भाजपा का वैशिष्ट्य उसकी वैचारिकी और कैडर है।यह पार्टी विद डिफरेंस का सशक्त आधार भी है।आज पार्टी का आधार अपने चरम पर है। इसके पीछे जनाकांक्षाओं और कैडर की विश्वसनीयता का युग्म भी महत्वपूर्ण कारक है। देश के संसदीय लोकतंत्र में आज भाजपा के विरुद्ध समूचा विपक्ष अपने परस्परिक अंतर्विरोध को भुलाकर समवेत है तो यह वैभव पार्टी की विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक स्वीकृति का परिणाम ही है।इस सशक्त भूमिका के बाबजूद आज देश में भाजपा की कार्यशैली की चर्चा केंद्रीय विषय बनी हुई है तो इसके मूल में बिहार और मध्यप्रदेश की दो विधानसभा सीट्स के उपचुनाव नतीजे हैं।

यूं इन दो सीटों के नतीजों से सरकार की सेहत पर कोई असर नही पड़ा है। लेकिन राजनीति में धारणा और परिवर्तन अक्सर छोटी छोटी घटनाएं ही निर्मित करती हैं।इतिहास गवाह है कि कैसे गुजरात में हॉस्टल की फीस बढ़ना जेपी की समग्र क्रांति का आधार बन गया था।सत्ता का स्थायी चरित्र है कि यह अपने साथ कुछ ऐसी बुराइयों को लेकर चलती है जिन्हें सत्ता अक्सर समझ ही नही पाती है।बांकीपुर और दतिया उपचुनाव के परिणाम क्या सत्ता के साथ आने वाली स्वाभविक बुराइयों को इंगित कर रहे हैं?इस सवाल के जबाब तलाशना और उनका समय रहते निराकरण भाजपा के लिए अत्यावश्यक हो गया है।

बांकीपुर में राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट 19324 वोट से हार जाना सामान्य चुनावी घटनाक्रम नही है।यूं तो इस देश में मुख्यमंत्री भी उपचुनाव में अपनी सीट हारते रहे हैं लेक़िन कुछ राजनीतिक घटनाक्रम जनसंदेश और संगठन की दृष्टि से विशिष्ट होते हैं।बांकीपुर और दतिया इसी श्रेणी के चुनाव परिणाम हैं।बांकीपुर में जितने वोट प्रशांत किशोर को मिले हैं उससे ज्यादा वोटों के अंतर से नितिन नबीन पिछला चुनाव वहां से जीते थे।पिछले 35 साल में कभी भी भाजपा को 50 प्रतिशत से कम वोट इस सीट पर नही मिले।खासबात यह कि करीब 35 फीसदी वोटर इस सीट पर सवर्ण हैं।

परिणाम बता रहे हैं कि बांकीपुर में भाजपा का परम्परागत वोट प्रशांत किशोर को शिफ्ट हो गया है।महत्वपूर्ण आंकड़ा यह भी कि यहां कायस्थ वोटर भी भाजपा उम्मीदवार की जगह प्रशान्त के हिस्से में गया है। कमोबेश दतिया में भी परम्परागत कोर वोटर ने कांग्रेस की तरफ रुख किया और निष्कर्ष में कहा जा सकता है कि इन दोनों सीट्स पर भाजपा के कोर वोटर ने भाजपा से किनारा कर लिया।

सवाल यह है कि क्या भाजपा की निर्णयन प्रक्रिया में कुछ ऐसा स्थापित हो गया है जो कैडर और जनाकांक्षाओं के बीच गैप को समझ नही पा रहा है।बांकीपुर और दतिया में जो कैंडिडेट जीते हैं उन्हें जनता वोट क्यों नही दे ?इस सवाल का जवाब ईमानदारी से इसलिए भी तलाशा जाना चाहिए क्योंकि आम मतदाता को पता था कि इस चुनाव परिणाम से दोनों राज्यों की सरकार पर कुछ भी फ़र्क नही पड़ने वाला है।तो क्या माना जाय कि भाजपा का परम्परागत यानी कोर वोटर और कैडर इन नतीजों के जरिये अपने संगठन को निर्णयन की प्रक्रिया पर पुनर्विचार करने का अनुरोध कर रहा है।

भाजपा में आज भी निर्णय तुलनात्मक रूप से सामूहिकता के आधार पर होते हैं । लेकिन पिछले कुछ समय से कैडर को यह लगने लगा है कि उसकी भूमिका और उसकी प्रासंगिकता महत्वपूर्ण नही रह गई है।यह भाव न तो भाजपा जैसे संगठन के लिए ठीक है और न ही हमारे संसदीय लोकतंत्र के लिए।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में कॉलेजियम सिस्टम को लेकर यही बात उठाई गई है कि जिन्हें हम पात्र/अपात्र समझते हैं उनको लेकर पारदर्शिता और जबाबदेही लोक के प्रति भी होनी ही चाहिए।एक दौर था जब भाजपा में प्रत्याशी चयन के लिए कैडर को उसकी मुक्त भूमिका दी जाती थी।ईमानदारी से देखा जाए तो यह प्रवृत्ति संगठन को विचार और जनता के प्रति उत्तरदायी बनाती रही है। मौजूदा हालात में कैडर लिए दुविधा यह है कि उसकी कोई सुन नही रहा है। सोशल मीडिया ने राजनीतिक जागरूकता को एजेंडा बेस्ड बना दिया है। इसलिए अब वैचारिक और डिलीवरी दोनों के मोर्चे पर कैडर की मुश्किलें बढ़ी हैं।राजनैतिक युद्ध अब घर घर जाकर समझाने की 

