स्वाधीनता के अमृत काल एवं भविष्य में भी भारत विभाजन की पृष्ठभूमि को हर भारतीय के लिए जानना और भली-भाँति समझना नितांत आवश्यक, मार्गदर्शी और प्रासंगिक है, क्योंकि यह विभाजन अखंड भारत के विभाजन और विस्थापन की एक ऐसी भयावह, लोमहर्षक, दर्दनाक, दुःखद और धार्मिक उन्माद की समकालीन विश्व की सबसे भीषण त्रासदी है, जिसने अखंड भारत के भौगोलिक विभाजन के साथ सभ्यता, संस्कृति और संसाधनों को भी विभाजित कर भारत की अपूरणीय क्षति के साथ दिलों में नासूर पैदा किए। विभाजन के समय हुए भयानक नरसंहार और यौन उत्पीड़न आज कठोर से कठोर व्यक्ति की भी रूह कंपा देते हैं और यही सीख देते हैं कि इसकी पुनरावृत्ति न हो सके। विभाजन की पृष्ठभूमि विशेषकर हिंदुओं के लिए तो समझना परम आवश्यक है, क्योंकि उनमें आपसी संघर्ष के कारण शत्रु-बोध की गंभीर समस्या है। इसलिए जब धोखा खा जाते हैं, तब अल्पकाल के लिए चैतन्य होते हैं, परिणामतः अतुलनीय क्षति हो चुकी होती है।

भारत विभाजन की पृष्ठभूमि जानना इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि यह हमें सन् 1947 की उस ऐतिहासिक त्रासदी, करोड़ों लोगों के विस्थापन और वर्तमान समय में भारत-पाकिस्तान के बीच कड़वाहट के वास्तविक कारणों को समझने में सहायता करता है। इसके अध्ययन से सांप्रदायिक राजनीति के खतरों की गहरी सीख मिलती है। अंग्रेजों की कुत्सित कूटनीति की समझ विकसित होती है कि किस प्रकार अंग्रेजों की 'फूट डालो और राज करो' नीति और सन् 1909 के पृथक निर्वाचक मंडल ने सामाजिक और धार्मिक रूप से हिंदू-मुसलमान के बीच दूरियाँ बढ़ाईं। किस प्रकार मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग द्वारा दिए गए द्विराष्ट्र सिद्धांत ने आपसी अविश्वास के साथ भारत विभाजन की नींव रखी। किस प्रकार सत्ता के बँटवारे पर आम सहमति नहीं बन पाई और 1946 की भयानक हिंसक घटनाएँ हुईं। भारत और पाकिस्तान के बीच आज भी जारी तनाव और कश्मीर विवाद की जड़ें इसी विभाजन में हैं। भारत-पाकिस्तान के मध्य विभिन्न कालखंडों में हुए चार युद्ध इसी का परिणाम हैं। यह इतिहास हमें बताता है कि धार्मिक कट्टरता और नफरत की राजनीति देश, धर्म और समाज के लिए कितनी विनाशकारी साबित हो सकती है।

भारत भूमि वीर-प्रसूता रही है, इसलिए विभिन्न कालखंडों में हुए विदेशी आक्रमणों को भारतीय योद्धाओं ने निष्फल कर दिया। प्रमुख विदेशी आक्रमणों के क्रम में फारसी (ईरानी) आक्रमण, सिकंदर का आक्रमण, पहलव, कुषाण और हूण जाति के आक्रमण हुए, परंतु प्रारंभिक सफलता के उपरांत वे परास्त ही हुए और अंततः उनका भारतीयकरण हो गया। वे भारतीय संस्कृति में रच-बस गए। परंतु तलवार के बल पर धार्मिक आधार पर साम्राज्य स्थापित करने के उद्देश्य से इस्लामिक आक्रांताओं से भारत की नहीं बन सकी, इसलिए दीर्घकालीन संघर्ष का इतिहास प्रारंभ हुआ, जिसका दुष्परिणाम भारत विभाजन के रूप में सामने आया।

