राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का 6 अगस्त को मुंबई में जेन जी और जेन अल्फा के युवाओं के साथ संवाद एक महत्वपूर्ण घटना तो है ही इसके संदेश , इसकी पृष्ठभूमि के पीछे की सोच और उनसे निकले हुए स्वर वर्तमान और भविष्य की दृष्टि से दिशासूचक है । कॉकरोच जनता पार्टी के जेन जी धरना प्रदर्शन से लेकर कुछ अन्य घटनाओं ने युवाओं को लेकर आम लोगों के अंदर संशयात्मक व नकारात्मक छवि भी पेश की है। देश की चिंता करने वाले एक शीर्ष व्यक्तित्व के रूप में डॉ मोहन भागवत के पूरे संवाद में भारत के जेन जी जेन अल्फा की एक सकारात्मक रचनात्मक छवि सामने आई तथा यह भी पता चला कि उनके प्रति संगठनों के नेतृत्व वर्ग में भी विरोध की जगह उम्मीद का भाव है। 

डॉ भागवत अगर कहते हैं कि जेन जी हमारी पीढ़ी से ज्यादा ईमानदार है और हमें अगर चयन करना हो तो सबसे पहले जेन जी के साथ ही संवाद करूंगा तो इसका संदेश भारत में 16 17 वर्ष से लेकर 29 30 वर्ष के हमारे युवाओं के बीच सीधा जाता है। भागवत ने नीता मुकेश अंबानी सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित ‘इंडियाज इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस’ (आईआईएमयूएन) के 15वें वार्षिक चैंपियनशिप सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित किया। वहीं उन्होंने विशेष संवाद किया ।इस कार्यक्रम में भारत के सभी क्षेत्र के साथ कुछ विदेशी युवाओं और राजनयिकों की भी सहभागिता हुई। जानकारी के अनुसार, सम्मेलन में देश के 100 से अधिक शहरों से 15 से 19 वर्ष आयु वर्ग के दो हजार से अधिक स्कूली और कॉलेज छात्र शामिल थे। उद्घाटन सत्र की थीम था “द रोल आफ यूथ इन यूनाइटिंग द वर्ल्ड , द इंडियन वे” यानी भारतीय दृष्टिकोण से विश्व को एकजुट करने में युवाओं की भूमिका रखी गई जिसमें वैश्विक एकता, नेतृत्व और भारत की भूमिका पर चर्चा हुई। उसमें वर्तमान भू अतीत और भविष्य से संबंधित लगभग सारे महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रश्न किए गए। नेतृत्व या नेता , सोशल मीडिया, आंदोलन, भारत का भविष्य, भारत की विदेश नीति, पाकिस्तान -,चीन संबंध, शिक्षा , रोजगार अर्थव्यवस्था , आरक्षण, एलजीबीटी , विवाह , परंपरा जैसे सारे विषय पर प्रश्न आए और उन्होंने सबका सुस्पष्ट सकारात्मक ढंग से उत्तर दिया । 

