कुछ वर्ष पहले अरुणाचल प्रदेश की पहाड़ियों के बीच उस जगह पहुँचता हूँ, जहाँ Glaw Lake पहली ही दृष्टि में झील कम और आकाश का धरती पर उतरा हुआ अंश अधिक लगती है। लगभग 1,168 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह स्वच्छ मीठे पानी की झील Kamlang Tiger Reserve and Wildlife Sanctuary के भीतर साँस ले रही है। पगडंडी से नीचे उतरते ही सामने जल खुलता जाता है और चारों ओर का सघन वन अपनी हरी परछाइयाँ उसके भीतर रखता जाता है। आज जब Glaw Lake भारत की 101वीं और अरुणाचल प्रदेश की पहली Ramsar Site बन रही है, उस यात्रा का प्रत्येक क्षण फिर से वर्तमान में घटने लगता है। मैं वहीं खड़ा हूँ। सामने केवल पानी नहीं है। पूर्वी हिमालय की एक पूरी जीवित व्यवस्था अपने द्वार खोल रही है।

जल के भीतर आकाश उतर रहा है।

वन अपनी परछाईं सँभाल रहा है।

झील के किनारे पहुँचकर झुकता हूँ और हथेली पानी में डाल देता हूँ। जल ठंडा है, इतना स्वच्छ कि लगता है पहाड़ ने अपनी धड़कन सीधे मेरी उँगलियों तक भेज दी है। हथेली उठती है तो कुछ बूँदें देर तक त्वचा पर ठहरी रहती हैं। उनमें आकाश भी है, वन भी और मेरे चेहरे की टूटी हुई परछाईं भी। इसी स्पर्श के भीतर यह तथ्य भी जीवित हो उठता है कि झील को बारहमासी पर्वतीय जलधाराएँ निरन्तर भर रही हैं। वे केवल पानी नहीं ला रहीं। वे ऊपरी ढलानों की नमी, चट्टानों से छनकर आए खनिज, माटी की सूक्ष्म गन्ध और बादलों की पुरानी स्मृति अपने साथ ला रही हैं। झील स्थिर दिखाई देती है, पर उसके भीतर पहाड़ लगातार उतर रहा है।

एक बूँद में पूरा पहाड़ ठहरा है।

हथेली पर जल नहीं, भू-दृश्य धड़क रहा है।

तट के साथ-साथ चलना शुरू होता है। कहीं जमीन मुलायम है, कहीं जड़ों ने सीढ़ियाँ बना रखी हैं, कहीं पत्तियों के नीचे पानी की महीन आवाज चल रही है। झील का चक्कर लगाते हुए बार-बार कदम रुक जाते हैं। एक स्थान पर पानी इतना साफ है कि मेरी परछाईं मेरे साथ नहीं, मेरे नीचे चलती दिखाई देती है। आगे बढ़ता हूँ तो वह भी टूटती, जुड़ती और फिर मेरे पीछे छूटती जाती है। उसी क्षण यह समझ खुलती है कि झील केवल दृश्य नहीं सँजोती, वह आने वाले मनुष्य को कुछ देर अपने भीतर रखती भी है। उसमें पहाड़ का प्रतिबिम्ब स्थिर है, पर मेरा चेहरा हर कदम पर बदल रहा है।

पानी मेरे चेहरे को याद कर रहा है।

परछाईं चलती है, झील स्थिर रहती है।

थोड़ी दूर वन के भीतर घुसते ही बाहर का खुला प्रकाश पीछे रह जाता है और ऊपर शाखाओं का जाल फैल जाता है। वन की जमीन पर गिरी पत्तियाँ पैरों के नीचे धीमे-धीमे दबती हैं। कहीं काई चट्टान को ढँक रही है, कहीं जड़ों के बीच वर्षा का पानी ठहरा है, कहीं किसी छोटे जीव की सरसराहट अचानक भीतर की निस्तब्धता को चीरती है। चारों ओर का सघन वनावरण वर्षा के पानी को एकाएक ढलानों से भाग जाने नहीं देता। वह उसे रोकता है, पत्तियों से टपकाता है, जड़ों के सहारे धरती के भीतर उतारता है और धीरे-धीरे झील तक पहुँचाता है। इन जड़ों को देखता हूँ तो वे केवल वृक्षों को थामे हुए नहीं लगतीं। वे पूरी पहाड़ी को पकड़े खड़ी हैं।