भारत के विभाजन की पृष्ठभूमि तो अरब और तुर्की आक्रमणों से ही बन गई थी, क्योंकि इनकी सोच स्पष्ट थी कि दारुल कुफ्र को (काफिरों की भूमि), दारुल हर्ब (युद्ध की भूमि) से दारुल इस्लाम (इस्लाम का घर/भूमि) में परिवर्तित करना है। यद्यपि ये शब्द कुरान और हदीस में नहीं हैं, परंतु अब्बासिद काल में न्यायविदों ने इन्हें पहली बार गढ़ा था। इस विभाजन के अनुसार, दुनिया को दो बड़े क्षेत्रों में बाँटा गया था। मुसलमानों द्वारा शासित क्षेत्र को दारुल इस्लाम कहा जाता था। शेष क्षेत्र, जिस पर अन्य लोगों का शासन था, उसे दारुल कुफ्र (काफिरों की भूमि) या दारुल हर्ब (युद्ध की भूमि) कहा जाता था। मुसलमानों की यह सोच निरंतर इसी दिशा में प्रवहमान है। अभी हाल ही में गाम्बिया 57वाँ इस्लामिक देश बना है।

आज भी मुसलमानों का जिहाद इसी सोच की विरासत है। परंतु सच तो यह है कि केवल एक ही शब्द, दारुल अमन (शांति का निवास) या दारुल इंसान (मनुष्यों का निवास), उचित रूप से स्वीकार होना चाहिए। अब ऐसे शब्दों को त्यागने का समय आ गया है।

ऐसा नहीं है कि भारत पर अरब और तुर्की आक्रमणों का मुँहतोड़ जवाब नहीं दिया गया। उल्लेखनीय है कि लगभग 500 वर्षों तक बप्पा रावल, उनके वंशजों और मिहिर भोज के साथ अन्य राजपूत राजाओं ने भारत में अरबों के पैर जमने नहीं दिए, वहीं वर्तमान अफगानिस्तान में हिंदू शाही वंश के राजाओं ने 200 वर्षों तक तुर्कों के पाँव नहीं जमने दिए। प्रसिद्ध उर्दू शायर मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली ने ठीक ही कहा है कि इस्लाम का जो निडर और अजेय बेड़ा पूरी दुनिया में विजय-पताका फहराते हुए सात समुद्र पार कर गया, वह अंत में भारत में गंगा के दहाने (मुहाने) पर आकर डूब गया।

"वह दीने-हिजाजी का बेबाक बेड़ा, निशाँ जिसका अक्साए-आलम में पहुँचा।
मजाहिम हुआ कोई खतरा न जिसका, न अम्माँ में ठटका न कुल्जुम में झिझका।
किए पै सिपर जिसने सातों समंदर, वह डूबा दहाने में गंगा के आकर।।"

परंतु शत्रु-बोध न होने के कारण आपसी संघर्ष और विश्वासघात ने इस्लामी सफलता को बल दिया।

ऐतिहासिक दृष्टि से सन् 712 में मोहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में सिंध पर अरब विजय और महमूद गजनवी तथा मोहम्मद गोरी के आक्रमणों ने भारतीय उपमहाद्वीप में सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक बदलावों की एक लंबी प्रक्रिया की शुरुआत की थी। मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में अरबों द्वारा सिंध पर अधिकार किया गया, जिससे पहली बार भारतीय भूभाग पर इस्लामिक शासन की स्थानीय जड़ें पड़ीं। तुर्क आक्रमण के उपरांत गजनवी और गोरी के आक्रमणों के बाद उत्तर भारत में सल्तनत और बाद में मुगल साम्राज्य की स्थापना हुई, जिससे एक दीर्घकालीन संघर्ष चला। भारत को दारुल हर्ब से दारुल इस्लाम में परिवर्तित करने के लिए भीषण संग्राम हुए, परंतु इस्लामिक आक्रांता सफल न हो सके। यह भी गौरतलब है कि भारत में जब भी इस्लामी आक्रांता कमजोर पड़े, तो उन्होंने अपने धर्मावलंबी आक्रांताओं को भारत आमंत्रित किया, जैसे राणा सांगा के समय बाबर और पेशवाकालीन भारत में अहमदशाह अब्दाली को आमंत्रित किया गया था। तैमूर लंग और नादिरशाह दुर्रानी ने तो स्वतः ही आक्रमण किए। मंदिरों के विध्वंस और जजिया जैसे करों के कारण धर्मों और समुदायों के बीच जो वैचारिक और मनोवैज्ञानिक दूरियाँ बनीं, वही आगे चलकर विभाजन की पृष्ठभूमि बनीं। अंग्रेजों ने इसे अपने साँचे 'बाँटो और राज्य करो' में ढालकर विभाजन को अवश्यम्भावी बना दिया।

