सूर्य का वह पुंज पुलकित,

कर रहा मेरी धरा।

पवन पावन, सलिल निर्मल,

नदियों सरोवर में भरा।

वृक्षों तले बैठे जहाँ,

सन्त जैसे ख़ुद तथागत।

ऐसा प्यारा मेरा भारत। ।

वेदों से निर्झर सुशोभित, 

सन्त हिय सम काननों में।

प्रेम नित उल्लास बहता, 

जन मनों के उपवनों में।

क्षुधा-तृष्णा तुच्छ होकर, 

सबसे पहले अतिथि स्वागत।

ऐसा प्यारा मेरा भारत ।।

देवों ने अवतरित होकर, 

अन्नजल अर्पण किया।

ब्रह्म ने ख़ुद को उतारा, 

मनु का तन धारण किया।

सरस्वती सरसी स्वयं ही, 

श्लोक छन्दों में निरूपत ।

ऐसा प्यारा मेरा भारत ।।

ऋषि हुए वाल्मीकि से, 

जो राम को कहते मरा।

लिख दी फिर रामायण,

फिर राम ही रमते मरा।

समय की गाथा समेटे, 

है यहाँ हर एक कहावत।

ऐसा प्यारा मेरा भारत ।।

प्रस्फुटित हैं पुष्प हमभी, 

कर्मठों के देश में।

आस है पलते बढ़े, 

बस इसी परिवेश में।

नाम उज्ज्वल कर सकें, 

प्राप्त कर कोई महारथ।

ऐसा प्यारा मेरा भारत, 

ऐसा प्यारा मेरा भारत॥

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।