‘मूलनिवासी बनाम बाहरी’ नहीं, बल्कि साझा भारतीय सभ्यता और संवैधानिक समावेश का विमर्श। 

प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को विश्व मूलनिवासी दिवस (International Day of the World’s Indigenous Peoples) के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने इस दिवस की घोषणा उन समुदायों के अधिकारों, संस्कृति, भाषा, पारंपरिक ज्ञान, भूमि और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के उद्देश्य से की थी, जिन्होंने विभिन्न देशों में उपनिवेशवाद, विस्थापन, भेदभाव और सांस्कृतिक दमन का सामना किया है।

भारत में भी 9 अगस्त को व्यापक रूप से विश्व मूलनिवासी दिवस के रूप में मनाया जाता है। जनजातीय समाज की संस्कृति, परंपराओं, भाषा, जल-जंगल-जमीन और अधिकारों के संरक्षण की चिंता न केवल उचित, बल्कि अत्यंत आवश्यक है। हालांकि भारत के ऐतिहासिक और संवैधानिक संदर्भ में ‘Indigenous Peoples’ की अवधारणा को उसी रूप में लागू करने को लेकर एक अलग दृष्टिकोण सामने आता है।

भारत का ऐतिहासिक संदर्भ अलग

भारत में यदि केवल जनजातीय समाज को ही ‘मूलनिवासी’ और शेष भारतीयों को ‘बाहरी’ मानने का विमर्श खड़ा किया जाए, तो स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि हजारों वर्षों से भारत की सभ्यता, संस्कृति और इतिहास का हिस्सा रहे अन्य भारतीयों को किस श्रेणी में रखा जाएगा?

भारत का इतिहास उन देशों से पूरी तरह समान नहीं है, जहाँ औपनिवेशिक शक्तियों ने स्थानीय समुदायों पर शासन स्थापित कर उनकी भूमि पर अधिकार किया और उन्हें बड़े पैमाने पर विस्थापित किया। इसलिए भारत में ‘मूलनिवासी बनाम बाहरी’ की अवधारणा को यांत्रिक रूप से लागू करने के बजाय भारतीय इतिहास, सामाजिक संरचना और संविधान के संदर्भ में समझना अधिक उचित होगा।

जनजातीय समाज की विशिष्ट पहचान और अधिकारों का संवैधानिक संरक्षण

भारत का जनजातीय समाज देश की प्राचीन, विशिष्ट और गौरवशाली सांस्कृतिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है। संविधान ने उनकी विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों को स्वीकार करते हुए उन्हें अनुसूचित जनजाति के रूप में विशेष संरक्षण प्रदान किया है।

पाँचवीं और छठी अनुसूची, अनुच्छेद 244, अनुच्छेद 46, राजनीतिक आरक्षण, पेसा कानून तथा वन अधिकार कानून जैसे संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधान जनजातीय समाज के अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करते हैं।

इन विशेष अधिकारों का उद्देश्य जनजातीय समाज की पहचान, संस्कृति, भूमि, संसाधनों और स्वशासन की रक्षा करना है। इसका अर्थ यह नहीं है कि भारतीय संविधान भारतीय नागरिकों को ‘मूलनिवासी’ और ‘बाहरी’ भारतीयों में विभाजित करता है।

संयुक्त राष्ट्र के संदर्भ में भारत का दृष्टिकोण

भारत ने संयुक्त राष्ट्र के Indigenous Peoples संबंधी विमर्श में अपनी विशिष्ट ऐतिहासिक, सामाजिक और संवैधानिक परिस्थितियों को स्पष्ट किया है। भारत ने वर्ष 2007 में United Nations Declaration on the Rights of Indigenous Peoples (UNDRIP) के समर्थन में मतदान किया था।

साथ ही भारत का दृष्टिकोण यह रहा है कि ‘Indigenous Peoples’ की अवधारणा और उसकी परिभाषा को प्रत्येक देश की अपनी ऐतिहासिक, सामाजिक एवं संवैधानिक परिस्थितियों के संदर्भ में समझना आवश्यक है।इसलिए जनजातीय समाज के अधिकारों की रक्षा करना और पूरे भारतीय समाज को ‘मूलनिवासी बनाम बाहरी’ के दो खेमों में बाँटना—दो अलग-अलग बातें हैं।

‘आदिवासी’ शब्द सम्मान का आधार बने, विभाजन का नहीं

भारत में ‘आदिवासी’ शब्द अनेक जनजातीय समुदायों की पहचान, गौरव और आत्मसम्मान से जुड़ा है। उनकी लोकपरंपराएँ, भाषाएँ, जीवन-पद्धति, पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति के साथ उनका गहरा संबंध भारतीय सभ्यता की अमूल्य धरोहर हैं।इस विशिष्ट पहचान का सम्मान और संरक्षण होना चाहिए। लेकिन इसके लिए भारतीय समाज के किसी दूसरे वर्ग को ‘बाहरी’ घोषित करने की आवश्यकता नहीं है।

भारत की विशेषता ही इसकी विविधता और समावेशिता है। विभिन्न समुदायों, भाषाओं, परंपराओं और सांस्कृतिक धाराओं ने मिलकर भारतीय सभ्यता को समृद्ध बनाया है।

9 अगस्त का संदेश क्या हो?

9 अगस्त विश्व के Indigenous Peoples के संघर्ष, अधिकारों, संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर है। भारत में इस दिन जनजातीय समाज की विशिष्ट पहचान और अधिकारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को और मजबूत किया जा सकता है। साथ ही यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि—

“भारत का जनजातीय समाज भारत की प्राचीन और विशिष्ट सांस्कृतिक धरोहर है, लेकिन भारत की राष्ट्रीय पहचान को ‘मूलनिवासी बनाम बाहरी’ के संघर्ष में बदलना भारतीय इतिहास और संविधान की समावेशी भावना के अनुरूप नहीं है।”

जनजातीय समाज को अलगाव नहीं, सम्मान; विभाजन नहीं, अधिकार; उपेक्षा नहीं, समान गरिमा और संवैधानिक संरक्षण चाहिए।

भारत की ओर से दुनिया के लिए संदेश

भारत की जनजातीय संस्कृति भारत से अलग नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति का अभिन्न, प्राचीन और गौरवशाली अंग है।इसलिए 9 अगस्त केवल किसी एक समुदाय के उत्सव तक सीमित न रहकर विविधता, मानव गरिमा, पारंपरिक ज्ञान, सांस्कृतिक अधिकारों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा का अवसर बने।

हमारा दृष्टिकोण स्पष्ट हो—जनजातीय समाज की विशिष्ट पहचान, संस्कृति, भूमि और अधिकारों की रक्षा हो; उनकी गरिमा और सम्मान सुनिश्चित हो; लेकिन भारतीय समाज को ‘मूलनिवासी’ और ‘बाहरी’ के कृत्रिम संघर्ष में विभाजित न किया जाए।

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।