यूरोप में आधुनिक युग के आगमन और पुनर्जागरण के साथ ही उपनिवेशवाद, वाणिज्यवाद और साम्राज्यवाद की प्रवृत्ति विकसित हुई। धीरे-धीरे यूरोपीय शक्तियाँ संपूर्ण विश्व पर छा गईं और इस्लामिक शक्तियों का पराभव हुआ। ईस्ट इंडिया कंपनी ने प्लासी और बक्सर के युद्ध के बाद ब्रिटिश साम्राज्य की नींव रखी। सन् 1818 में मराठाओं के प्रबल प्रतिरोध के बावजूद भारत में ब्रिटिश सर्वोच्चता स्थापित हो गई। वहीं दूसरी ओर अंग्रेजों ने भारत से मुगल शासन का अंत कर दिया और हिंदुओं का समर्थन प्राप्त किया।

परंतु शाह वलीउल्लाह देहलवी (1703-1762) ने मुस्लिम साम्राज्य की पुनर्स्थापना के लिए वहाबी आंदोलन चलाया। आगे चलकर, सैयद अहमद बरेलवी (1776-1831) ने आक्रामक रुख अपनाया, लेकिन महाराजा रणजीत सिंह की सेना ने सन् 1831 में बालाकोट के युद्ध में सैयद अहमद बरेलवी को सेना सहित मार गिराया। इस युद्ध में अंग्रेजों ने सिखों के विनाश के लिए वहाबियों को हर प्रकार से मदद की, परंतु चाल उल्टी ही पड़ गई। वहाबियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध ही मोर्चा खोल दिया। वहाबी आंदोलन सन् 1870 तक चला।

सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों ने मुसलमानों को दोषी ठहराया और उनका दमन भी किया, परंतु वहाबी आंदोलन से अंग्रेजों को मुस्लिमों के पैनेपन का परिचय मिल गया था। वे उन्माद जागृत करने की मुस्लिम क्षमता को पहचान गए थे। इसलिए सन् 1871 में डब्ल्यू. डब्ल्यू. हंटर ने 'द इंडियन मुसलमांस' नामक अपनी पुस्तक में विशेष रूप से बताया कि ब्रिटिश शासन के विरुद्ध मुस्लिम प्रतिरोध के मूल कारण क्या हैं और उन्हें अंग्रेज किस प्रकार दूर कर उनकी निष्ठा प्राप्त कर सकते हैं। उसने उनकी मजहबी आशंकाओं को उजागर करने का प्रभावी प्रयास किया और बताया कि किस प्रकार उन्हें दूर किया जा सकता है। उसका कहना था कि कुरान के आदेशों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता की व्याख्या की जानी चाहिए, ताकि ब्रिटिश-विरोध के उनके आक्रोश को दूर किया जा सके। हंटर का विशेष योगदान यह था कि उसने मुस्लिम उग्रता के विश्लेषण में सहानुभूति को अपनाया और उनकी शिकायतों को उचित ठहराया था। हंटर ने यह भी बताया कि अंग्रेजों ने पहले कहाँ-कहाँ गलती की थी और भविष्य में उन्हें कौन-कौन से नए रुख अपनाने होंगे। हंटर की यह पुस्तक अंग्रेजों की नीति-निर्माण में मील का पत्थर साबित हुई।

