कांग्रेस ने एक बार फिर यह साबित किया है कि वह राष्ट्रीय भावों और भारत के मन को नहीं समझ पा रही है, या जानबूझकर नासमझी का परिचय दे रही है। ऐसा कांग्रेस द्वारा मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के तहत किया जा रहा है। लेकिन, कांग्रेस यह भूल रही है कि वह ऐसा करके राष्ट्र की मुख्यधारा से बाहर होती चली जा रही है। अनेक राज्यों में राजनीति के हासिये पर पहुंच चुकी कांग्रेस अपनी इसी मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति का परिणाम भुगत रही है।

कांग्रेस ने राष्ट्रभाव की उपेक्षा का एक और परिचय दिया है। गत दिवस नई दिल्ली में आयोजित कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यसमिति में वंदेमातरम् को लेकर जो प्रस्ताव पारित हुआ, वह उसकी राजनीतिक अपरिपक्वता और आत्मघाती कदम का परिचायक है। कांग्रेस ने इस प्रस्ताव में कहा है कि पार्टी द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में तथा अन्य सार्वजनिक स्थलों पर वंदेमातरम् का केवल वही अंश गाया जाएगा, जोकि कांग्रेस कार्यसमिति ने कोलकाता (कलकत्ता) अधिवेशन में 28 अक्टूबर 1937 को स्वीकृत किया था। यानि कि, वंदेमातरम् के छह अंतरों में से केवल दो ही गाये जाएंगे। इस बैठक की अध्यक्षता कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने की। इसमें सोनिया गांधी, राहुल गांधी समेत कांग्रेस के 88 नेता उपस्थित थे।

इसके पहले कांग्रेस अध्यक्ष खडगे और सोनियां गांधी ने 15 अगस्त को पार्टी कार्यालय में ध्वजारोहण और वंदेमातरम् के गायन के दौरान उस समय असहजता प्रकट की थी, जब पूरा वंदेमातरम् बजाया गया। यहां तक कि सोनिया गांधी ने इसे रोकने के लिए भी कहा। राष्ट्रीय भावों के विरोध का कांग्रेस का पुराना इतिहास रहा है। यह पहला अवसर नहीं है जब कांग्रेस ने वंदेमातरम् के साथ अन्याय किया है। कांग्रेस का इतिहास ही वंदेमातरम् के विरोध का रहा है।

कांग्रेस यूं तो एक पार्टी के नाते अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन राष्ट्रीय महत्व के विषयों और कानूनी प्रावधानों के अन्तर्गत उसे वे नियम मानने की भी बाध्यता है जोकि संसद द्वारा बनाये गए हैं और जिन्हें राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृत करके अधिसूचित किया गया है। वंदेमातरम् के अनिवार्य गायन, पूरे छह अंतरों को गाने या बजाये जाने के लिए सरकार ने “राष्ट्रीय सम्मान, अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम 2026” पारित कराकर कानूनन वंदेमातरम् के विरोध को अपराध घोषित किया है। इसके अंतर्गत वंदेमातरम् का जानबूझ करअपमान करना दंडनीय अपराध होगा। इसमें पूर्ण वंदेमातरम् का गायन भी शामिल है। यह अध्यादेश 29 जुलाई 2026 को राज्य सभा में और 30 जुलाई 2026 को लोक सभा में पारित हुआ है। इसे राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने 12 अगस्त 2026 को स्वीकृति प्रदान कर दी है। इसके बाद यह कानून बन गया है। इसके पहले केन्द्रीय गृह मंत्रालय 28 जनवरी 2026 को एक विस्तृत आदेश जारी कर वंदेमातरम् का प्रोटोकाल जारी कर चुका है। इसके अनुसार सभी सार्वजनिक स्थानों पर जहां तिरंगा फहराया जाएगा अथवा राष्ट्रपति या राज्यपाल, उपराज्यपाल का कार्यक्रम होगा,उसमें राष्ट्रगीत से पहले पूर्ण वंदेमातरम् गाया जाएगा।

संसद द्वारा यह कानून बन जाने के बाद और गृह मंत्रालय के प्रोटोकाल जारी होने पर भी अगर कांग्रेस ने इसे नहीं मानने का दुस्साहस किया है तो यह आपराधिक और गंभीर मामला है। राष्ट्रीय प्रतीक के अपमान और राष्ट्रभाव की उपेक्षा, कानून की अवमानना की श्रेणी में आता है। ऐसा करके कांग्रेस ने गंभीर संवैधानिक संकट खड़ा किया है। क्योंकि कोई भी पार्टी संसद से ऊपर नहीं हो सकती। उसे संसद द्वारा बनाये गए नियमों और कानूनों को मानने की बाध्यता है। लेकिन, कांग्रेस ने ऐसा किया है।

