपात की राह खुलेगी। और हुआ भी यही। 1946 का डायरेक्ट एक्शन डे कलकत्ता में हुआ, जब मुस्लिम लीग ने खुलेआम हिंसा का आह्वान किया और हजारों हिंदुओं का कत्लेआम हुआ। कांग्रेस नेतृत्व तब भी असमंजस और तुष्टिकरण में उलझा रहा। परिणामस्वरूप भारत का विभाजन हुआ और लाखों हिन्दू सिखों का खून बहा।

दुर्भाग्य यह है कि स्वतंत्रता के बाद भी वही मानसिकता जारी रही। कांग्रेस ने तुष्टिकरण की नीति को राजनीतिक रणनीति बना लिया और वामपंथी विचारधारा ने इसमें बौद्धिक आवरण डाल दिया। इतिहास में मोपला नरसंहार जैसे प्रसंगों को दबा दिया गया ताकि "सांप्रदायिक सौहार्द" का मुखौटा बचा रहे। यही कारण है कि आज भी इस घटना की चर्चा होते ही कई राजनीतिक दल असहज हो उठते हैं।

मोपला नरसंहार केवल अतीत की त्रासदी नहीं, बल्कि आज की राजनीति का आईना भी है। जिस मानसिकता ने 1921 में हिंदुओं का रक्त बहाया, वही मानसिकता 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे में सामने आई, और वही मानसिकता आज भी छद्म धर्मनिरपेक्षता और तुष्टिकरण की राजनीति के रूप में जीवित है। यदि हम इतिहास को ईमानदारी से स्वीकार न करें, तो उसकी पुनरावृत्ति निश्चित है।

आज, जब इस घटना को सौ वर्ष से अधिक हो चुके हैं, आवश्यक है कि हम सच्चाई को स्वीकारें। मोपला नरसंहार हमें याद दिलाता है कि राष्ट्रहित से ऊपर रखी गई तुष्टिकरण की राजनीति अंततः समाज और देश दोनों को विभाजन और रक्तपात ही देती है।

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।