सच तो यह है कि जेम्स मिल की पुस्तक 'द हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया' से भारत को विभाजित करने का कार्य किया जाने लगा था, जिससे कि अंग्रेजों का शासन दीर्घजीवी हो सके और हंटर की पुस्तक के कारण सन् 1857 की क्रांति के पश्चात सर सैयद अहमद खान के अलीगढ़ आंदोलन को समर्थन दिया जाने लगा। यहाँ तक कि उस अलीगढ़ कॉलेज का संबंध कई अंग्रेज गवर्नरों से रहा है और लॉर्ड नॉर्थब्रुक ने ₹10,000 की आर्थिक सहायता पहुँचाने का काम किया। अलीगढ़ आंदोलन में प्रिंसिपल आर्चबोल्ड, थियोडोर बेक का भी योगदान मिलता है, जिन्होंने एक ऐसी खाई पैदा करने का काम किया, जिससे द्विराष्ट्र सिद्धांत को बल मिला और मोहम्मद इकबाल ने इसकी वकालत करना शुरू कर दी। सन् 1906 में मुस्लिम लीग बनी, जो शिमला में लॉर्ड मिंटो से मिली। वास्तव में यह अंग्रेजों द्वारा निर्देशित एक नाटक था, जिसे मुस्लिम लीग निभा रही थी।

अंग्रेजों ने सुनियोजित तरीके से भारतीय इतिहास-लेखन में सांप्रदायिकता को आगे बढ़ाया। भारतीय इतिहास के एंग्लो-इंडियन लेखकों ने भारतीय इतिहास तथा संस्कृति को हिंदू तथा मुस्लिम दृष्टिकोण से पढ़ने अथवा लिखने का प्रयत्न किया। उन्होंने प्राचीन भारतीय इतिहास को 'हिंदू युग' तथा मध्ययुगीन भारतीय इतिहास को 'मुस्लिम युग' की संज्ञा दी। आगे चलकर सांप्रदायिक त्रिकोण का निर्माण हुआ, जिसका आधार अंग्रेज स्वयं बने।देवबंद और बरेलवी जैसे आपसी प्रतिस्पर्धी धार्मिक आंदोलनों की राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ और नीतियाँ काफी हद तक अलग और विभाजित थीं, जिसका प्रभाव भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों की राजनीतिक दिशा पर पड़ा। दोनों धाराओं के एक बड़े धड़े ने मुस्लिम लीग और पाकिस्तान का समर्थन भी किया।

यद्यपि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना अंग्रेजों ने सुरक्षा-कपाट को लेकर की थी, तिलक के आने से कांग्रेस की ताकत बढ़ने लगी थी और राष्ट्रत्व प्रबल हो रहा था। इसलिए कांग्रेस की बढ़ती राष्ट्रीय शक्ति को कमजोर करने और राष्ट्रीय आंदोलन को विभाजित करने के लिए अंग्रेजों ने 'बाँटो और राज करो' की नीति अपनाई। इसके तहत सन् 1906 में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना अंग्रेजों के प्रोत्साहन और मुस्लिम बहुसंख्यक वर्ग को कांग्रेस से दूर रखने की राजनीतिक चाल का परिणाम थी।

वर्ष 1909 के भारतीय परिषद अधिनियम, जिसे मार्ले-मिंटो सुधार भी कहा जाता है, ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली (Separate Electorates) की शुरुआत करके भारत में सांप्रदायिक राजनीति की नींव रखी थी। इस प्रावधान ने धर्म के आधार पर समाज और राजनीति को विभाजित कर दिया, जिससे भविष्य में देश का विभाजन अपरिहार्य हो गया। इस अधिनियम के तहत मुस्लिम मतदाताओं के लिए अलग क्षेत्र तय किए गए, जहाँ केवल मुस्लिम उम्मीदवार ही खड़े हो सकते थे और सिर्फ मुस्लिम लोग ही उन्हें वोट दे सकते थे। इससे पहली बार यह मान लिया गया कि हिंदुओं और मुसलमानों के राजनीतिक हित एक-दूसरे से अलग और विरोधी हैं। जब पृथक निर्वाचन प्रणाली (कम्यूनल इलेक्टोरेट) को मंजूरी दी जा रही थी, तब लॉर्ड मार्ले ने लॉर्ड मिंटो को पत्र लिखकर चेतावनी दी थी कि "हम अजगर के दाँत बो रहे हैं और इसका परिणाम कड़वा होगा।"

