प्रत्येक साहित्य की अपनी विशेषताएं होती हैं। और उस साहित्य में किसी साहित्यकार का अपना विशिष्ट स्थान भी होता है। हिंदी साहित्य में गोस्वामी तुलसीदास का अपना स्थान है। गोस्वामी तुलसीदास जी से हिंदीभाषी समाज ही नहीं अपितु संपूर्ण भारत परिचित है। इधर नवीन अनुसंधानों तथा अध्ययन के प्रति जागरूक प्रख्यात विद्वानों ने गोस्वामी तुलसीदास जी के साहित्य का जिस श्रद्धा तथा महत्व के साथ अध्ययन, अनुशीलन किया है, वह उनकी प्रसिद्धि अंग बन चुका है। चाहे रूस के प्रसिद्ध भाषा मर्मज्ञ डॉ. वरात्रिकोव का उसी भाषा के अनुसार प्रस्तुतिकरण हो या फ्रेंच भाषा के अंतर्गत रामचरित मानस का अनुवाद ये सब बहुत पहले हो चुके थे। अंग्रेजी भाषा मे कई अनुवाद हो चुके हैं। ये अनुवाद कार्य इस बात के साक्षी हैं कि कवि की महत्ता उसकी मौलिक सृजनशीलता के ही फलस्वरूप है।

वस्तुतः तुलसीदास जी के सृजन में उनका एक ऐसा विशाल व्यक्तित्व भी निहित है जिसमें कवि, भक्त, समाज सुधारक, चिंतक आदि न जाने कितने रूप समाहित हैं। उनके स्वरूप जो खुल कर प्रकट हुए, उनमें भक्त तथा कवि रूप गोस्वामी तुलसीदास में अंततः 'भक्त तथा कवि यही दो व्यक्ति प्रधान है जो शेष उनके अन्य रूपों को अपने में समाहित किए हुए हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी में भक्ति तत्व प्रमुख है या कवि यह अनुमान लगाना सरल नहीं हैं। उनमें एक उदात प्रतिभा संपन्न कवि की संपूर्ण क्षमताएं सहज रूप में संबद्ध है तथा उनकी विशाल, उदार, सहृदयता एवं भावुकता में संपूर्ण सामाजिक संवेदनशीलता स्पंदित हो रही है।उनका कवि रूप बड़ा ही मार्मिक तथा हृदयग्राही है। रामचरित मानस की भूमिका के अंतर्गत उन्होंने अपने कवित्व की जो मर्यादाएं निर्धारित की है। वे उच्चतम मानवीय मूल्यों से मंडित हैं-

 “सुमति भूमि थल हृदय अगाधू वेद पुरान उदधि धन साधू। 
नरसिंह राम सुजस बरबारी मधुर मनोहरन मंगलकारी।।”

निःसंदेह रामचरित मानस जैसा काव्य किसी अगाध सहृदय ही सुनिश्चित शांत तथा पवित्र मनोचेतना की उपलब्धि है। उसमें किसी महाकवि की प्रखर-काव्यमेधा विराजमान है जहां कवित्व संवेदना साथ में है। वहीं भक्ति तुलसीदास जी की मूल संजीवनी है जिससे उनकी चेतना प्राणवान है। पर वे एक ऐसे भक्त हैं। जो राम के अतिरिक्त कुछ नहीं जानते। राम नाम के अतिरिक्त और उनकी कोई साधना नहीं है तथा उनकी संपूर्ण आंतरिक सजगता राम तथा राम नाम से जैसे स्फूर्त हो और अंततया उसी में विलीन होने के लिए निरंतर उसी के प्रति उन्मुख होती जा रही हो। रामचरित मानस की विश्व यात्रा की शुरूआत अंग्रेजी शासन के दौरान उस समय हुई जब मजदूर के रूप में देश से कामगार अन्य ब्रिटिश उपनिवेशों को भेजे गए। गुलामी के उस दौर में आस्था और संस्कार को संजोने के लिए गिरमिटिया मजदूर अपने साथ मानस संजीवनी ले गए थे। अपने इस संस्कार की थाती लिए आज उन देशों में मुख्यधारा में शामिल हुए। 

तुलसी की इस साहित्यिक धरोहर ने उन्हें वह बोध व संबल प्रदान किया कि वे मजदूर से आज वहां की निर्माता शक्ति के रूप में पहचाने गए। विश्व के एक बड़े भू-भाग, मारिशस, पश्चिमी हिंद द्वीप समूह, सूरीनाम, त्रिनिदाद आदि देशों में भारतीयों ने अपने अस्तित्व को शून्य से शिखर तक पहुंचाया तो इसके पीछे तुलसी साहित्य की अप्रतिम संरक्षक-संवर्धक परंपरा का अहम योगदान है।

भारत ही नहीं वैश्विक परिदृश्य पर वृहद व समग्र दृष्टि डालें तो कई स्वरूपों में परिवर्तन होता रहा। भक्ति, नैतिकतायुक्त आचरण, पूजा विधान आदि से पृथक मानसिकता संवेदना के रूप में इस समय तक स्वीकृत हो चुकी थी। ईश्वर के प्रति पुनरुक्ति तथा आंतरिक प्रेम निष्ठा के रूप में व्यक्त होने वाले मानसिक संवेदन के रूप में इसे समझा जाने लगा था। इस स्तर पर काव्य तथा भक्ति की संवेदनाएं प्रायः एक सी हैं। इसका कारण है- तुलसीदास जी एक ऐसे कवि हैं जिनके काव्य को सुनने पर प्रतीत होता है कि साधना के क्षेत्र में जो भक्ति है वही रचनाशीलता के स्तर पर अभिव्यक्त हो कर काव्य बन जाती है। वस्तुतः दोनों परस्पर एक-दूसरे के पूरक ही हैं।

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।