जड़ें धरती की उँगलियाँ हैं।

वे पहाड़ को बहने से रोक रही हैं।

ढलान की माटी उँगलियों से छूता हूँ। वह नम है, पर बह नहीं रही। यही वन मिट्टी के कटाव को रोक रहा है। यही झील में गाद के अनियंत्रित प्रवेश को कम कर रहा है। यही अतिरिक्त पोषक तत्त्वों और बाहरी प्रदूषकों को जल में पहुँचने से पहले थाम रहा है। झील की ओर लौटकर पानी देखता हूँ तो उसकी निर्मलता अब केवल सौन्दर्य नहीं लगती। उसके पीछे पूरी वैज्ञानिक व्यवस्था काम कर रही है। वनाच्छादित जलग्रहण क्षेत्र, कम मानवीय हस्तक्षेप, सुरक्षित ढलानें और सतत बहती पर्वतीय धाराएँ मिलकर इस जल को स्वच्छ बनाए रखती हैं। इसलिए इसे केवल भावावेश में शून्य प्रदूषण वाली झील कहना ठीक नहीं होगा। वैज्ञानिक रूप से इसे अत्यल्प मानवीय प्रदूषण वाली लगभग अक्षुण्ण झील कहना अधिक उचित है।

स्वच्छता यहाँ किसी चमत्कार का नाम नहीं।

यह वन, जल और माटी की साझी साधना है।

पानी को फिर छूता हूँ। इस बार हथेली के आसपास छोटे-छोटे वृत्त बनते हैं। वे फैलते हैं, एक-दूसरे में मिलते हैं और फिर झील की बड़ी देह में खो जाते हैं। लगता है, जल का विज्ञान भी ऐसा ही है। पहाड़ी पर गिरने वाली एक बूँद अकेली नहीं रहती। वह मिट्टी में उतरती है, जड़ों से मिलती है, छोटी धाराओं का हिस्सा बनती है, भूजल को भरती है और अन्ततः झील में पहुँचकर एक बड़े जलचक्र में समा जाती है। Glaw Lake स्थानीय जल-सुरक्षा, भूजल पुनर्भरण, सूक्ष्म जलवायु के नियमन और अत्यधिक वर्षा के प्रभाव को कम करने में इसी तरह काम कर रही है। यहाँ पानी केवल एक पात्र में जमा नहीं है। वह पूरे भू-दृश्य को बाँधकर रखे हुए है।

एक बूँद अकेली नहीं चलती।

उसके पीछे पूरा जलचक्र चलता है।

ऊपर दृष्टि जाती है तो ऊँचे वृक्षों के तनों पर, शाखाओं के जोड़ पर और नम छाया में ऑर्किड दिखाई देते हैं। कुछ फूल स्पष्ट हैं, कुछ पत्तियों और काई के बीच आधे छिपे हुए। ऐसा लगता है, बादलों ने अपने रंगीन हस्ताक्षर डालियों पर छोड़ दिए हैं। इस क्षेत्र में 150 से अधिक वृक्ष प्रजातियाँ और 49 ऑर्किड प्रजातियाँ पाई जाती हैं। अब ये आँकड़े मेरे लिए कागज पर लिखी संख्याएँ नहीं रह जाते। जहाँ सिर उठता है, कोई नया पत्ता, नई छाल, नया आकार सामने आ जाता है। वन की प्रत्येक तह किसी दूसरी प्रजाति का घर है। ऊपर प्रकाश के लिए वृक्ष हैं, बीच में झाड़ियाँ हैं, नीचे काई और पत्तियों की नम दुनिया है। एक ही स्थान पर जीवन कई मंजिलों में बसा हुआ है।