साफ है कि यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्यक्रम था और इसका प्रभाव व्यापक रूप से गया है। इसके साथ सम्मेलन के विभिन्न सत्रों में अलग से नीति-निर्माण, अंतरराष्ट्रीय संबंध, नेतृत्व विकास और वैश्विक चुनौतियों जैसे विषयों पर चर्चा हुई, जिनमें युवाओं को विशेषज्ञों और विभिन्न क्षेत्रों के प्रख्यात वक्ताओं से संवाद का अवसर मिला। किसी को यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि जंतर- मंतर की घटना के बाद के वातावरण में त्वरित गति से एक कार्यक्रम आयोजित कर दिया गया। यह सच है कि जंतर-मंतर आंदोलन में वास्तविक छात्र और युवा भी थे पर चेहरा ढंक कर पत्थर चलाने वाले , तोड़फोड़,हिंसा करने वाले, सरेआम गाली देने वाले गन्दी डालियों के प्ले कार्ड दिखाने वाले, आजादी साड़ी लगाने वाले सांप्रदायिक बात करने वाले भी थे और उनके कारण जेन जी और जेन अल्फा की नकारात्मक डरावनी छवि भी बनी है। दुर्भाग्य से हमारे राजनीति में नेताओं ने नई पीढ़ी के सकारात्मक रचनात्मक मार्गदर्शन की जगह संकुचित राजनीतिक स्वार्थ के लिए वातावरण को और दूषित किया है। इस पृष्ठभूमि में डॉ भागवत के संवाद से पूरे देश में के समानांतर राहतकारी सकारात्मक आश्वस्तकारी संदेश गया है। वर्ग भागवत की कुछ पंक्तियों को पहले देखिये– ‘जेन-ज़ी (Gen-Z) आंदोलन कर रही है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह राष्ट्रविरोधी है। नई पीढ़ी अपने ही समाज और राष्ट्र का हिस्सा है; उन्हें अपना मानकर समझने की आवश्यकता है। सार्थक संवाद के लिए अपनत्व का संबंध होना चाहिए। जब संवाद अपनत्व के साथ होता है, तभी एक-दूसरे की बात को सही ढंग से समझा जा सकता है। यदि मुझे दोनों पीढ़ियों में किसी एक पर विश्वास करने के लिए कहा जाए, तो मैं जेन-ज़ी (Gen-Z) पर विश्वास करूँगा।’

कई बार गुस्से में हमको लगता है कि आजादी के नारे लगाने वाले, गंदी गालियां देने वाले, यहां तक कि देश के विरुद्ध बोलने वाले ऐसे युवाओं का विरोध होना चाहिए और इसकी जगह भागवत उनसे कह रहे हैं कि संवाद होना चाहिए। इसे दूसरे रूप में देखिए कि जिन लोगों ने उन्हें सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों से भड़काया उनको इसलिए सफलता मिली क्योंकि दूसरे पक्ष से उससे ज्यादा प्रभावी रूप से संवाद करने की संवाद नहीं हुआ। भारतीय संस्कृति की दृष्टि तो अपने घर दुश्मनों के इसे भी संवाद कर उनके हृदय परिवर्तन की रही है। हमारे यहां रत्नाकर डाकू महर्षि वाल्मीकि और अंगुलिमाल महान बौद्ध संत बन सकते हैं। अनेक समस्याओं को लेकर युवाओं के एक वर्ग में अगर असंतोष है तो उनको विश्वास में लेकर अपनेपन की भावना से संवाद अपरिहार्य है। राजनीतिक दल, एनजीओ , एक्टिविस्ट इसकी जगह उनको भड़काते हैं, उत्तेजित करते हैं। देश के चिंता करने वाला कोई भी वही करेगा जो डॉक्टर भागवत ने किया।

आप संवाद देखिये । जिस युवा ने प्रश्न किया उसने कितनी तैयारी की थी। साफ-साफ, खरी-खरी और जितने भी प्रश्न आज के युवाओं या हमारे आपके मन में हो सकता था सभी उसने अत्यंत शालीनता, बुद्धिमत्ता और तेजस्विता के साथ पूछे, और बीच में जहां आवश्यकता हुई टोका और संतुलित पूरक प्रश्न भी किया। भागवत जी अपने चरित्र के अनुभव सुबह स्पष्ट तरीके से युवाओं के के अंदर सही समझा विकसित करने की दृष्टि से ही सारे उत्तर दे रहे थे । 

कुछ उदाहरण देखिए। नेता या नेतृत्व वह नहीं जो केवल खड़ा होकर भाषण देता है। सच्चा नेतृत्व भीतर से प्रारंभ होता है — नेतृत्व का उद्देश्य केवल अनुयायी बनाना नहीं, बल्कि नए नेताओं का निर्माण करना है भले उसे लोग न जानें। इसी तरह शिक्षा का उद्देश्य भविष्य की नई पीढ़ी का को तैयार करना है ,यह व्यवसाय नहीं। हिंसक व्यक्ति कभी युवाओं का रोल मॉडल नहीं होना चाहिए। रोजगार का अर्थ केवल नौकरी नहीं। उद्यमिता (Entrepreneurship) और कौशल (Skills) रोजगार के महत्वपूर्ण आयाम हैं। बेरोज़गारी कम करने के लिए सभी प्रकार के कार्यों को समान सम्मान देना आवश्यक है। समाज में श्रम-प्रतिष्ठा (Dignity of Labour) का भाव विकसित होना चाहिए। श्रम की प्रतिष्ठा भारत की परंपरा रही है जो हम भूल चुके हैं। इसीलिए कुछ काम को छोटा कुछ को बड़ा करने का आत्मघाती मानस है।