सन् 1916 में लखनऊ में कांग्रेस और मुस्लिम लीग का समझौता आगे चलकर घातक सिद्ध हुआ। जहाँ एक ओर इस समझौते ने मुस्लिम लीग को वैधानिकता प्रदान की, वहीं दूसरी ओर पृथक निर्वाचन प्रणाली पर भी मोहर लगा दी। इंद्र विद्यावाचस्पति लिखते हैं कि "कांग्रेस के उस समय के नेताओं ने समझा था कि जो समझौता हो रहा है, वह सौदे का अंतिम अध्याय है, पर वस्तुतः वह केवल पहला अध्याय निकला और उसके अंतिम अध्याय का शीर्षक बना पाकिस्तान।"

सन् 1919 के भारत शासन अधिनियम ने सन् 1909 की पृथक निर्वाचन प्रणाली का विस्तार किया और इसे सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियन और यूरोपियों तक बढ़ा दिया। जब समुदायों को अलग वोट देने का अधिकार मिला, तो नेता लोग धर्म के आधार पर वोट माँगने लगे। इससे समाज में हिंदू और मुस्लिम या अन्य जातियों के बीच दूरियाँ बढ़ती गईं। लोग अब देश के हित के बजाय अपने-अपने धर्म या समूह के फायदे के बारे में सोचने लगे। सन् 1919 के इन प्रावधानों ने ऐसा राजनीतिक ढाँचा तैयार किया, जिसके कारण आगे चलकर 1932 का सांप्रदायिक पंचाट (Communal Award) और अंततः सन् 1947 का देश का राजनीतिक व धार्मिक विभाजन अनिवार्य-सा हो गया।

महात्मा गांधी और कांग्रेस का खिलाफत आंदोलन को समर्थन देना बहुत भारी पड़ा। प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद तुर्की के साथ की गई सेवर्स की संधि के अंतर्गत खलीफा के अपमान और इस्लामी क्षेत्र के बँटवारे को लेकर भारतीय मुस्लिम नाराज हो गए और इसको लेकर अली बंधुओं ने अंग्रेजों का विरोध करने का निश्चय किया, जिसे खिलाफत आंदोलन के नाम से जाना जाता है।

यह आंदोलन भारतीय कम, अंतरराष्ट्रीय मुद्दे से ज्यादा जुड़ा था, जिसका उद्देश्य तुर्की में खलीफा के सम्मान और उनके शासन को स्थापित करना था। इसका भारत की आजादी से कोई लेना-देना नहीं था। हालाँकि गांधी जी ने आंदोलन का समर्थन किया और उन्हें एक ऐसा अवसर दिखाई दिया कि अगर इसी समय एक अन्य आंदोलन शुरू कर दिया जाए, जिसमें आजादी हो, स्वराज हो, तो शायद भारतीय जुड़ जाएँगे और हिंदू-मुस्लिम मिलकर एक ऐसा आंदोलन प्रारंभ करेंगे, जिससे हम अंग्रेजों पर दबाव डाल सकें। इसी दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अगस्त 1920 में असहयोग आंदोलन प्रारंभ कर दिया। हालाँकि चौरी-चौरा की घटना के बाद असहयोग आंदोलन को वापस लेना पड़ा। वास्तव में यह पहला और अंतिम अवसर था, जहाँ राष्ट्रीय आंदोलन को मुस्लिम वर्ग का सबसे बड़ा समर्थन मिला। इसके पश्चात सविनय अवज्ञा आंदोलन हो या भारत छोड़ो आंदोलन, देश की आजादी को लेकर उतना समर्थन मुस्लिम वर्ग का कभी प्राप्त नहीं हुआ। मोपला दंगे इसी का दुष्परिणाम थे।