ऑर्किड शाखाओं पर प्रकाश बाँध रहे हैं।

वन एक साथ कई लोकों में जी रहा है।

कुछ देर बिल्कुल स्थिर खड़ा रहता हूँ। कोई पक्षी दिखाई दिए बिना पुकारता है। दूर किसी डाल पर हलचल होती है। कहीं झाड़ी अचानक हिलती है और फिर थम जाती है। हर जीव सामने नहीं है, पर उनके होने के प्रमाण चारों ओर बिखरे हैं। यही विस्तृत पारिस्थितिक संसार White-bellied Heron और Clouded Leopard जैसी संकटग्रस्त तथा महत्त्वपूर्ण प्रजातियों को भी आश्रय देता है। White-bellied Heron जल और तट की शान्त संरचना से जुड़ा है, जबकि Clouded Leopard वन की घनी परतों और सुरक्षित आवास पर निर्भर है। वे मेरी आँखों के सामने उपस्थित नहीं हैं, फिर भी उनके लिए आवश्यक संसार के बीच खड़ा हूँ। कभी किसी पंख की छाया जल पर फिसलती है, कभी किसी अनदेखे प्राणी का पदचिह्न गीली मिट्टी में मिलता है। यहाँ अनुपस्थिति भी उपस्थिति का प्रमाण बन जाती है।

जो दिखाई नहीं देता, वह भी यहीं है।

पदचिह्न जीव की गवाही दे रहे हैं।

झील का चक्कर आगे बढ़ता है। कहीं किनारा चौड़ा है, कहीं वन अचानक जल के बहुत निकट आ जाता है। एक जड़ पर बैठकर सामने पानी में तैरती रोशनी को देखता हूँ। वहाँ जल, वन, मृदा, सूक्ष्मजीव, जलीय जीव, पक्षी, वन्यप्राणी और मनुष्य अलग-अलग दिखाई नहीं देते। सब एक-दूसरे में जुड़े हुए हैं। झील के भीतर सूक्ष्मजीव पोषक तत्त्वों के चक्र चलाते हैं। जलीय जीव जल की दशा का संकेत देते हैं। तट की वनस्पति मिट्टी थामती है। वृक्ष वर्षा को नियंत्रित करते हैं। पक्षी बीजों और जीवन को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाते हैं। वन्यप्राणी इस भू-दृश्य को गतिशील बनाए रखते हैं। स्थानीय समुदाय पीढ़ियों से इस सम्पूर्ण व्यवस्था को पढ़ते और समझते आए हैं।

यहाँ कोई जीवन अकेला नहीं है।

हर प्राणी किसी दूसरे का सहारा है।

वन के भीतर फिर प्रवेश करता हूँ। इस बार केवल वृक्ष नहीं दिखते। जलग्रहण क्षेत्र की वह अदृश्य मशीनरी दिखाई देती है, जो बिना शोर किए काम कर रही है। पत्तियाँ वर्षा की गति कम करती हैं। गिरी हुई जैविक सामग्री पानी को सोखती है। जड़ें मिट्टी में मार्ग बनाती हैं। जल नीचे उतरता है। कुछ भाग भूजल बनता है, कुछ छोटी धाराओं में बहता है और कुछ देर से झील तक पहुँचता है। इसी धीमी यात्रा से बाढ़ की तीव्रता कम होती है और सूखे समय में जलधाराएँ जीवित रहती हैं। यह पूरा वन झील के लिए फैला हुआ एक विशाल प्राकृतिक बाँध लगता है, पर ऐसा बाँध जो पानी रोककर उसे कैद नहीं करता, बल्कि सँभालकर धीरे-धीरे आगे बढ़ाता है।

वन पानी को बाँधता नहीं।

उसे समय देकर आगे भेजता है।

एक ऊँचे स्थान पर चढ़कर पीछे मुड़ता हूँ। पूरी झील नीचे दिखाई देती है। उसके चारों ओर वन का घेरा है, मानो पहाड़ ने उसे दोनों बाँहों में थाम रखा हो। यही वन कार्बन को अपने तनों, शाखाओं, जड़ों और माटी में संचित कर रहा है। यही स्थानीय तापमान और आर्द्रता को नियंत्रित कर रहा है। यही तेज वर्षा के प्रभाव को कम कर रहा है। झील और उसके आसपास का भू-दृश्य जलवायु परिवर्तन के समय में केवल सुंदर स्थल नहीं, बल्कि प्राकृतिक सुरक्षा-कवच है। स्पष्ट दिखाई देता है कि एक आर्द्रभूमि का महत्त्व उसके जल के फैलाव से कहीं अधिक होता है। वह आसपास की भूमि, हवा, तापमान, जैवविविधता और मानव जीवन को एक साथ प्रभावित करती है।