अगर ध्यान से पूरे संवाद कार्यक्रम को देखेंगे तो निष्कर्ष आएगा कि उपस्थित युवक-युवतियां भी पूरी तरह इनवाल्व थे। इसका अर्थ यह हुआ कि बहुसंख्य जेन जी सकारात्मक तरीके से सोचते हुए अपनी उन्नति की कोशिश कर रहा है। इस सच को उपयुक्त समय पर सामने लाने के लिए डॉ भागवत का अभिनंदन होना चाहिए। तनाव और भ्रमों के दौर में इस सोशल मीडिया से संबंधित एक प्रश्न के उत्तर में भागवत कहते हैं कि वरिष्ठ पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करे तथा उन्हें सही और गलत के बीच अंतर समझाए। यानी वरिष्ठ लोगों का दायित्व है कि सोशल मीडिया पर कुछ दुष्प्रचार है जिसके बारे में उन्हें जानकारी है तो जहां तक उनकी पहुंच है उसका खंडन करते हुए सामने आना चाहिए। जैसा भागवत ने कहा कि आजकल किसी के भी मुंह से टेक्नोलॉजी का उपयोग कर कुछ भी कहलवाया जा सकता है जिससे उसका लेना- देना नहीं होगा। यह सोशल मीडिया का व्यापक दुरुपयोग है। इसलिए जेन जी में यह विवेक विकसित होना चाहिए कि क्या सही और क्या सही नहीं है। 

सोशल मीडिया पर सकारात्मक , उपयोगी और सामग्री साझा करने से लेकर केवल प्रमाणिक स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर ही विश्वास करने की अपील कर भागवत ने युवाओं को सचेत किया। साथ ही क्या करें ,कहां से उन्हें सही जानकारी मिले यह भी स्पष्ट किया जो प्रामाणिक नहीं है। यानी बिना पुष्टि के विश्वास मत करिए। अभी मेटा ने बताया है कि भारी संख्या में झूठी, एकपक्षीय सामग्रियां उसके माध्यम से लोगों तक पहुंचाये गये। यानी जिन्हें उसके उपयोग - दुरुपयोग की जानकारी है, संसाधन है , वह बिल्कुल झूठ फैलाकर उथल-पुथल पैदा कर सकते हैं। इसलिए रास्ता यही है कि जो मान्य समाचार पत्र, टीवी चैनल आदि के वेबसाइट है हम मुख्यतः उन्हीं पर समाचार या सूचना की पुष्टि करें। ऐसे लोग भी हैं जिनकी विश्वसनीयता असंदिग्ध है उनको देखना और सुनना चाहिए। किंतु भागवत कहते हैं कि मेरे कारण 10 लाख लोग कोई गलत निर्णय लेते हैं, तो उसकी जिम्मेदारी मेरी भी है। जितनी भर्ती है कोई जिम्मेवारी लेने को तैयार नहीं होता। 

जरा सोचिए, सोशल मीडिया पर झूठ फैलाने वालों ने किस तरह धारणा बनाई है कि संघ जेन जी और आंदोलन करने वालों की विरोधी है। अभी तक किसी दूसरे संगठन के नेता ने भारत के इतने बड़े युवा समूह के साथ क्या इस तरह के संवाद की कल्पना भी की है?इस तरह के संवाद से माहौल बदलने की शुरुआत होती है। जो लोग मान रहे थे कि नई पीढ़ी को सोशल मीडिया के माध्यम से भ्रमित कर ,भड़का कर असंतोष पैदा कर हिंसक अराजकता में झोंक सकते हैं उन्हें इससे धक्का लगा होगा।

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।