एफसीआरए की गर्भनाल और अमेरिका…

एफसीआरए कानून को लेकर इस समय देश की राजनीति गरमाई हुई है। दावा किया जा रहा है कि गृह मंत्री अमित शाह जिस नए संशोधन विधेयक को लेकर मार्च में आए हैं, वह ईसाई धर्म के खिलाफ है और इसके जरिये चर्च की संपत्तियों पर सरकार कब्जा कर लेगी। पिछले दिनों ईसाई धर्मगुरुओं का प्रतिनिधिमंडल अमित शाह से मुलाकात कर चुका है। अमेरिका से कुछ सांसद और पत्रकार वैश्विक स्तर पर एक नैरेटिव बनाने में जुटे हैं कि भारत सरकार ईसाइयों के उत्पीड़न वाला कानून ला रही है।

विदेश से आने वाला चंदा और इसका खर्च देश में दशकों से विवाद का विषय रहा है। वर्तमान सरकार इसमें दूसरी बार बड़ा संशोधन लेकर आ रही है। किसी कानून में संशोधन सामान्य विधायी प्रक्रिया है, लेकिन एफसीआरए संशोधन विधेयक पर उठा हंगामा सामान्य क्यों नहीं है? सच्चाई यह है कि यह हंगामा पिछले एक दशक से चल रहे फेक नैरेटिव वॉर यानी झूठे राजनीतिक आख्यान का हिस्सा है। रह-रहकर भारत सरकार के निर्णयों पर संगठित स्वरूप में प्रतिकार के नाम पर झूठ का दुष्प्रचार एक राजनीतिक कार्य-संस्कृति बन गया है। एक सुव्यवस्थित तंत्र इसे अंजाम देता है।

भूमि अधिग्रहण कानून, कृषि सुधार कानून, सीएए, नागरिकता संशोधन, लिंचिंग, ट्रिपल तलाक, वक्फ, इथेनॉल से लेकर हाल ही में नीट परीक्षा के विरुद्ध हुए आंदोलन, विमर्श और इनकी प्रकृति को ध्यान से देखने की आवश्यकता है। यह निर्विवाद रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए कि 12 साल बाद भी सरकार अपने ही विरुद्ध खड़े होने वाले झूठे आख्यान के सामने पस्त होती नजर आई है।

एफसीआरए संशोधन कानून को लेकर फिर एक बार छद्म आंदोलनजीवी सक्रिय हो उठे हैं। अमेरिका से लेकर ईसाई धर्मगुरुओं की वैश्विक लॉबी और इनके इशारों पर भारत में धार्मिक डेमोग्राफी बदलने वाले एनजीओ वातावरण को विषाक्त करने के लिए आमादा हैं। सोशल मीडिया की एल्गोरिदम-नियंत्रित दुनिया में एकतरफा सूचनाओं की भरमार है, जो बताती है कि यह कानून ईसाई गिरजाघरों, स्कूलों और अस्पतालों को छीन लेगा।

विधिक रूप से तथ्य यह है कि यह संशोधन प्रस्ताव किसी भी प्रकार से किसी धर्म के विरुद्ध नहीं है। राजनीतिक शब्दावली में कहें तो यह एक सेक्युलर प्रस्ताव है, लेकिन झूठ यह स्थापित किया जा रहा है कि चर्चों पर सरकार कब्जा कर लेगी। ठीक वैसा ही झूठ जैसा सीएए का कानून किसी की नागरिकता छीनने का प्रावधान नहीं करता है, लेकिन देश-दुनिया में झूठ प्रचारित किया गया कि इस कानून से भारत में मुसलमानों की नागरिकता छीन ली जाएगी।