पहाड़ ने झील को बाँहों में लिया है।

झील पूरे भू-दृश्य को जीवन लौटा रही है।

अब Ramsar मान्यता इस झील को अंतरराष्ट्रीय पहचान दे रही है। उस समय की यात्रा को याद भर नहीं कर रहा, बल्कि फिर उसी पगडंडी पर चल रहा हूँ और सोच रहा हूँ कि यह पहचान किसी पदक की तरह झील के सीने पर नहीं टाँगी जा सकती। इसका अर्थ है कि उसके जलग्रहण क्षेत्र, जलप्रवाह, जल-गुणवत्ता, जैवविविधता और पारिस्थितिक दशा की नियमित वैज्ञानिक निगरानी अधिक मजबूत हो। पानी के स्तर, पोषक तत्त्वों, गाद, वनावरण, प्रजातियों की स्थिति और मानवीय दबावों का दीर्घकालीन अभिलेख रखा जाए। कोई परिवर्तन अचानक नहीं आता। पहले पानी का रंग थोड़ा बदलता है, फिर तट की वनस्पति घटती है, फिर पक्षियों की संख्या कम होती है। वैज्ञानिक निगरानी इन प्रारम्भिक संकेतों को समय रहते पहचान सकती है।

सम्मान के साथ उत्तरदायित्व आता है।

पहला संकेत ही भविष्य की चेतावनी होता है।

झील के एक खुले किनारे पर खड़ा होकर कल्पना करता हूँ कि प्रसिद्धि के बाद यहाँ लोग अधिक आएँगे। उनके साथ उत्सुकता आएगी, कैमरे आएँगे, रास्ते बनेंगे, वाहन आएँगे और आजीविका की नई सम्भावनाएँ भी आएँगी। नियंत्रित तथा समुदाय-आधारित प्रकृति-पर्यटन स्थानीय युवाओं के लिए प्रशिक्षित प्रकृति-मार्गदर्शक, होम-स्टे, स्थानीय भोजन, हस्तशिल्प, परिवहन, पक्षी-दर्शन और जैवविविधता की व्याख्या जैसे सम्मानजनक कार्यों के द्वार खोल सकता है। किसी युवा को झील के किनारे आगन्तुकों को वृक्षों के नाम बताते हुए देखता हूँ। किसी घर में स्थानीय भोजन तैयार हो रहा है। कोई महिला अपने हस्तशिल्प को बाजार तक पहुँचते हुए देख रही है। कोई परिवार बिना वन को क्षति पहुँचाए अपनी आय बढ़ा रहा है। तब संरक्षण और आजीविका एक-दूसरे के विरोधी नहीं रहते।

झील रोजगार भी दे सकती है।

पर उसकी कीमत झील नहीं होनी चाहिए।

स्थानीय लोग केवल पर्यटन की सेवा देने वाले हाथ नहीं हैं। वे इस भू-दृश्य की जीवित स्मृति हैं। उन्हें पता है कि किस ऋतु में कौन-सी धारा उफनती है, कौन-सा पक्षी कब लौटता है, कौन-सा पौधा किस ढलान पर खिलता है और किस स्थान से मनुष्य को दूरी बनाए रखनी चाहिए। Mishmi समुदाय के लिए इस झील का सांस्कृतिक और पवित्र महत्त्व भी है। संरक्षण की कोई भी योजना तब तक अधूरी रहेगी, जब तक स्थानीय ज्ञान, सांस्कृतिक मर्यादा और सामुदायिक भागीदारी उसके केन्द्र में न हों। बाहर से आया विशेषज्ञ जल की रासायनिक जाँच कर सकता है, पर जल के स्वभाव को पीढ़ियों से पहचानने वाली आँखें स्थानीय समुदाय के पास हैं।

समुदाय इस भूमि की स्मृति है।

विज्ञान को उस स्मृति के साथ चलना होगा।

फिर झील के पास लौटता हूँ। पानी में अपना चेहरा देखता हूँ। उसी प्रतिबिम्ब के पीछे पर्यटन का दूसरा चेहरा भी दिखाई देता है। भीड़ बढ़ती है। प्लास्टिक किनारे अटकता है। अनियोजित निर्माण तट की मिट्टी को काटता है। वाहनों का शोर पक्षियों की पुकार पर चढ़ता है। अपशिष्ट जल झील की ओर बढ़ता है। वन्यजीव सुरक्षित रास्ते छोड़ने लगते हैं। आक्रामक प्रजातियाँ स्थानीय वनस्पति को पीछे धकेल सकती हैं। कोई भी झील एक दिन में प्रदूषित नहीं होती। उसके चारों ओर पहले सुविधा के नाम पर छोटे-छोटे समझौते होते हैं, फिर वही समझौते उसके स्वभाव को बदल देते हैं।