दुनिया छोड़कर फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स पर लड़े जा रहे हैं।बांकीपुर में एक फेक नैरेटिव प्रशांत किशोर ने खड़ा किया कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि इस सीट से अगर हम कुत्ता और बिल्ली को खड़ा कर देंगे तो वह भी जीत जाएगा।पूरे चुनाव अभियान में भाजपा इस दुष्प्रचार का कोई काट नही कर पाई। कार्यकर्ता भी किसी से नही कह पाए कि यह झूठ है। 

दतिया में महीने भर तक नरोत्तम मिश्रा प्रत्याशी की तरह चुनाव अभियान में लगे रहे। कोई उन्हें रोकने वाला नही था और जब टिकट काटा गया तो उन्हें इसकी सूचना सोशल मीडिया से मिली।बांकी पुर में पहले जिस उम्मीदवार को टिकट दिया गया उसके माता और पिता दोनों चारा घोटाले में जेल जा चुके थे।वह अपना नामांकन पत्र भी ठीक से नही पढ़ पा रहे थे।बदल कर जिसे उम्मीदवार बनाया उसे लेकर कोई चर्चा हुई हो ऐसा नही लगता है। क्योंकि उनका बायोडेटा आई टी सेल ने दिल्ली से जारी किया और दावा किया कि वह बूथ लेवल कार्यकर्ता हैं

दतिया में दावा किया गया कि सर्वे में नरोत्तम मिश्रा हार रहे थे।लेकिन सवाल यह कि जिन्हें उम्मीदवार बनाया गया क्या उनको लेकर सर्वे किया गया था?दोनों जगह स्थानापन्न उम्मीदवार की जाति के उम्मीदवार ही क्यों दिए गए ? ऐसे बहुत से सवाल है जो कैडर को परेशान करते हैं।प्रशांत किशोर जब बांकीपुर में शिक्षा और स्वास्थ्य के सवाल उठा रहे थे।

मुख्यमंत्रीचौधरी की पढ़ाई लिखाई पर सवाल उठा रहे थे।तब कैडर के पास डिलीवरी का क्या मॉडल जनता को बताने के लिए था?दतिया में भी कमोबेश ऐसे ही सवाल थे।इस मनःस्थिति को ईमानदारी से समझने की आज आवश्यकता है।बिहार और मप्र ऐसे राज्य है जहाँ दो दशकों से भाजपा का शासन है।क्या शासन के साथ मैदानी कैडर की प्रतिष्ठा और जबाबदेही के मॉडल पर मूल्यांकन नही होना चाहिए?

एक और धारणा संगठन के स्तर पर यह बनती जा रही है कि चुनाव जिताने वाले ऊपर वाले हैं इसलिए हर निर्णय में मन-बेमन से प्रतीकात्मक रूप में खड़े रहिए।चुनाव जीतने के लिए फ्री बीज जैसी स्कीमें और मोदी जी का चमत्कार ही निर्णायक कारक निर्मित कर दिए हैं। संभवतः इसलिए भाजपा कैडर का उत्साह और प्रतिबद्धता दोनों विचलन की अवस्था में हैं।

बेशक यह बात सत्य है कि आज की भाजपा ने राजनीतिक विस्तार और चुनावी सफलता को अभूतपूर्व और अकल्पनीय वैभव पर स्थापित किया है।इसलिए यह धारणा भी बनाई जा रही है कि प्रशांत किशोर की जीत भाजपा की सहमति से हुई है। यानी भाजपा अब विपक्ष में कौन होगा यह भी तय करने की स्थिति में है।यह तर्क और भाव दोनों खतरनाक भी हो सकते हैं । क्योंकि प्रशान्त किशोर की जीत जितना लालू प्रसाद की कुनबाई पार्टी के लिए खतरा है उतना ही भाजपा के लिए क्योंकि बांकीपुर में भाजपा का कोर वोटर शिफ्ट हुआ है।

राजनीति में प्रचलित अगड़े पिछड़े मुहावरे के लिहाज से देखा जाए तो प्रशान्त करीब 40 साल बाद नॉन ओबीसी विकल्प के रूप में बिहार में खड़े हो रहे हैं।उन्होंने भाजपा के लोगों को समझाया कि एक सीट से भाजपा नही जाने वाली है लेकिन वे यूजीसी,जेन जी,बक्सर एनकाउंटर से लेकर सरकारी स्कूलों,पलायन और विकास को मुद्दा बना रहे थे।लालू के वोटरों को वह भरोसा दिलाने में कामयाब रहे कि भाजपा को लालू नही वे ही रोक सकते हैं।यानी वे खुद को बेहतरीन विकल्प के रूप में साबित करने में कामयाब रहे।बस यही विकल्प का चुनावी भान एक खतरा भी है । क्योंकि तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति को चरम पर ले जाने के बाबजूद टीवीके कैसे सत्ता में आ गई इस पर विचार किया जा सकता है।विकल्प…विकल्पहीनता और मौजूदा विकल्प के महीन अंतर को समझने की आज आवश्यकता है।

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।