इस झूठ का शोर इतनी तीव्रता से खड़ा किया गया था ताकि वैश्विक मुस्लिम बिरादरी में भारत के राजनयिक रिश्ते खराब कर दिए जाएँ। देश में मुस्लिम ध्रुवीकरण को चुनावी राजनीति के साथ एकीकृत कर दिया जाए। ठीक इसी मानसिकता के साथ एफसीआरए कानून में संशोधन प्रस्ताव को लेकर शोर खड़ा किया जा रहा है। ट्रिगर प्वाइंट अमेरिका से दबाया जा रहा है और भारत में पूरा इकोसिस्टम एक्टिव है। इसी संशोधन प्रस्ताव की कुछ महत्वपूर्ण परतों को समझने का प्रयास इस विश्लेषण में:

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क्या हैं संशोधन प्रस्ताव

इस कानून के अनुसार अब एनजीओ और ट्रस्ट को बताना होगा कि वे कहाँ और क्या काम कर रहे हैं। विदेशी पैसा किस खास काम के लिए और किस राज्य में इस्तेमाल होगा, अब नए पंजीयन के समय प्रमाणपत्र पर इसे साफ-साफ लिखा जाएगा। वर्तमान में सामाजिक, धार्मिक संस्थान लिखकर पंजीयन किया जाता है।

इसे ऐसे समझना होगा कि भोपाल में एक एनजीओ ने पंजीयन कराया और विदेश से धन प्राप्त किया। वह उसे झाबुआ, धार के जनजातीय क्षेत्र में खर्च कर रहा है। लेकिन अब ऐसा करना कठिन होगा।नया संशोधन कन्वर्जन को पूरे रडार पर लेकर चल रहा है। यह किसी धर्म के खिलाफ नहीं है, लेकिन यह कन्वर्जन यानी धर्म बदलने की गतिविधियों की कड़ी निगरानी करता है।

विदेशी धन से पूजा स्थल बनवाना, धार्मिक शिक्षा, सत्संग वगैरह करवाने की अनुमति तो है, लेकिन अब विदेशी पैसे से दूसरों का धर्म परिवर्तन नहीं किया जा सकता। यह बिंदु ही सबसे प्रतिक्रियावादी साबित हो रहा है। इसे समझने की आवश्यकता है।

एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 की मूल बात यह है कि जब किसी एनजीओ का एफसीआरए पंजीकरण समाप्त, रद्द या सरेंडर हो जाता है (या रिन्यूअल न होने से “सीज” हो जाता है), तो विदेशी चंदे से प्राप्त धन और उससे बनी संपत्तियों का प्रबंधन एक सरकारी “नामित प्राधिकरण” के अधीन चला जाएगा।

पंजीकरण खत्म होने पर विदेशी फंड और उससे बनी संपत्तियाँ (पूरी या आंशिक रूप से विदेशी पैसों से बनी) अस्थायी रूप से इस प्राधिकरण के पास चली जाएँगी। अगर संस्था बाद में पंजीकरण बहाल करवा लेती है तो संपत्तियाँ वापस मिल जाएँगी। निर्धारित समय में बहाल न होने पर वे स्थायी रूप से प्राधिकरण के अधीन हो सकती हैं, जिन्हें सार्वजनिक उपयोग के लिए प्रयोग किया जा सकेगा।

हत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि नामित प्राधिकरण के आदेश के खिलाफ जिला न्यायाधीश के समक्ष अपील या पुनरीक्षण का अधिकार होगा।झूठ यहाँ यह फैलाया जा रहा है कि सरकार सीधे चर्चों पर कब्जा कर लेगी। जबकि प्रावधान यह है कि सरकार के निर्णय की समीक्षा या पुनर्विचार के लिए विधिवत जिला न्यायालय की व्यवस्था रखी गई है।

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इंदिरा गांधी ने बनाया था कानून

यह सर्वविदित है कि 1970 के दशक में बाहरी शक्तियों द्वारा देश में राजनीतिक कार्यकर्ताओं, छात्र, मजदूर संगठनों आदि में हस्तक्षेप की आशंकाओं के कारण इस कानून को लाया गया था। 1969 में गृह मंत्री ने संसद में यह पहली बार उठाया था। 1973 में राज्यसभा में इस विधेयक को पेश किया गया। संयुक्त संसदीय समिति की सिफारिशों के बाद 1976 में यह पारित हुआ।