प्रदूषण अचानक नहीं आता।

वह छोटी सुविधाओं के वेश में प्रवेश करता है।

झील का चक्कर पूरा करते हुए बार-बार यही अनुभव होता है कि पर्यटन की वहन-क्षमता वैज्ञानिक रूप से निर्धारित करनी होगी। एक समय में कितने लोग आएँ, कौन-से क्षेत्र पर्यटकों के लिए खुले रहें, कौन-से तट संवेदनशील घोषित हों, कहाँ निर्माण न हो, कचरा वापस ले जाने की व्यवस्था कैसी हो, ये सब पहले तय होना चाहिए। प्लास्टिक और ठोस कचरे पर कठोर रोक आवश्यक है। अपशिष्ट जल का उपचार अनिवार्य होना चाहिए। शोर, मोटर चालित गतिविधियों और संवेदनशील तटों पर स्थायी निर्माण को सीमित रखना होगा। यहाँ आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह समझना होगा कि वह केवल पर्यटक नहीं, कुछ समय के लिए इस नाजुक पारिस्थितिकी का उत्तरदायी अतिथि है।

पर्यटक दर्शक भर नहीं है।

वह कुछ समय के लिए संरक्षक भी है।

अन्त में एक बार फिर पानी छूता हूँ। उँगलियों से उठी हल्की तरंगें मेरी परछाईं को तोड़ देती हैं। कुछ क्षण बाद पानी फिर स्थिर हो जाता है, पर मैं पहले जैसा नहीं रहता। साफ दिखाई देता है कि किसी झील की रक्षा केवल उसके पानी की रक्षा नहीं होती। उसके चारों ओर का वन, उसमें उतरती बारहमासी धाराएँ, तट की माटी, सूक्ष्मजीव, जलीय जीव, पक्षी, वन्यप्राणी, स्थानीय संस्कृति और लोगों की आजीविका, सबको एक साथ बचाना पड़ता है। इनमें से किसी एक कड़ी को तोड़ेंगे तो झील ऊपर से सुंदर दिखती रहेगी, पर भीतर से धीरे-धीरे रिक्त होने लगेगी।

परछाईं टूटकर फिर जुड़ जाती है।

पारिस्थितिकी की टूटी कड़ी इतनी सहज नहीं जुड़ती।

आज Glaw Lake Ramsar सूची में दर्ज हो रही है, पर उसकी वास्तविक सुरक्षा किसी सूची, पट्टिका या उत्सव में नहीं है। वह इस बात में है कि हम उसके जलग्रहण क्षेत्र को कितना अक्षुण्ण रखते हैं, उसके वन को कितना सुरक्षित रखते हैं, विज्ञान और स्थानीय ज्ञान को कितनी ईमानदारी से साथ चलाते हैं और पर्यटन को कितना अनुशासित बनाते हैं। झील से लौटते हुए पीछे मुड़ता हूँ। पानी में आकाश अब भी उतरा हुआ है। वन अपनी जगह खड़ा है। ऑर्किड शाखाओं पर चमक रहे हैं। मेरी परछाईं अब वहाँ नहीं है, पर झील की छवि मेरे भीतर चल रही है। Glaw Lake को देखने की सबसे सच्ची रीति यही है कि पर्यटन यहाँ आए, स्थानीय आजीविका को मजबूत करे, इस जीवित संसार को जाने, पर उसे अपने अनुसार बदलने का दुस्साहस न करे। लौटते समय हम वहाँ अपने हल्के पदचिह्नों के अतिरिक्त कुछ न छोड़ें और उसकी निर्मलता, जैवविविधता तथा गरिमा में से कुछ भी कम करके अपने साथ न ले जाएँ।

झील पीछे रह जाती है।

उसका जल भीतर चलता रहता है।

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।