भारत सरकार अधिनियम 1935 ने सांप्रदायिक निर्वाचन प्रणाली का विस्तार करके, मुस्लिम बहुल प्रांतों को स्वायत्तता देकर और मुस्लिम लीग को राजनीतिक रूप से मजबूत करके भारत के विभाजन की पृष्ठभूमि तैयार की, जिससे देश का वैचारिक और प्रशासनिक विभाजन अनिवार्य हो गया। सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का विस्तार हुआ। इस अधिनियम ने मुसलमानों के अलावा सिखों, ईसाइयों और दलितों के लिए भी अलग मतदाता मंडलों का दायरा बढ़ाया। इससे भारतीय समाज में धार्मिक आधार पर दूरियाँ गहरी हुईं। राष्ट्रीय एकता कमजोर हुई। प्रांतीय स्वायत्तता और मुस्लिम लीग का उभार हुआ। प्रांतों में द्वैध शासन खत्म कर प्रांतीय स्वायत्तता दी गई। 1937 के चुनावों के बाद राजनीतिक वास्तविकताओं ने मुस्लिम लीग को अपनी पहचान मजबूत करने का मौका दिया। धर्म-आधारित राजनीति को कानूनी और प्रशासनिक मान्यता मिली। दो-राष्ट्र सिद्धांत को अप्रत्यक्ष बल मिला। अधिनियम की व्यवस्थाओं ने यह अहसास कराया कि अल्पसंख्यक समुदाय अलग पहचान के बिना सुरक्षित नहीं हैं। इसी आधार पर आगे चलकर पाकिस्तान की माँग को वैचारिक बल मिला।

कैंब्रिज विश्वविद्यालय में चौधरी रहमत अली ने सन् 1933 में 'नाउ ऑर नेवर' पर्चे में पहली बार 'पाकिस्तान' शब्द का इस्तेमाल किया था। उसने उत्तर-पश्चिम भारत के पाँच क्षेत्रों (पंजाब, अफगान प्रांत, कश्मीर, सिंध और बलूचिस्तान) को मिलाकर इस अलग मुस्लिम राष्ट्र की कल्पना की थी। यही शब्द आगे जाकर फलीभूत हुआ।सन् 1940 का लाहौर प्रस्ताव और द्विराष्ट्र का सिद्धांत प्रस्फुटित हुआ। सन् 1937 के चुनाव में मुस्लिम लीग को सफलता नहीं मिली। कांग्रेस ने आठ राज्यों में अपनी सरकार बनाई और बेहतर कार्य किया, जिससे मुस्लिम लीग की लोकप्रियता में कमी आई। लेकिन 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ होने के पश्चात कांग्रेस ने अपने मंत्रिमंडलों से त्यागपत्र दे दिया।

मुस्लिम लीग के नेताओं को समझ में आया कि बिना धार्मिक रंग दिए और मुसलमानों के लिए अलग राष्ट्र की माँग किए मुस्लिम लीग को फिर से खड़ा नहीं किया जा सकता। इसलिए उन्होंने 1940 के लाहौर अधिवेशन, जिसकी अध्यक्षता मोहम्मद अली जिन्ना ने की थी, में जिन्ना ने कहा कि मुसलमानों के लिए एक अलग देश होना चाहिए, क्योंकि संयुक्त भारत में मुसलमानों के हित सुरक्षित नहीं हैं। पाकिस्तान के प्रस्ताव को फजलुल हक ने प्रस्तुत किया, जिसे 23 मार्च 1940 को पारित किया गया। यह तिथि इतनी महत्वपूर्ण थी कि यहीं से पाकिस्तान के बिना मुस्लिम लीग को अपना वजूद अधूरा लगने लगा। इसी कारण से 23 मार्च को पाकिस्तान दिवस मनाया जाता है, न कि 14 अगस्त को। यहीं से अब मुस्लिम लीग ने अपने पाकिस्तान प्रस्ताव को लोगों तक पहुँचाना शुरू किया, जिसका परिणाम उन्हें 1946 के चुनाव में मिला।

