वर्तमान परिदृश्य में यह प्रश्न हम सभी के मन में उठ रहा है, “क्या सचमुच हमारे बच्चे, खास तौर पर बेटियाँ, बदल रही हैं? या उनके चारों ओर की दुनिया इतनी तेजी से बदल गई है कि हम उन्हें समझाने में कहीं पीछे छूट गए?”

जंतर-मंतर पर जेन जी के प्रदर्शन की तस्वीरें कई प्रश्न खड़े कर रही हैं। जैसे,क्या इन बच्चों में भारतीय संस्कृति का तत्व हम डाल ही नहीं पाए? या फिर यह नई पीढ़ी की अभिव्यक्ति का तरीका है?

शायद उत्तर दोनों प्रश्नों के बीच ही कहीं है।

आवश्यकता इन प्रश्नों के भीतर उतरकर निष्पक्ष विश्लेषण करने की है। आवश्यकता इस मूल प्रश्न पर विचार करने की है कि क्या हम केवल प्रदर्शन देख रहे हैं, या उसके पीछे छिपी उस पूरी यात्रा को भी समझ रहे हैं, जो एक बेटी घर की चौखट से जंतर-मंतर तक तय करती है? जंतर-मंतर पर खड़ी उन युवतियों को केवल दोष देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं की जा सकती। हम उनसे असहमत हो सकते हैं। उनकी अभिव्यक्ति की शैली पर प्रश्न उठा सकते हैं। लेकिन उससे पहले हमें स्वयं से भी प्रश्न पूछना होगा कि क्या हमने अपनी अगली पीढ़ी को विचारों की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार किया है?

क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था उनमें अपने सनातन इतिहास पर गर्व करना सिखा पाई या उनमें नैतिक मूल्यों के बीज डाल पाई? बदलते परिवेश में हमने उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की मानसिकता दी लेकिन क्या एक राष्ट्र , एक समाज ,एक शिक्षण संस्थान या माता या पिता के रूप में हम उन्हें अपनी संस्कृति, अपनी जड़ों से जोड़ कर रख पाए?

क्या हमने कभी उन्हें बताया कि रावण श्रीराम से युद्ध में बाद में हारा था, देवी सीता उसे मनोवैज्ञानिक युद्ध में पहले ही परास्त कर चुकी थीं? क्या हमने उन्हें बताया कि द्रौपदी ने अन्याय के विरुद्ध पूरी सभा को जिसमें भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और विदुर जैसे ज्ञानी थे, अपने धर्मयुक्त तार्किक प्रश्नों से सिर्फ मौन ही नहीं किया था बल्कि अपराधबोध से सिर झुकाने के लिए विवश भी कर दिया था? यदि हमारे बच्चे यह सब जानेंगे, तो उन्हें अपनी संस्कृति पिछड़ेपन नहीं बल्कि अपनी शक्ति का प्रतीक लगेगी।

इसलिए आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बच्चों पर नियंत्रण नहीं,उनके साथ संवाद है। क्योंकि आज बच्चे उच्च शिक्षा या नौकरी के लिए महानगरों में या छात्रावास में रह रहे हैं। नई मित्र मंडली, सोशल मीडिया और वैश्विक विचारधाराओं का निरंतर प्रभाव,यह सब मिलकर उनके आस पास एक बिल्कुल नया मानसिक संसार रचते हैं। अठारह से पच्चीस वर्ष की आयु वह अवस्था है, जहाँ व्यक्ति अपनी पहचान खोज रहा होता है। वह हर स्थापित सत्य पर प्रश्न करता है, क्योंकि उसके भीतर स्वयं को परिभाषित करने की प्रक्रिया चल रही होती है।

इन परिस्थितियों में आज का सबसे बड़ा संकट सूचना का नहीं, व्याख्या का है। आज हमारे बच्चे हजारों वीडियो देख रहे हैं, लेकिन क्या वे यह समझने के लिए इतने परिपक्व हैं कि किसी भी विचार को स्वीकार करने से पहले उसकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि को समझना भी आवश्यक है? यहीं से माता-पिता और समाज के रूप में हमारी भूमिका बदल जाती है।

अब बच्चों पर नियंत्रण रखने का समय नहीं रहा, बल्कि उनके भीतर विवेक विकसित करने का समय है। विश्वास कीजिए, संवाद वह कर सकता है जो नियंत्रण कभी नहीं कर सकता। जंतर-मंतर का यह प्रसंग केवल एक प्रदर्शन नहीं है,यह हमारे समय का आईना है। यह हमें चेतावनी भी देता है और अवसर भी। चेतावनी इस बात की कि यदि परिवार, शिक्षा और संस्कृति के बीच संवाद टूट गया, तो वैचारिक दूरी बढ़ती जाएगी। और अवसर इस बात का कि इस घटनाक्रम से जब यह बात सामने आ गई है कि गलती कहां हो रही है तो हम अपनी अगली पीढ़ी में आधुनिकता और सनातन दोनों का संतुलित बनाकर उसे विचारों की इस लड़ाई के लिए तैयार करके इस समस्या की जड़ पर प्रहार कर सकते हैं।

ताकि हमारी बेटियों केवल आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं बल्कि विवेकवान बनें। ताकि विचारों के इस युद्ध में विद्रोही विचारों के आगे वे घुटने नहीं टेकें बल्कि उन विचारों को अपने तर्कों से परास्त करें। ताकि नैरेटिव्स के इस युग में वे शिकार नहीं योद्धा बनें। और यह कार्य घर में माता पिता , विद्यालय में शिक्षा व्यवस्था,विश्वविद्यालय के परिसर से लेकर सोशल मीडिया मंच सब जगह से करने की आवश्यकता है। यदि हम यह कर सके, तो आने वाली पीढ़ी अपनी पहचान खोजने के लिए अपनी जड़ों से दूर नहीं जाएगी, बल्कि उन्हीं जड़ों से शक्ति लेकर भविष्य का निर्माण करेगी। यही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है वह परिवर्तन का विरोध नहीं करती, बल्कि उसे दिशा देती है।

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।