1976 का यह मूल कानून 2010 में मनमोहन सरकार के समय पूरी तरह से नए एफसीआरए एक्ट, 2010 से बदल दिया गया। वर्तमान में 2010 का कानून ही लागू है। यानी जिस कानून को सरकार संशोधन के साथ मजबूत करना चाहती है, उसे इंदिरा गांधी ने बनाया था और डॉ. मनमोहन सिंह ने भी समयानुसार सशक्त बनाया था।

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हजारों करोड़ का चंदा…

वर्ष 2019 से 2021 की अवधि में भारत के एनजीओ और ट्रस्टों को 55,741 करोड़ रुपये विदेशी संस्थानों से प्राप्त हुए थे।

एफसीआरए पोर्टल पर उपलब्ध अलग-अलग संगठनों के रिटर्न से पता चलता है कि मोदी सरकार की सख्ती के बाद अभी सालाना 25 हजार करोड़ रुपये विदेशों से आ रहे हैं।

सर्वाधिक पैसा अमेरिका और यूरोपियन यूनियन के देशों से आ रहा है।तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना ऐसे टॉप राज्य हैं, जहाँ सर्वाधिक विदेशी धन एनजीओ को मिल रहा है।इन राज्यों में पंजीकृत एनजीओ और ट्रस्ट अपनी गतिविधियों को मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, असम, झारखंड, ओडिशा, नगालैंड, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश में संचालित कर रहे हैं। अब ऐसा कर पाना मुश्किल हो जाएगा।

मोदी सरकार ने अभी तक 22,496 एनजीओ और ट्रस्ट के विदेशी चंदा लाइसेंस निरस्त किए हैं।

० वर्तमान में 14,434 एनजीओ के लाइसेंस एक्टिव हैं।
० मध्य प्रदेश में 1,136 संगठनों में से 294 वर्तमान में सक्रिय हैं।
० छत्तीसगढ़ में 364 में से 137 सक्रिय हैं।
० उत्तर प्रदेश में 3,511 में से 574 अभी सक्रिय हैं।

० सर्वाधिक 10 हजार लाइसेंस वर्ष 2015 में निरस्त हुए हैं।

० 2012 में यह आँकड़ा 4,138 था, जब केंद्र में कांग्रेस-नीत सरकार थी।

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खुद के यहाँ कड़े कानून और हमें स्वतंत्रता का पाठ

आज अमेरिका और यूरोप में भारत के इस संशोधन प्रस्ताव पर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, लेकिन सच्चाई यह है कि ईसाई-प्रभुत्व वाले सभी देशों में विदेशी चंदे को लेकर कड़े कानून हैं।जिस अमेरिका में सीनेटर और पूर्व राजनयिक हमारे कानून पर सवाल उठाकर दुनिया में भारत को बदनाम कर रहे हैं, उसी अमेरिका में एफएआरए (FARA) यानी विदेशी एजेंट्स पंजीकरण कानून लागू है। यह अमेरिका में विदेशी धन या प्रतिनिधि के काम को लेकर एफसीआरए से कठिन व्यवस्था बनाता है।

इंग्लैंड में एफआईआरएस (FIRS) विदेशी प्रभाव पंजीकरण स्कीम कानून लागू है। ऑस्ट्रेलिया में इसी प्रकृति का एफआईटीएए (FITAA) विदेशी प्रभाव पारदर्शिता एवं जवाबदेही एक्ट लागू है।

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अमेरिका में खलबली क्यों है..?