वेवेल योजना के चलते शिमला सम्मेलन में जिन्ना की हठधर्मिता ने यह दिखा दिया कि मुस्लिम हितों की रक्षक केवल मुस्लिम लीग है और यह बात सब जगह बिजली की तरह फैल गई। भारत के मुसलमानों को लगने लगा कि जिन्ना ही उनके हितों के रक्षक हैं, जिसका लाभ 1946 के चुनाव में मिला।1946 के चुनाव मुस्लिम लीग के लिए संजीवनी बूटी की तरह साबित हुए। उसने केंद्रीय विधानसभा में 30 स्थान जीते और प्रांतीय विधानसभा के चुनाव में 425 सीटें जीतीं। कुल मिलाकर समस्त मुस्लिम आरक्षित सीटों में से 90% सीटें मुस्लिम लीग को मिलीं, जिन पर सर्वाधिक संख्या उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल आदि क्षेत्रों से थी।

मुस्लिम लीग को समझ में आ गया कि सांप्रदायिकता के ज्वार के बिना वह सत्ता पर सवार नहीं हो सकती। इसलिए सत्ता की प्राप्ति अलग देश की माँग से ही पूरी हो सकती है और यह उन्माद इतना छा गया कि मुस्लिम लीग अब अपनी मनमानी पर उतारू हो गई।सन् 1946 में कैबिनेट मिशन योजना में पाकिस्तान की माँग को सीधे-सीधे स्वीकार न कर प्रांतों का सामूहीकरण किया गया, जिन्हें ए, बी, सी कैटेगरी में डाला गया, जो हिंदू-बहुल, मुस्लिम-बहुल और मिश्रित जनसंख्या वाले थे। इसमें कहा गया कि कोई भी प्रांत अपना संविधान भी बना सकता है। केंद्र का संविधान अलग होगा, प्रांत का अलग होगा। समूह को संघ से अलग होने का अधिकार था।

कांग्रेस ने कहा, इससे तो पाकिस्तान बन जाने की संभावना है, लेकिन जिन्ना ने कहा कि मुझे तो स्पष्ट, क्लियर-कट पाकिस्तान चाहिए। कैबिनेट मिशन ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। तब जिन्ना ने कहा, हम लड़कर लेंगे पाकिस्तान और 16 अगस्त 1946 को प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस का आह्वान किया गया। बंगाल में जबरदस्त दंगे हुए और हजारों हिंदुओं की हत्या कर दी गई।

इस नरसंहार को देखकर अब स्पष्ट दिखाई देने लगा कि अब बिना मुस्लिम राष्ट्र के भारत में शांति संभव नहीं है। इससे अंग्रेज एवं कांग्रेस के नेता भी भयभीत हो गए और उन्हें लगने लगा कि भारत के विभाजन के बिना कुछ भी संभव नहीं है। यहाँ तक कि बंगाल की सरकार भी मुस्लिम लीग के समर्थन से चल रही थी। उसने इन दंगों को रोकने के लिए कोई प्रयास नहीं किया।सन् 1946-47 के सांप्रदायिक दंगे अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति, द्विराष्ट्र सिद्धांत एवं अंतरिम सरकार की असफलता और राजनीतिक विवादों ने इन दंगों को बढ़ा दिया। मुस्लिम लीग अब किसी भी कीमत पर पाकिस्तान चाहती थी।

उसको लेकर बंगाल के नोआखाली में भी दंगे हुए। इसके प्रत्युत्तर में बिहार, पंजाब, उत्तर प्रदेश में हुए दंगों में हजारों लोग मारे गए। सरकार मूकदर्शक की तरह बैठी रही, क्योंकि उनको भी समझ में आ गया था कि उनके पास पाकिस्तान बनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं, जो इन दंगों को रोक सके।