वंदेमातरम् पर कांग्रेस ने जो फैसला किया है वह कोई आश्चर्य पैदा नहीं करता, क्योंकि कांग्रेस ने वंदेमातरम् के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार पहली बार नहीं किया है। यह कांग्रेस ही थी जिसने 1937 में वंदेमातरम् को खंडित करके राष्ट्रभाव को गहरी चोट पहुंचायी थी। कांग्रेस के एक अलगाववादी मुस्लिम नेता जो इस पार्टी के अध्यक्ष भी रहे उनके विरोध और मांग के चलते वंदेमातरम् के छह में से चार अंतरे हटा दिये गए थे। एक तरह से वंदेमातरम् की आत्मा पर ही कुठाराघात कर दिया गया था।

वंदेमातरम् और कांग्रेस के विरोध का लम्बा इतिहास है। इसके विरोध की शुरुआत 28 दिसम्बर 1923 से एक जनवरी 1924 तक काकीनाडा (आन्ध्र प्रदेश) में हुए राष्ट्रीय अधिवेशन में हुई। यहां पहली बार पार्टी के अध्यक्ष और अधिवेशन के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने वंदेमातरम् का विरोध किया था। इस अधिवेशन में पूर्व के अधिवेशनों की भांति ही वंदेमातरम् का गायन होना था। गायन के लिए प्रसिद्ध गायक, संगीतज्ञ पंडित विष्णु दिंगम्बर पुलस्कर को बुलाया गया था। पंडित जी ने जब गायन शुरु किया तो अध्यक्षता कर रहे मौलाना जौहर ने इसे रोकने का आदेश दिया। लेकिन, पुलस्कर जी वंदेमातरम् का गायन करते रहे। इस पर मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने सत्र की अध्यक्षता छोड़ दी और मंच से नीचे उतर कर बाहर चले गए। वे मंच पर तभी लौटे जब वंदेमातरम् पूर्ण हो गया। इस विरोध का कांग्रेस पर गहरा असर हुआ। कांग्रेस ने एक समिति बना दी। इसी समिति की रिपोर्ट को आधार बनाकर 28 अक्टूबर 1937 को कलकत्ता अधिवेशन में वंदेमातरम् को खंडित करने का फैसला कर दिया गया। कल 19 अगस्त 2026 को कांग्रेस ने उसी प्रस्ताव को फिर से स्वीकार करने का फैसला किया है जोकि कलकत्ता अधिवेशन में पारित हुआ था।

वर्तमान में वंदेमातरम को लेकर देश में एक उत्साहपूर्ण वातावरण है। गत 7 नवम्बर 2025 को वंदेमातरम् की रचना को 150 वर्ष पूर्ण हुए तो देश भर में देशभक्ति का ज्वार उठ गया। वंदेमातरम् एक बार फिर अभियान बन गया। इसे अभियान के रूप में जनमानस में फिर से स्थापित करने का श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को है। उन्होंने ही 31 अक्टूबर 2025 को केवडिया (गुजरात) में सरदार बल्लभ भाई पटेल की जयंती में वंदेमातरम् को याद किया और बताया कि इसके 150 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। इसे उत्साह पूर्वक मानाया जाएगा। इसे उन्होंने एक अभियान बना दिया और मिशन मोड में कार्य किया। पहले देश भर में शिक्षण संस्थाओं,पार्टी स्तर पर, संसद, विधानसभाओं में वंदेमाततरम् के 150 वर्ष पर कार्यक्रम आयोजित किये। फिर इसे अखण्ड स्वरूप में स्वीकार करने के लिए सरकार के स्तर पर प्रयास शुरु किये गए। ये प्रयास वर्ष 2026 में सफलता पूर्वक फलीभूत हो गए।

इसी क्रम को आगे बढाते हुए 15 अगस्त 2026 को इस बार के स्वतंत्रता दिवस समारोह में लाल किले से वंदेमातरम् का पहली बार गायन हुआ। पूर्ण और अखंड वंदेमातरम् का गायन पहली बार राष्ट्रीय स्वीकृति प्रदान करने का प्रतीक बन गया। हालांकि इस बार के स्वतंत्रता दिवस समारोह से कांग्रेस के अध्यक्ष और प्रमुख नेताओं सोनिया गांधी, राहुल गांधी ने दूरी बनाये रखी। शायद वे इसीलिए कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हुए क्योंकि यहां वंदेमातरम् के सभी छह अंतरों का गायन होना था और कांग्रेस को यह स्वीकार नहीं है।

वंदेमातरम् का विरोध कांग्रेस को बहुत भारी पड़ेगा। यह राष्ट्रीय मन की अस्मिता का प्रतीक है। इसे यह राष्ट्रीय पार्टी नहीं समझ पा रही है। ये पार्टी और विपक्ष आज तक यह नहीं समझ सका कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पराजय और भाजपा के सत्तारूढ़ होने में वंदेमातरम् एक अहम फैक्टर रहा है। लेकिन, कांग्रेस के नेताओं और रणनीतिकारों ने शायद यह तय किया है कि वे इस प्राचीन पार्टी को नेस्तनाबूद करके ही रहेंगे। शायद ईश्वर कांग्रेस के नेताओं को सद्बुद्धि दे, कि वे राष्ट्रीय आंदोलन से उपजी पार्टी को स्थापना काल के भाव से पुनः जोड़ सकें।

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।