अमेरिका में हमारे कानून को लेकर सबसे ज्यादा हलचल क्यों है, इसे समझना जानकारों के लिए तो बिल्कुल भी कठिन नहीं है, लेकिन आम आदमी, जो आजकल की आभासी दुनिया में एल्गोरिदम का बंधक है, उसे यह जानना जरूरी है कि दुनिया में भारत अकेला ऐसा देश है, जहाँ इवेंजेलिकल और मिशनरीज का सबसे बड़ा नेटवर्क दशकों से काम कर रहा है। यह नेटवर्क दुनिया में ईसाई धर्म के प्रचार और प्रसार के लिए काम करता है। इसकी गर्भनाल अमेरिका में स्थित है। यूरोप के तमाम धनी देश वेटिकन के इशारों पर इस नेटवर्क के लिए धन उपलब्ध कराते हैं।

इवेंजेलिकल फेलोशिप ऑफ इंडिया भारत में मुख्य इवेंजेलिकल नेटवर्क है। यह 1951 में स्थापित हुआ और वर्ल्ड इवेंजेलिकल अलायंस का चार्टर सदस्य है। यह नेटवर्क प्रोटेस्टेंट, बैपटिस्ट, प्रेस्बिटेरियन, पेंटेकोस्टल, करिश्मैटिक और स्वतंत्र चर्च को आपस में एकीकृत करता है।भारत में 55 से अधिक प्रोटेस्टेंट संप्रदाय और चर्च एसोसिएशन इसके प्रभावी सदस्य हैं। 125 से अधिक चर्च-संबंधित मिशन इससे जुड़े हैं। करीब 65,000 से अधिक चर्चों का प्रतिनिधित्व इस नेटवर्क में शामिल है।

इस संशोधन के विरोध का कोई तार्किक और विधिक आधार नहीं है, क्योंकि यह किसी एक धर्म की बात ही नहीं करता है। एफसीआरए में पंजीयन धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आधार पर होते हैं।2014 से 2023 के डेटा को देखें तो इस दौरान ईसाई धर्म के नाम पर 194 संगठन पंजीकृत हुए हैं। इसी तरह हिंदू 139, मुस्लिम 25, बौद्ध 29, सिख 10 और अन्य कैटेगरी में 29 संगठन रजिस्टर हुए हैं।

अब किसी अन्य धर्म से जुड़े संगठनों ने अभी तक कोई भी आपत्ति नहीं उठाई है। जाहिर है, समस्या केवल ईसाई मिशनरियों को है, जिनका एकमात्र एजेंडा भारत में सेवा और धर्म की आड़ में कन्वर्जन कर भारत की डेमोग्राफी को धार्मिक आधार पर बदलना है। यह एफसीआरए संशोधन कितना महत्वपूर्ण है, इसे केवल मिशनरीज के आधार पर ही नहीं, बल्कि गैर-धार्मिक और सांस्कृतिक प्रकृति वाले एनजीओ के जरिये भी समझना होगा।

मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में गांधी जी के नाम पर कार्यरत एक संगठन को क्रिश्चियन एड के नाम पर बड़ी रकम मिलती है। यह रकम क्यों दी जाती है?भोपाल की एक एनजीओ यूरोप के देशों से बाल अधिकार और स्वच्छता के नाम पर करोड़ों रुपये का अनुदान लेती है। पूर्व आईएएस हर्ष मंदर के विरुद्ध ईडी ने कार्रवाई की, क्योंकि उन्होंने बच्चों के नाम पर ली गई राशि का प्रयोग सीएए विरोधी प्रदर्शन में किया। पिछले कुछ सालों में केंद्र सरकार ने सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च, वर्ल्ड विजन, राजीव गांधी फाउंडेशन, राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट, ऑक्सफेम इंडिया, ग्रीनपीस, सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस, सबरंग ट्रस्ट जैसे एनजीओ के विरुद्ध लाइसेंस रद्द करने की कार्रवाई की है।

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तीन प्रोजेक्ट और विरोध के निहितार्थ

एफसीआरए संशोधन के विरोध की आधारभूत वजह को समझने के लिए तीन प्रोजेक्ट को समझना होगा, जो वैश्विक ईसाई प्रभुत्व के हिस्से भर हैं:

जोशुआ प्रोजेक्ट

यह एक रहस्यमय अमेरिकी प्रोजेक्ट है। अमेरिका के कोलोराडो स्प्रिंग्स से इस वेबसाइट का संचालन होता है। लाख जतन के बाद भी यह मालूम नहीं चलता कि इसका मालिक कौन है। भारत में हर जाति का आँकड़ा इसके पास है।