इन दंगों ने तय कर दिया कि भविष्य में हिंदू-मुस्लिम एक साथ रहना संभव नहीं है और अब लोगों ने अपने दिल और दिमाग में तय कर लिया कि पाकिस्तान बन जाना चाहिए। यही कारण है कि जो गांधी जी 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय कह रहे थे कि मैं भारत की रेत से तूफान खड़ा कर सकता हूँ, अब हताश हो गए और कहने लगे कि जब नेहरू-पटेल विभाजन चाहते हैं, तो मैं क्या कर सकता हूँ। यह विवशता बताती है कि कहीं न कहीं लोगों ने हृदय से इस विभाजन को स्वीकार कर लिया था।

माउंटबेटन अंतिम वायसराय के रूप में भारत आए, जिनका उद्देश्य भारत का विभाजन करना था। उन्होंने अपनी 3 जून की प्रसिद्ध योजना प्रस्तुत की, जिसे विभाजन योजना और कुछ लोगों ने तो माउंटबेटन योजना भी कह दिया।

इस योजना के तहत भारत और पाकिस्तान का निर्माण कर दिया गया। असम के सिलहट जिले और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत में जनमत-संग्रह की बात कही गई, जो अंत में पाकिस्तान में मिल गए। इसी 3 जून अर्थात् माउंटबेटन योजना को इंग्लैंड की संसद में मतदान के लिए 15 जुलाई को प्रस्तुत किया गया और 18 जुलाई को इस पर ब्रिटिश सम्राट के हस्ताक्षर हो गए और पाकिस्तान के निर्माण का सपना पूरा हुआ। 18 जुलाई सन् 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पारित हो गया और भारत विभाजित हो गया। वास्तव में एक ऐसा देश, जो कभी अस्तित्व में नहीं था, एक ऐसा धार्मिक समुदाय, जिसे भारत की संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं था, जो भारत की मिट्टी की खुशबू को पहचानता नहीं था, जो भारत की आत्मा से नहीं जुड़ा था, उसने केवल अपने निजी स्वार्थ के लिए अखंड भारत को विभाजित कर दिया।

यह विडंबना भी देखिए कि भारत के 90% मुसलमानों ने 1945-46 में पाकिस्तान के पक्ष में वोट दिया, लेकिन जब बँटवारे के दौरान पाकिस्तान जाने की बारी आई, तो कितने मुसलमान पाकिस्तान गए?

भारत के विभाजन के समय लगभग 72 लाख मुसलमान (उस समय की कुल मुस्लिम आबादी का लगभग 16% से 18%) भारत से पाकिस्तान गए थे। बाकी के करीब 82% से 84% मुसलमान भारत में ही रहे। लगभग 72 लाख मुसलमान भारत से पाकिस्तान गए। यह संख्या उस समय भारत में मौजूद लगभग 4.25 करोड़ मुसलमानों का लगभग 17% थी। लगभग 83% से ज्यादा मुसलमान भारत में ही रहे। उस पर भी तथाकथित सेक्युलर और वामपंथी लेखक विभाजन का भार हिंदुओं पर डालते हैं, परंतु सच तो यह है कि हिंदू और उनके संगठन राष्ट्र की रक्षा और बचाव की मुद्रा में रहे। इसलिए विभाजन का भार हिंदुओं पर डालना उचित नहीं है, क्योंकि हिंदू सदैव अखंड भारत के पक्षधर रहे।

यदि हिंदू विभाजन के पक्षधर होते, तो भारत में मुसलमान सुरक्षित रह पाते क्या?

हिंदुओं के लिए विभाजन अत्यंत कष्टकारी और दुखदायी रहा, क्योंकि हिंदुओं को अपनी स्वतंत्रता के लिए, अपने राष्ट्र को बचाने के लिए अंग्रेजों और मुसलमानों से संघर्ष करना पड़ा। हिंदुओं का चौतरफा नुकसान हुआ। यदि वीर सावरकर, लोकमान्य तिलक, पंडित मदन मोहन मालवीय, केशवराव बलिराम हेडगेवार और माधव सदाशिव गोलवलकर जी ने इसकी पृष्ठभूमि को न समझा होता, तो परिणाम और भी गंभीर और घातक होते। विद्वानों का मत है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 10 वर्ष पूर्व अर्थात् सन् 1915 में हो गई होती, तो भारत का विभाजन संभव नहीं था।

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।