2024 में इसकी वेबसाइट पर दावा है कि हर साल 24 लाख भारतीयों को ईसाई बनाना है। 2,272 जातियों का क्षेत्रवार ब्यौरा इसकी वेबसाइट पर उपलब्ध है। दावा है कि देश में 6 करोड़ लोग ईसाई धर्म में आ चुके हैं। सालाना 3.9 प्रतिशत की दर से कन्वर्जन का लक्ष्य इस प्रोजेक्ट के डिजिटल दावों में दिखाई देता है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड में यह प्रोजेक्ट अपनी गहरी जड़ें जमा चुका है। इन राज्यों में फादर और पास्टर की नेटवर्किंग है। फादर को एक लाख रुपये महीने और पास्टर को 20 हजार रुपये वेतन का दावा किया जाता है। नेटवर्क का निशाना कमजोर, बीमार और जरूरतमंद हिंदुओं को खोजकर फादर के संपर्क में लाना होता है।

कम्पैशन इंटरनेशनल

भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के इनपुट के आधार पर मोदी सरकार ने इस एनजीओ का लाइसेंस 2017 में पहले रद्द किया, फिर निरस्त कर दिया था। सालाना 292 करोड़ रुपये की विदेशी फंडिंग से यह एनजीओ भारत में 589 स्थानीय चर्च और 344 एनजीओ के साथ मिलकर 48 साल तक काम करता रहा। बच्चों के विकास के नाम पर इस एनजीओ ने विदेशी धन का दुरुपयोग धर्म परिवर्तन कराने में किया। अमेरिका में बड़े ईसाई समुदाय और दानदाताओं से इसका संचालन होता है।

वर्ल्ड विजन इंडिया

यह एनजीओ दुनिया के 100 देशों में फैला है और भारत में इसकी गतिविधियों को धर्म परिवर्तन के मामले में संदिग्ध पाया गया। स्थानीय एनजीओ और घरेलू चर्चों के नेटवर्क के साथ यह काम करता था। मोदी सरकार ने इसका भी लाइसेंस निरस्त किया। इसका उद्देश्य बच्चों के विकास के नाम पर ईसाई धर्म को बढ़ाना रहा है। वर्ल्ड विजन का बजट 31 हजार करोड़ रुपये सालाना है।

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निष्कर्ष

अब्राहमिक धर्मों का उद्देश्य पूरी दुनिया को अपने धर्म में ढालना है। इस्लाम तलवार और आतंक के बल पर तो ईसाइयत करुणा और सेवा के नाम पर इस मिशन में सदियों से लगी है। हिंदू धर्म अभी भी इस वैश्विक अभियान के बाद भी बचा है। यह अब्राहमिक धर्मों के लिए चुनौती ही है।इस संशोधन कानून के विरोध में संलग्न चेहरों, मोहरों और मेथडोलॉजी को सावधानी से देखने और समझने की आवश्यकता है।

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हमें जानना चाहिए…!

तथ्य एक:
हंगामा यह है कि मोदी सरकार विदेशी चंदे को बंद कर रही है। इससे हजारों करोड़ की सहायता उन वंचित वर्गों तक नहीं पहुँच पा रही है, जो गरीब, लाचार और जरूरतमंद हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और सामुदायिक विकास प्रभावित हो रहा है। इस सहायता का आँकड़ा 2025 में लगभग 25 हजार करोड़ रुपये है।

तथ्य दो:
भारत में छह साल में 1 करोड़ 60 लाख करोड़ रुपये की राशि सीएसआर यानी सामाजिक उत्तरदायित्व पर खर्च हुई है। 2025 में यह 40,793 करोड़ रुपये थी। यानी परोपकार और जरूरतमंदों के लिए अब भारत में भी धन की कमी नहीं है।

तीसरा तथ्य:
चैरिटी का अर्थ भी समझना होगा। इसका मतलब ही होता है ईसाई भाईचारा। यानी चैरिटी कोई परोपकार नहीं है।

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।